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Monday, 27 February 2012

अनुशासित अनुपम उड़ान की, अनुभूती अंतर्मन कर ले

गाँव-राँव की बात यह, आकर्षक दमदार ।
हावी कृत्रिमता हुई, लोग होंय अनुदार ।।

 लोग होंय अनुदार, गाँव की बात निराली ।
भागदौड़ के शहर, अजूबे खाली-खाली ।।

झेलें कस्बे ग्राम, मुसीबत किन्तु दांव की ।
लगे बदलने लोग, हवा अब गाँव-राँव की ।।

पारस्परिक यह लेना देना, परम्परा है प्यार की ।
प्रीत्यर्थी ये छुआ-छुआना, मर्यादित अभिसार की ।।


  Akanksha 

अनुशासित अनुपम उड़ान की, अनुभूती अंतर्मन कर ले ।
जीवन सफ़र सरल हो जाये, आसमान मुट्ठी में भर ले ।।  

लहरें नाम मिटा देती हैं, अच्छा है पत्थर पर लिखता ।
कोने में करता स्थापित, हर पल साथी सम्मुख दिखता ।।

यादों को कितना खुबसूरत, कविवर आप बना देते हो ।
पत्थर पर लिखकर क्या करना, दिल में सही सजा लेते हो ।। 
 
सहज सरल उत्तर है प्रियवर, सतत-सात्विक नेह दिखा है ।
वास कर रही पुण्यात्मा, दृग्भक्ती दृढ़-देह दिखा है ।।

"कुछ ख्वाब- कुछ मंजिले"


यादें - अमरेन्द्र शुक्ल 'अमर'


ख्वाबगाह से बाहर निकले, ख़्वाब ख्वाह हो जाते हैं ।
ख्वाहमखाह ख्यालों को खरभर, खार खेद बो जाते हैं ।। 

Saturday, 25 February 2012

दूजे की आसान, हंसी उड़ाना है सखे --


मेरी शर्ट सफ़ेद, दूजे की गन्दी दिखे ।
दुनिया भर के भेद, फिर भी हम सब एक हैं ।

दूजे की आसान, हंसी उड़ाना है सखे ।
गिरेबान नादान, थोडा सा तो सिर झुका ।। 


क्षमा  सहित -
है आश्रम  अ-व्यवस्थिति, अनमना --
किन्तु अंतरजाल पर चापल लगे । 

लेखनी को देख के समझा छड़ा --
पर हकीकत में कवी छाँदल लगे ।। 


  anupama's sukrity. 

जैसे शिशु को हवा में, देता पिता उछाल ।
  फिर भी मुस्काता रहे, विश्वासी शिशु बाल ।

वैसे प्रभु को सौंप के, हो जाएँ आश्वस्त ।
दिशा दशा सुधरें सकल,  हों कल मार्ग प्रशस्त ।  


सिफ़र सिफ़ारिश में जुड़ा, ज़ीरो से क्या रीस ।
हीरो आलू छीलता, घर का बन्दा बीस । 


आतंकी महफूज हैं, सामर्थ्यहीन कानून ।
खुलेआम बाजार में, दे मानवता भून  ।।

आस बेंचते पास में , मिलते दुष्ट दलाल ।
न हर्रे ना फिटकरी, उनकी गोटी लाल ।।

नेता पर मत मूतना, पूरा गया घिनाय ।
खाद और पानी मिले, दूर तलक जा छाय ।।


खबर बेखबर खब्तमय, कर खरभर उत्पन्न ।
खटक अटक लेता गटक, जन हो जाता सन्न ।।


  विचार 
 मनोदेवता ने किया, मनोनयन मनमीत |
दिखे प्रीति या रुष्टता, होय युगल की जीत |
होय युगल की जीत, परस्पर बढे भरोसा |
माता बनती मीत, संतती पाला पोषा ||
मंगलमय हो साथ, स्वास्थ्य हो सबसे आला |
आगे पच्चिस साल,  डाल चांदी की माला ||  



कर छल का एहसास पुन: , 
छलके नैनों के बाद रही ।
खाकर धोखा भूल गया, 
पर याद तुम्हारी याद रही ।।

दिनेश की टिप्पणी - आपका लिंक
http://dineshkidillagi.blogspot.in

Sunday, 7 August 2011

भोग-विलासी जीवन के हित पागल पूरे

कनरसिया के कानों के भी कान-खजूरे---
मनभावन सुर-तालों को अब  बेढब घूरे ||


व्यस्त जमाने के पहलू में ऊँघे  बच्चा 
कैसे  पूरे  हों  बप्पा   के  ख़्वाब   अधूरे ||


कनकैया-कनकौवा का कर काँचा माँझा
आकाश-पुष्प की खातिर भागे भटके-झूरे  ||  


युवा मनाकर आठ पर्व  को  नौ-नौ  बारी
भूली - बिसरी  परम्पराएँ      पूरी     तूरे ||


नैतिकता के अधो-पतन ने घर बिसराया 
भोग-विलासी जीवन के हित पागल पूरे ||

Tuesday, 2 August 2011

कवि क्यों वहाँ भी पहुँच जाता है जहाँ रवि नहीं पहुँचता

खरा खरा उत्तर---
जिधर मिलेगा काफ़ियः,  कवि उधर ही चल दिया --
गोरी की चोली से आगे-
दुल्हन  की डोली से आगे
मस्तक की रोली से आगे 
कातिल की गोली से आगे 
भोली सी सूरत के पीछे 
मन्दिर की मूरत के पीछे 
रक्षक की जुर्रत के पीछे 
भक्षक की फितरत के पीछे 
उपवन के फूलों में झांके
सावन के झूलों को लाके 
मौसम के अवसर को ताके 
मतलब के शब्दों को पाके --
मिला लेता है अपना काफिय:
पर 
अगर रवि यही बेगार करता रहे तो --
तन काले मन काले और 
धन काले जन काले 
फन काले कन काले 
को कौन दिखायेगा उजाले ||

 
 



Tuesday, 19 July 2011

सत्य शाश्वत है अटल

अमर शहीद मंगल पाण्डे !!
सादर नमन ||

लेखनी है परेशां, न रच रही कोई गजल |
पेट से क्या हो गई, चूस स्याही दे उगल ||

शब्द तो स्वर बोध केवल,
भाव ही मतलब असल |
लुप्त  हो  जाएगा  अनृत, 
सत्य  शाश्वत  है  अटल ||

है  परिश्रम  मूल में  पर, 
भाग्य  से उगती फसल |
आस्मां का भ्रमण कर ले,
फिर के आये भू पटल  ||

बुद्धि का अंकुश हटा दे, 
मन  रहा ज्यादा मचल |
स्रोत्र  सूखें  सूख जाएँ , 
किन्तु न हिलता अचल ||

करती  तरंगें  चिड़ीमारी, 
बैठ अपने हाथ  मल |
हाथ  पर  सब  हाथ रक्खे, 
कोसते आजकल ||

दिग्विजय  ने  कहा  की  वो  किसी  को
( उज्जैन में भा जा यु मोर्चा के कार्यकर्त्ता को) 
थप्पड़ नहीं मार सकते ||
हाँ भाई आप तो लतिया सकते हैं ||
( जनार्दन पर जूता काण्ड के पत्रकार को )

Monday, 4 July 2011

जिंदगी तो योजनाओं से परे है |

जिन्दगी में योजनायें क्या बनाये 
जिंदगी तो योजनाओं से परे है |
कौन-कब-कैसे-कहाँ-क्योंकर मिला,
प्रश्न ही यह कल्पनाओं से परे है ||
हम-हमी-हममे हमारा वक्त सारा 
जिंदगी इन भावनाओं से परे है |
है नहीं कोई नियंत्रण आत्मा -
विज्ञान की अवधारणाओ से परे है ||
हो पास तो एहसास  होते खुशनुमा
पाक है जो वासनाओ से परे है |
करणीय  था, या निषेधक वाकया
जिंदगी तो वर्जनाओ से परे है ||
वक्त का तूफान हो या जलजला
मित्रता संभावनाओं से परे है |
जिन्दगी में योजनायें क्या बनाये
                      जिंदगी तो योजनाओं से परे है ||

Thursday, 30 June 2011

नोंक-झोंक-2 उर्फ़ सरेंडर

नोंक-झोंक-1    वो  

पैर बाहर अब निकलने लग पड़े | खींच के चादर जरा लम्बी करो || 
                 आप
पैर अपने मोड़ कर रखो तनिक, दूसरी चादर मिले, धीरज धरो ||
                  वो 
आपके कम्बल से आती है महक  ओढ़ कर पीते हुए घी क्यूँ चुआये ||
                आप 
रोज तिल का ताड़ तुम बेशक करो, कान पर अब जूं हमारे न रेंगाये ||                
(अपनी  टांग  उघारिये  आपहिं  मरिये  लाज)
पर -नोंक झोंक परसनल कहाँ रही--
                                वो
अपनी गरज तो बावली, दूजा नहीं दिखाय | अस्सी रूपया रोज का,  पानी   रहे  बहाय  ||
                                     आप
हो बड़की शौकीन तुम, मलमल लहँगा पाय | मैट्रिक्स  पार्लर  घूमती, कौआ  रही  उड़ाय ||  
                    वो 
सींग काटकर के सदा,  बछड़ों में  घुस जात  | फ़ोकट में दिन-रात जो, झूठे कलम घिसात ||  

बस-बस बस ---
            आप
जीभ को तालु से लगा, गया छोड़  मैदान || कम्प्यूटर  पर बैठ के, साफ़  बचाई जान  ||
नोंक-झोंक  के बाद--लौट के बुद्धू घर को आये  

                        आप
सब  कुछ  बाहर  छोड  के  लौटा  तेरे पास |
भूखा तेरे प्यार का, डाल जरा सी घास ||

                        वो
घंटों  से तू था  किधर, रहा था दाने डाल ||
नहीं फंसी चिड़िया तभी, शाकाहारी ख्याल ||

                       आप
सांप  नहीं हम हैं प्रिये,  खायें मात्र हवा ||
ऊंट को जब-तब चाहिए,  दारु-भोज-दवा ||

                           वो
नीति-नियम से पक रहा, बासी न बच जाय |
हो राशन  बर्बाद क्यूँ ,  काहे  कुक्कुर खाय || 

                          आप
नित कोल्हू के बैल सा, खटता आठो याम |
कीचड़  में  टट्टू फंसा, होवे काम तमाम  ||

नाच  नाचता मैं रहूँ , पल्ला पकड़ा तोर |
गाढ़े के साथी तुम्ही, भूख मिटा दो मोर ||

                     वो
एक आँख से रो रहे, दूजी हंसती जाय |
करवट बैठे ऊंट उस, जो पहाड़ बतलाय ||  

Tuesday, 28 June 2011

नोंक-झोंक

                        वो  
पैर बाहर अब निकलने लग पड़े |
खींच के चादर जरा लम्बी करो || 
                 आप
पैर अपने मोड़ कर रखो तनिक,
दूसरी चादर मिले, धीरज धरो ||
                  वो 
आपके कम्बल से आती है महक 
ओढ़ कर पीते हुए घी क्यूँ चुआये ||
                आप 
रोज तिल का ताड़ तुम बेशक करो,
कान पर अब जूं हमारे न रेंगाये ||
                
(अपनी  टांग  उघारिये  आपहिं  मरिये  लाज)
पर -नोंक झोंक परसनल कहाँ रही--
                                वो
अपनी गरज तो बावली, दूजा नहीं दिखाय |
अस्सी रूपया रोज का,  पानी   रहे  बहाय  ||
                                     आप
हो बड़की शौकीन तुम, मलमल लहँगा पाय |
मैट्रिक्स  पार्लर  घूमती, कौआ  रही  उड़ाय ||  
                    वो 
सींग काटकर के सदा,  बछड़ों में  घुस जात  |
फ़ोकट में दिन-रात जो, झूठे कलम घिसात ||  

बस-बस बस ---            आप
जीभ को तालु से लगा, गया छोड़  मैदान ||
कम्प्यूटर  पर बैठ के, साफ़  बचाई जान  ||



Sunday, 26 June 2011

विविध दोहे

                                    
प्रेम-क्षुदित व्याकुल जगत, मांगे प्यार अपार |
जहाँ  कहीं   देना   पड़े,   कर   देता   है   मार  ||


आम  सभी  बौरा  गए,  खस-खस  होते ख़ास |
दुनिया  में  रविकर  मिटै, मिष्ठी-स्नेह-सुबास || 


सरपट  बग्घी  भागती,  बड़े  लक्ष्य  की ओर |
घोडा  चाबुक  खाय  के,  लखे  विचरते  ढोर || 


चले  हुए   नौ-दिन   हुए,  चला  अढ़ाई  कोस |  
लोकपाल का करी शुभ्र, तनिक होश में पोस ||  करी  =  हाथी

 
कुर्सी   के   खटमल   करें,  मोटी-चमड़ी  छेद |
मर  जाते  अफ़सोस  पर,  पी के खून सफ़ेद  ||  

म्याऊँ सोच रही गद्दी पर देख बिलौटा बैठे कब-

Saturday, 25 June 2011

स्वतन्त्र - दोहे

सोखे  सागर  चोंच   से, छोट टिटहरी नाय |
इक-अन्ने से बन रहे, रुपया हमें दिखाय ||

सौदागर   भगते   भये,   डेरा  घुसते   ऊँट |
जो लेना वो  ले चले,   जी-भर  के  तू  लूट ||

कछुआ  -  टाटा   कर   रहे ,   पूरे   सारोकार | 
खरगोशों   की   फौज  में,  भरे पड़े  मक्कार ||

कोशिश  अपने  राम  की,  बचा  रहे  यह  देश |
सदियों  से  लुटता  रहा,   माया  गई  विदेश  ||

कोयल  कागा  के  घरे,   करती  कहाँ   बवाल  |
चाल-बाज चल न सका,  कोयल चल दी चाल ||

प्रगति   पंख   को   नोचता,  भ्रष्टाचारी   बाज |
लेना-देना   क्यूँ   करे ,  सारा  सभ्य  समाज  || 

रिश्तों   की   पूंजी  बड़ी , हर-पल संयम *वर्त |     *व्यवहार कर  
पूर्ण-वृत्त   पेटक  रहे ,  असली  सुख   *संवर्त ||     *इकठ्ठा


Wednesday, 18 May 2011

ऐसा क्यूँ-लोग सुधरे को ही सुधारते हैं' पर

इस युग में 
सज्जनों  को हो रहा है नुक्सान परिचय से, 
घनिष्ट परिचय से---
दोस्तों कि दुश्मनी घातक रही खुब , 
लम्बे अरसे से----
दुर्जनों ने आज भी सौदे किये, खुब लाभ पाया 
सज्जनों के हाथ बस नुक्सान आया 
सफलता से आज बस परचित जलें,पग-पग छलें
जो अपरचित, वे बेचारे, क्यूँकर खलें ??