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Wednesday, 7 March 2012

हो री हो ली चरम पर, भरमित घुर्मित लोग-

  दिलबाग विर्क 
 चर्चामंच   पर टिप्पणी
हो! हो! हो! होली हुई, हरफ-हरफ हुलसाय |
प्रेम-पत्रिका पाठकर,  पटु-पाठक पगलाय ||



पटु-पाठक पगलाय, प्रेम-पर प्रस्तुत परचा |
चंचल-मन चितलाय, चढ़े चाचरि चहुँ चरचा |



बाग़ बाग़ दिलबाग, निखरता तन-मन धो- धो |
होली सबको लाग, करें सब पागल हो! हो !!


कुछ पकड़ने में कुछ छूट जाता है।
बिटिया को शुभकामना, मात-पिता का स्नेह ।
सफल यात्रा हो प्रभू, बरसे मेहर-मेह ।
बरसे मेहर-मेह, छूटने कुछ न पाए ।
न कोई संदेह, समझ-दृढ़ता शुभ आये ।
पिता श्री बेचैन, भटकना इनकी आदत ।
यह होली की रैन, सभी का स्वागत-स्वागत ।।

स्पर्श प्यार का

खारा सागर मीठी गागर, शीत-ऊष्ण धाराएं |
कहीं मरुस्थल-उद्यानों में, भीषण-सुखद हवाएं |
चंदा की फितरत समझे मन, तन समझे घन वर्षा
अमृत बूंदाबांदी से यह जीवन-ऊसर हर्षा || 

हो री हो ली चरम पर, भरमित घुर्मित लोग ।
शर मारे कुसुमेस सर, सहना कठिन वियोग ।।  

होली की फाग .....

कान्हा लीला कर रहे, छत्तीसगढ़ को जात ।
मायावी योगी बड़े, सपना हैं भरमात । 
सपना हैं भरमात, खेलती दुनिया सारी।
रँगते सबके गात , चला के खुब पिचकारी ।
राधा धानी रंग, लाल से रंगे नीला ।
होली में भी तंग, करे है कान्हा-लीला ।। 
 (दिगम्बर नासवा)  
  स्वप्न मेरे......... 


आज दिगम्बर की गली, गली ठीक से दाल ।
कैलासी डोलें सकल, लागा नेह-गुलाल ।।
 हर पहलू को जांचती, आँखे अख्तर साब ।
  जो पढ़ ले ऑंखें उन्हें, मिलते सकल जवाब ।।  


एक साल सचमुच हुआ, पुत्र  बसा परदेस  |
अंत वित्तीय वर्ष कर, आएगा फिर देस ।
आएगा फिर देस, बेटियां घर को आईं ।
गलाकाट यह रेस, कैरिअर और पढ़ाई ।
होली का त्यौहार, दिवाली रक्षाबंधन ।
झूठे होते पार, साल से मेरे आँगन ।।

तीव्र वेग हो तीव्रतर, भरसक भागम भाग ।
 रोना फिर भी समय का, मिटे मोह अनुराग ।  
मिटे मोह अनुराग, लगे त्यौहार बदलने ।
नौसिखुओं की फाग, दाल लगती है गलने ।
संवाद हुए संक्षिप्त, रेस में पहले दौड़ें ।
मोबाइल विक्षिप्त,  भेजता मैसेज भौंडे ।।


दिनेश की टिप्पणी : आपका लिंक
dineshkidillagi.blogspot.com
होली है होलो हुलस, हुल्लड़ हुन हुल्लास।
कामयाब काया किलक, होय पूर्ण सब आस ।।

Sunday, 4 March 2012

बाबा रहे सँभाल, बाबा को तुम देखना--


खुशियाँ हो भरपूर, कीर्तिवान हो जगत में ।
हो मनोकामना-पूर्ण, प्यारे बाबा के सकल ।।

बिद्या-बुद्धि शौर्य, शारद दुर्गा भेंटती ।
संयम निष्ठा धैर्य, मात-पिता गुरु से मिले ।।

अभ्युदय खुशहाल, होय निरोगी देह पुष्ट ।
बाबा रहे सँभाल, बाबा को तुम देखना ।।

ग़ाफ़िल की अमानत

लीडर यह सचमुच निडर, मिटा प्रतिष्ठा मूल।
फिरे जहन्नुम ढूंढता, फिर से खता क़ुबूल ।। 



रजनी में रजनीश की, धवल किरण इक आय ।
कालनिषा में दी दिखा, पाठक एक उपाय ।
पाठक एक उपाय, स्वान्त: लिखने वालों ।
जांचो-परखो खूब, पकाओ पहले सालों ।
 हो जाये जब टेस्ट, छापिये पुस्तक अपनी ।
तब दीमक न खाय, सुवासित होवे रजनी ।।


बढ़िया विश्लेषण पढ़ा,  कविवर तुम्हें प्रणाम ।
मातु नर्मदा का किया, वर्णन विविध तमाम ।
वर्णन विविध तमाम, बनी गंगा सी पावन ।
सींचे पेड़-पहाड़, अमर-कंटक से उपवन ।
सबसे बढ़िया बात, बूंद ताकत दिखलाए ।
एकल क्या औकात, मिले धरा बन जाए ।।


शीर्षक में है सादगी, मिला मसाला खूब ।
पीने का टाइम हुआ, गए घड़े में डूब ।। 
गए घड़े में डूब, होश की बातें भूले ।
नहीं तनिक भी ऊब, मस्त हो झूले झूले ।
पचपन थी यह देह, पचासी होती जाये ।
मद्य पचा सस्नेह, बुराई सारी भाये ।।


बेटी का दर्द देख बन गए बच्चों के हमदर्द

India Darpan

 

निज बेटे के दर्द सा, करे अलग अनुभूति ।
जज्बे की कर वंदना, करूँ प्रणम्य विभूति ।
करूँ प्रणम्य विभूति, धनी का हृदय भेदे ।
कर गरीब कल्याण, रोग दुनिया से खेदे ।
बुरी दशा है मित्र, आज भी इन गावों की ।
सब सरकार विचित्र, पोल खुलती दावों की ।।


मत बाँटो इंसान को

 

पंछी 

फितरत यह इंसान की, कहता हूँ दो टूक ।
टूक टूक करता रहे, नस्ल क्षेत्र पद कूट ।
नस्ल क्षेत्र पद कूट, बाँटता खुद को जावे ।
जाति-धर्म पथ गोत्र, जिला भाषा बहकावे ।
गौर सांवला वर्ण, पढ़े-अनपढ़ में बांटे ।
खड़ा अकेला पाय, अंत में खुद को काटे ।। 

च च  चपला चंचला, चमत्कार चौन्धाय।
चकित चकोरी चिहुकती, चभक चापती चाय । 
चभक चापती चाय, चकीरा चक्कस चलता ।
चकमक चक चिंगार, चीन्ह चुपचाप चुबलता ।
ऐ रविकर चल चाप, चरफरा चना चबैना ।
चुप चूँ-चूँ चिचियान,  चाहिए चौगुन चैना ।।


  बाल-बुद्धि लायक प्रभू , दुनिया देव बनाय ।
 दुनिया लायक अन्यथा, हिकमत देव सिखाय ।।

 दिनेश की टिप्पणी : आपका लिंक 
 dineshkidillagi.blogspot.com
होली  है  होलो  हुलस, हुल्लड़  हुन  हुल्लास।
कामयाब काया किलक, होय पूर्ण सब आस ।।

Friday, 2 March 2012

मनोजात अज्ञान, मने मनुजा की माया-


भाया ओज मनोज का, उल्लू कहती रोज ।
सम्मुख माने क्यूँ भला,  देती रहती डोज ।
देती रहती डोज, खोज कर मौके लाती ।
करूँ कर्म मैं सोझ, मगर हरदम नखराती ।
मनोजात अज्ञान, मने मनुजा की माया ।
चौबिस घंटे ध्यान, मगर न मुंह को भाया ।।



हँसी ख़ुशी से कर रही, वर्षों से मनुहार ।
मुखड़े पर मुस्कान की, है कबसे दरकार ।
है कबसे दरकार, उदासी तन्हाई है ।
सदा जोहता बाट, संदेशा पहुंचाई है ।
सुन रे ऐ नादान, ख़ुशी जमकर इतराती ।
जहाँ रहे मुस्कान, वहाँ मैं पहले आती ।। 
जोखू ने जोखा सही, यही है भैया रीत ।
पीढ़ी दर पीढ़ी बनत, भरत-जनों की मीत ।
भरत-जनों की मीत, ढीठ *दिग्गीश्वर जैसा ।*इंद्र 
माँ को एकै रोग, ठिकाने जमता पैसा ।
   द्रव्य सदी से सोख, चले देने फिर धोखा।
जमा बाप का माल, सही जोखू ने जोखा ।।


कंधे कुल्हाड़ी रखे, चला कृषक अनजान ।
सूरज की छाया मिले, चन्दा पथ की शान ।
चन्दा पथ की शान, हरे पत्ते फल लाली ।
यह नीला आकाश, काम के बने सवाली ।
हल की पकड़ी मूठ, चला गहरे वो गहरे ।
गन की गोली झूठ, लगा चाहे सौ पहरे ।।

  बस्तर की अभिव्यक्ति -जैसे कोई

नहीं कालिया-डाह था, गया जगह था छोड़ ।
रीढ़-विहीनों में लगी, रही तभी से होड़ ।
 रही तभी से होड़, छुपा कर रक्खा फन को ।
मिलें आज हर मोड़,  करें त्रस्त सज्जन गन को ।
तीन फनी यह सर्प, भूल से आया सम्मुख ।
भगा देखकर दर्प, दुर्जनों के दो सौ मुख ।।


  उच्चारण

शास्त्री जी की पोस्ट है, पाठक बेहद ख़ास ।

क्रम-संख्या सुनिए जरा, बारह सौ पच्चास ।

बारह सौ पच्चास, गुरु है बारहबानी ।

बारहमासी रास, नहीं है कोई सानी ।

लगा चुके हैं आप, आज पच्चीस पचासा ।

इन्तजार है पाक, करें हम सौ की आशा  ।।


और अंत में --

  महेन्द्र श्रीवास्तव  
 आधा सच..

चालिसवाँ मन भर गया, मन भर मने चुनाव ।
नगर-नगर भटका किये, घूम हजारों गाँव ।
घूम हजारों गाँव, खबर राहुल की बढ़िया ।
एस पी खेली दाँव, पकेगी सत्ता-हड़िया ।
भाजप फूंके छाछ, गाछ से बसपा नीचे ।
राज न जाना राज, अजित हैं आँखे मीचे ।। 

आगरा मे चौपाल के दौरान समय मिला तो मैं और संदीप पहुंच गए ताजमहल...

होली है होलो हुलस, हाजिर हफ्ता-हाट ।
चर्चित चर्चा-मंच पर, रविकर जोहे बाट ।

Thursday, 1 March 2012

गोरी कोरी क्यूँ रहे, होरी का त्यौहार --

    INDIAN CLICK GALLERY
 चीं-चीं चिड़िया चली उड़,चिचियाहट चित भंग ।
सूर्य अस्तगामी हुआ, रक्त आसमाँ रंग ।

रक्त आसमाँ रंग, साँझ होने को आई |
जंग आज की बन्द, काल्ह फिर करे चढ़ाई ।

प्राकृत का है खेल, समय ने सीमा खींची |
भोर लगे अलबेल, मस्त चिड़िया की चीं चीं ।। 

गोरी कोरी क्यूँ रहे, होरी का त्यौहार ।
छोरा छोरी दे कसम, ठुकराए इसरार ।

ठुकराए इसरार, छबीले का यह दुखड़ा ।
फिर पाया न पार, रँगा न गोरी मुखड़ा ।

लेकर रंग पलाश,  करूँ जो जोर-जोरी ।
डोरी तोड़ तड़ाक,  रूठ जाये ना गोरी ।।

सौ सुनार की चोट हित, मतदाता तैयार ।
इक लुहार की ठोक के, चाहे सुख-भिनसार ।
चाहे सुख-भिनसार, रात कुल पांच साल की ।
दुर्गति के आसार,  मुसीबत जान-माल की ।
चोरी लूट खसोट,  डकैती बलत्कार की ।
लुटा दिया जब वोट, सहो अब सौ सुनार की ।।
छज्जे पर बैठी गौरैय्या, फुर्र हो गई ।
द्वार बुहारे मेरी मैया, कहाँ खो गई ।
कौआ उल्लू तोता व्याकुल आसमान में-
मारक मोबाइल की टिन-टिन, उन्हें धो गई ।। 

पिट्सबर्ग का भारती, है गिट-पिट से दूर ।  
करे देश की आरती, देशभक्ति में चूर ।

देशभक्ति में चूर, सूंढ़ हाथी की शुभ-शुभ ।
 औषधि तुलसी बाघ, कैक्टस जाती चुभ-चुभ ।

तरी मसालेदार, बाग़ में सजी रंगोली ।
रेल कमल बुद्धत्व, गजब वो खेले होली ।। 

   उच्चारण
यह इम्तिहान है नहीं सखे, यही परम अभ्यास है ।  
गुण-दोष विवेचन पल पल करती, नित धरती आकाश है ।

सामर्थ्यवान बनने की रीती, अपनी एक समीक्षा यह-
बढ़ते तन के तुल्य बताती, बुद्धि हमारे पास है ।। 

charchamanch.blogspot.com
जिम्मेदारी  के  प्रती, रहते विर्क सचेत ।
पूरी निष्ठां से तुरत, चर्चा हैं कर देत ।
चर्चा हैं कर देत, लिंक सुन्दर सब साजे ।
होली का मृदंग, नगाड़े ढोलक बाजे ।
रविकर कहता मित्र, जमेगी अपनी यारी ।
कई उकेरे चित्र, निभाई जिम्मेदारी ।।

Monday, 27 February 2012

मानस मोती पाय, अघाए मानव बुद्धी -


सुनों किताबें बोलतीं, पावन करती देह ।
कानों में मिश्री घुले, करलो इनसे नेह ।

करलो इनसे नेह, निभाती रिश्ता हरदम ।
लेकर जाओ गेह, मित्र ये रहबर अनुपम ।

मानस मोती पाय, अघाए मानव बुद्धी ।
  साबुन तेल बगैर, करे तन-मन की शुद्धी।

 
कविता : मत छापो मुझे 
  धर्मेन्द्र कुमार सिंह ‘सज्जन’ के कल्पनालोक में आपका स्वागत है - 

शब्दों की तड़पन से सिहरी,  चीत्कार कविता की सुन लो ।
शब्दा-डंबर शब्द-भेदता, भावों के गुण से अब चुन लो ।

पहले भी कविता मरती पर, मरने की दर आज बढ़ी है --
भीड़-कुम्भ में घुटता है दम, ताना-बाना निर्गुन बुन लो ।।

 समानांतर चली कथाएं, इक राजा सौ रंक की ।
इतराहट इक ओर रही उत, झल्लाहट आशंक की ।


झूले कंचन झूले में इत, कंच से भंगुर सपने हैं उत-
  यहाँ अन्नप्राशन पर लाखों, वहाँ कुपोषण डंक की ।।



मन में घर करते गए,  रोड़ा रेत मकान ।
साथ हाथ संगत रहे, टाले सब व्यवधान ।

 टाले सब व्यवधान, सजाया घर को सुन्दर ।
आत्म आत्माराम, लांघता सात समन्दर ।

छोड़ा पूर्व मकान, रहूँ अब दूजे तन में ।
पता रहा मैं जान, रखूं पर अपने मन में ।। 


पले पलायन का परशु, पल-पल हो परचंड ।
अंकुश मस्तक से विलग, हस्त करे शत-खंड ।।


  बेसुरम्‌ 

जाल में जवाल में, भेड़िये भी खाल में ।
जाल-साज साज के, फांस लेत जाल में ।।


  स्व प्न रं जि ता 

शिशिर जाय सिहराय के, आया कन्त बसन्त ।
मस्ती में आकूत सब, सेवक स्वामी सन्त ।

सेवक स्वामी सन्त, हुई मादक अमराई ।
बाढ़ी चाह अनंत, जड़ो-चेतन बौराई  ।

फगुनाहट हट घोर, शोर चौतरफा फैला।
देते बांह मरोर, बना बुढवा भी छैला ।।

निर्वाचन पर हो गए, मतदाता निर्वाक्य ।
राहुल बाबा पर कहाँ, करते टिप्पण शाक्य ।। 
करते टिप्पण शाक्य, नगर गौतम श्रावस्ती ।
नंगे दारुबाज, सजी मस्ती की  बस्ती ।
फँसे गुरु निर्वचन, करे नेतागण मंचन ।
नौटंकी को लाज, अजी तिकड़म निर्वाचन ।।



चक्रव्यूह साजा करे , पल-पल वक्ताचार्य ।
अभि-मन आहत हो रहा, कृष्ण-विवेकी कार्य ।
कृष्ण-विवेकी कार्य, करें कौरव अट्ठाहस ।
जायज है सन्देश , धरो पांडव सत्साहस ।
 यही युद्ध का धर्म, कर्म का लेकर डंडा ।
युद्ध-भूमि का मर्म, करो दुश्मन को ठंडा ।।

Tuesday, 21 February 2012

कवि सचमुच का पगलाई ता बसंत हौ

दर्द बढ़ता जा रहा है |
जिंदगी को खा रहा है |
पर भ्रमर भी क्या करे--
गा रहा, बस गा रहा है ||

गेहूं जामे गजल सा,
सरसों जैसे छंद |
जामे में सोहे भला,
सूट ये कालर बंद ||

"आदरणीय “रविकर” जी को समर्पित-पाँच दोहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

रविकर जी को भा रहा, अब भी मेरा रूप।
वृद्धावस्था में कहाँ, यौवन जैसी धूप।१।

गेहूँ उगता ग़ज़ल सा, सरसों करे किलोल।
बन्द गले के सूट में, ढकी ढोल की पोल।२।

मौसम आकर्षित करे, हमको अपनी ओर।
कनकइया डग-मग करे, होकर भावविभोर।३।

कड़क नहीं माँझा रहा, नाज़ुक सी है डोर।
पतंग उड़ाने को चला, बिन बाँधे ही छोर।४।

पत्रक जब पीला हुआ, हरियाली नहीं पाय।
ना जाने कब डाल से, पका पान झड़ जाय।५।
  1. माता होय कुरूप अति, होंय पिता भी अंध |
    वन्दनीय ये सर्वदा, अतिशय पावन बंध ||
    बंध = शरीर

    उच्चारण अतिशय भला, रहे सदा आवाज |
    शब्द छीजते हैं नहीं, पञ्च-तत्व कर लाज ||

    देव आज देते चले, फिर से पैतिस साल |
    स्वस्थ रहेंगे सर्वदा, नौनिहाल सौ पाल ||
मीठी बोली सहजता, आशामय  विश्वास।
शांत चित्त के ज्ञान से, सहज सरल हर सांस ।।

दिल के कोने में सजा, रहा अकेला नाम।
सजा सदा देता रहे, करे नहीं  आराम ।।

ई चकाचक कS बसंत हौS। बेचैन -आत्मा 

वैसे तो साल भर बेचैन रहे आत्मा  ।
कवि सचमुच का पगलाई ता बसंत हौ ।।

वो सूरज से बगावत कर रहा है ...

स्वप्न मेरे पर 

चुके होंगे तरकश के तीर
अपनी उकताहट हर रहा है ||

  vidya writes again.. 

नंगे सभी हमाम में, लगे मुखौटे प्याज |
एक-एक कर छीलिए, छीले जी ले लाज ||  


सस्ती मौत ....

विचार-प्रवाह पर 

'मिलीटरी' का ट्रक रहा, 'मिली'  'टरी' न मौत ।
सदा गरीबी बन रही,  इस जीवन में सौत । 

सदियों से बेगानों के घर रहा हूँ मैं |
अब भी पुराना हिसाब भर रहा हूँ मैं |

ढूंढता रह गया खुशियों को बेहिसाब--
जिंदगी मिल न जाए डर रहा हूँ मैं ||

Thursday, 20 October 2011

इन्तजार दो साल, बने बापू फिर बबलू |

 MATHURA: JD U leader and NDA convenor Sharad Yadav called him 'Babua', Former Kerala chief minister Achyutanand called him Amul Baby and now he has altbeen named 'Babloo'.


बापू बबलू को कहें, दिक दिग्गी हो जात |
  लाना  सत्ता  सुंदरी,  सजने लगी बरात |






Bobby Darling
सजने लगी बरात , डार्लिंग-बाबी  बोली |
  हम को
करना ब्याह, बैठना राहुल डोली |




 

कह रविकर कविराय, खिलाओ मम्मी पपलू |
इन्तजार दो साल,  बनेगा  बापू बबलू ||

Monday, 29 August 2011

जाट-देवता की 39 वीं वर्षगाँठ : 31 अगस्त को

मेरी हार्दिक बधाई  || 
संदीप जी का परिचय :
https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgCmTtvvuSYKokUk_1npq8QJKI2_-2mNloQTUCrz2LGBQEucezHePJubflzfIDPMuwLmigp0MMmE-wsTMKIDG79oLzCBUgVFdeMi3IzwpTtUCbgtLRVztK5h9StDwOo102IezKqLHEZhwM/s1600/1.JPG

"भोजदेव"  के  "धार" से,  मालव-महिमा  धार |
"शबगा"  में आकर जमे, "व्याघ्र-प्रस्थ" आगार ||
 पिता भारतीय थलसेना में जाट रेजीमेंट में थे।
सेना में रहते हुए दो बार पाकिस्तान से युद्द में शामिल हुए। जिसमें एक बार
एक पाकिस्तानी गोली मेरे पिता की छाती के  बीचोबीच से आर-पार हो गयी थी।
हमें दोनों तरफ का निशान दिखाया करते थे,
फौजी   कालू  राम  जी,   देश-भक्त  परिवार |
यमुना तट पर कृष्ण सा,  पाया  स्नेह-दुलार||

देवी  माँ  सन्तोष   के,  हृदय  का टुकड़ा एक |
ब्लाग-जगत हर्षित हुआ,  पाया  बन्दा  नेक ||




रीना संग  माला बनी,  मणिका  बड़ी पिरोय |
पुत्र  पवित्र  के संग में,   आँगन  पावन  होय ||


https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhIrn1A7Lp9bg9tghBGV44GxBk1SJqAzJtKolv5NkkrDXnRNEXMmwI7KGCYSK3k2cOhmDunnowDQtdvmGNHSIDZFguI92p7m57lcKQ12xUQIezW1H2UbK4M8o3zG7ido0wPRaNjktsxwlA/s1600/b.jpghttps://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhT7mqO2yIzS4zycNnRxJi-V6MvrYCohgpptcun5edpK2kE8a_1xB3jRB-QXV-6e7E2253wnCDckJJsH259j_5rVQ_q0EF1I8H3O2ZQL8dGDQGrV-PXa9gGkpPALOumR9bPIlsZQpn1elM/s1600/101.jpg
                          

शुभकामनाएं

अक्कड़-बक्कड़  बम्बे-बो, 
अस्सी    नब्बे    पूरे    सौ ||

अक्षय  और  अनंत  ऊर्जा  का, 
शाश्वत   भण्डार   सूर्य  हो |

मत्स्य-भेदते द्रुपद-सुता के, 
स्वप्नों के प्रिय-पार्थ-पूर्य हो || 

सुबह महाशिवरात्रि पर गंगा जल चढाने के लिए लम्बी लाइन
घुमक्कड़ी   के   संदीपक  हो,  
मित्रों  ने  पाया  उजियारा |


परिक्रमा  सारी  दुनिया  की, 
दुर्गम-दुर्धुष  सा  व्रत  धारा ||

पञ्चम-स्वर की चार-श्रुति में, 
तीजी श्रुति संदीपन से तुम | 

सागर सर नद तट कौतूहल, 
मठमंदिर वन-उपवन से तुम ||

पर्वत  के  उत्तुंग-शिखर  पर, 
मानवता  का  ध्वज  फहराते |

तप्त-मरुस्थल  पर  गर्वीले, 
अपने  विजयी  कदम  बढाते ||
https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiGMmHlqY8cEkvgl2XTKtXMeUL3AYBkrpkie5N7shtuYeOfRJYvmVWEAvirIJ0HpLklxQEmvrgBbbafSBuS8Z1osBTQkQ4vOWYK1XEb6837vxp8NfaFQCMNnMZzyIB3cloZ2j1v6i0vY7c/s1600/23.jpg

प्रकृति सुंदरी के दर्शन हित, 
निकल पड़ें जैसे  फटती पौ |

अक्कड़ - बक्कड़  बम्बे-बो,  
अस्सी    नब्बे    पूरे    सौ ||


जाट - देवता   से  सदा,  रहिएगा   हुसियार |
जाट-खोपड़ी  क्या  पता,  कब  कर देवे मार | 
  कब   कर   देवे   मार,  हाथ  माँ  डंडा  साजे  | 
 मिले  न  दुश्मन  तो,  दोस्त  का बाजा बाजे || 
लो "रविकर" पर जान, जान  देने  की  बारी |
मित्रों  पर  कुरबान,  रखे    पक्की   तैयारी ||