Sunday, 4 February 2018

बिन डगमग करते दिखे, दो डग मग में कर्म

पानी मथने से नहीं, निकले घी श्रीमान |
साधक-साधन-संक्रिया, ले सम्यक सामान ||

सत्य बसे मस्तिष्क में, होंठों पर मुस्कान।
दिल में बसे पवित्रता, तो जीवन आसान।।


खड्ग तीर चाकू चले, बरछी चले कटार।
कौन घाव गहरा करे, देखो ताना मार ।।

मार बुरे इंसान को, जिसकी है भरमार।
कर ले खुद से तू शुरू, सुधर जाय संसार।।



सबको देता अहमियत, ले हाथों में हाथ।
बुरे सिखा जाते सबक, भले, भले दें साथ।।

शत्रु छिड़क देता नमक, मित्र छिड़कता जान।
बड़े काम का घाव प्रिय, हुई जान-पहचान।।

चाहे जितना रंज हो, कसे तंज पर तंज।
किन्तु कभी मारे नहीं, अपनों को शतरंज।।

आतप-आफत में पड़ा, हीरा कॉच समान।
कॉच गर्म होता दिखा, हीरा-मन मुस्कान।

कलमबद्ध हरदिन करें, वह रविकर के पाप।
किन्तु कभी रखते नहीं, इक ठो दर्पण आप।।

गम का ले अनुभव विकट, चलो तलाशें हर्ष।
करो भरोसा स्वयं पर, तब रविकर उत्कर्ष।।

कई साल से गलतियाँ, रही कलेजा साल।
रविकर जब गुच्छा बना, अनुभव मिला कमाल।।

नारि भूप गुरु अग्नि के, रह मत अधिक करीब।
रहमत की कर आरजू, जहमत लिखे नसीब।।

नारि भूप गुरु अग्नि के, रह मत अति नजदीक।
मध्यमार्ग से हो भला, बरसे रहमत नीक।

पड़े पुष्प प्रभु-पाद में, कण्ठ-माल से खिन्न।
सहे सुई की पीर जो, वो ही भक्त-अभिन्न।।

गारी चिंगारी गजब, दे जियरा सुलगाय।
गा री गोरी गीत तू , गम गुस्सा गुम जाय।।

शिल्पी-कृत बुत पूज्य हैं, स्वार्थी प्रभु-कृत मूर्ति।
शिल्पी-कृत करती दिखे, स्वार्थों की क्षतिपूर्ति।

बिन डगमग करते दिखे, दो डग मग में कर्म।
गर्व नहीं अगला करे, पिछला करे न शर्म।।

सज्जन तो पारा सरिस, परख न बारम्बार।
जाए बिन टूटे फिसल, बिन उगले उद्गार।।

हो रोमांचित जिन्दगी, नई चुनौती देख |
करके फिर जद्दो-जहद, खींचे लम्बी रेख ||

Monday, 15 January 2018

सारे भोंपू बेंच दे, यदि यह हिंदुस्तान-

मुल्क सुपर पावर बने, जनगणमन धनवान।
सारे भोंपू बेंच दे, यदि यह हिंदुस्तान।|

करे आत्महत्या कृषक, दे किस्मत को दोष।
असली दोषी मस्त क्यों, क्यों विपक्ष में रोष।।

रस्सी रिश्ते एक से, अधिक ऐंठ उलझाय।
हो जाये यदि ऐंठ कम, लड़ी-लड़ी खुल जाय ।।

रस्सी जैसी जिंदगी, तने तने हालात।
एक सिरे पे ख्वाहिशें, दूजे पे औकात।।

करतल ध्वनि हित जब भिड़े, दो दो हाथ अनेक।
अश्रु पोंछ दे तब वहाँ, केवल उंगली एक।

Monday, 8 January 2018

फ़ायलुन × 4


मैंने* तुझसे कहा, तूने* मुझसे कहा।
तू तो* समझी नहीं, मैं भी* उलझा रहा।।

देती* चेतावनी, ठोकरें भी लगीं
तू तो* पत्थर उठा किन्तु देती बहा।

तंग करती रही, हिचकियां भी मे*री 
पानी* पी पी मगर तू तो* लेती नहा।

दाँत के बीच मे जीभ मेरी फँसी
पर लगाती रही तू सदा कहकहा।।

देख रविकर रहा, गम के आंसू पिये
दर्द बढ़ता गया अब न जाए सहा।

Thursday, 30 November 2017

फिर सोने के दुर्ग में, पति बिन कौन उदास-

सच्चे शुभचिंतक रखें, तारागण सा तेज़।
अँधियारे में झट दिखें, रविकर इन्हें सहेज।।

शीशा सिसकारी भरे, पत्थर खाये भाव।
टकराना हितकर नहीं, बेहतर है अलगाव।।

खोज रहा बाहर मनुज, राहत चैन सुकून।
ताप दाब मधुमेह कफ़, अन्दर करते खून।।

ठोकर खा खा खुद उठा, रविकर बारम्बार।
लोग आज कहते दिखे, बड़ा तजुर्बेकार।।

गुमनामी में ही मिले, अब तो दिली सुकून।
शोहरत पा बेचैन है, रविकर अफलातून।।

सुखकर के पीछे पड़े, जो हितकर को भूल।
खुद को मिटते देखते, वो ही नामाकूल।। ।।

मानव के वश में नहीं, रंग-रूप-आकार।
पर अपने किरदार का, वो खुद जिम्मेदार।।

वाणी कार्य विचार को, दर किनार कर व्यक्ति।।
चेहरे से परिचय करे, हो अन्तत: विरक्ति।।

रविकर जीवन-पुस्तिका, पलटे पृष्ट समाज।
वैसे के वैसे मिले, थे जैसे अल्फ़ाज़।।

 शक्ति समय पैसा नहीं, मिले कभी भी संग।
वृद्ध युवा बालक दिखे, क्रमश: इनसे तंग।।

रविकर जीवन-पुस्तिका, पलटे पृष्ट हजार।
वैसे के वैसे मिले, शब्द-अर्थ हर बार।।

जो गवाह संघर्ष का, मूल्य उसे ही ज्ञात।
प्राप्त सफलता को कहें, अन्य भाग्य की बात।।

चक्की चलती न्याय की, देती घुन भी पीस।
असहनीय होती रही, बुरे वक्त की टीस।

अतिशय ऊँचा लक्ष्य जब, डगर नहीं आसान।
किन्तु डगर तो डग तले, मत डगमगा जवान।।

रुपिया हीरा स्वर्ण से, कौन बने धनवान।
शुभ विचार सद्मित्र से, धनी बने इन्सान।।

रैन बसेरे में रुके, या कोठी का व्यक्ति।
सोना रहे खरीद वे, दिखी गजब आसक्ति।।

सोने का मृग माँगती, जब रविकर पति पास ।
फिर सोने के दुर्ग में, पति बिन कौन उदास।।

गुड्डी उड़ी गुमान में, माँझे को दुत्कार |
लिए लुटेरे लग्गियाँ, दिखे घूटते लार ||||

दुर्जन पे विश्वास से, आधा दुखे शरीर।
सज्जन पे शक ने दिया, पूरे तन की पीर।।

Thursday, 9 November 2017

पर दूसरे की गलतियों पर रह सका वह मौन कब-

जब मैल कानों में भरा, आवाज देना व्यर्थ तब।
आवाज़ कब अपनी सुने, मन में भरा हो मैल जब।
करता नजर-अंदाज खुद की गलतियाँ रख पीठ पे-
पर दूसरे की गलतियों पर रह सका वह मौन कब।।

Monday, 6 November 2017

यद्यपि सहारे बिन जिया वह लाश के ही भेष में-


जिंदा मिला तो मारते, हम सर्प चूहा देश में।

लेकिन उसी को पूजते, पत्थर शिला के वेश में।
कंधा दिया जब लाश को तो प्राप्त करते पुण्य हम
यद्यपि सहारे बिन जिया वह लाश के ही भेष में।।



खिचड़ी

हुआ गीला अगर आटा, गरीबी खूब खलती है।
करो मत बन्धुवर गलती, नहीं जब दाल गलती है।
लफंगे देश दुनिया के सदा खिचड़ी पकाते हैं।
स्वयं का पेट भरते किन्तु, जनता हाथ मलती है।।

जुताई में बुवाई में सिंचाई में निराई में।
लगे दो माह पकने में, कटाई में पिटाई में।
कड़ी मेहनत समर्पण से मिले फिर अन्न के दाने।
कटोरा भर मगर जूठन रहे झट फेंक बेगाने।।


तुम रंग गिरगिट सा बदलना छोड़ दो।
परिपक्व फल सा रंग बदलो अब जरा।
जैसे नरम स्वादिष्ट मीठा फल हुआ।
वैसे मधुरता नम्रता विश्वास ला ।।


परिंदा यह बड़ा जिद्दी, बहुत सी ख्वाहिशें ढोये।
रहा नित खोजता मरहम, मगर गम लीलकर सोये।
सदा उम्मीद पर जिंदा, परिंदा किन्तु शर्मिन्दा
कतरती पंख उम्मीदें, प्रियतमा कैंचियाँ धोये।।


पहेली

पढ़ाये पाठ पहले गुरु, परीक्षा बाद में लेता।
सफलता प्राप्त कर चेला, प्रकट आभार कर देता।
महागुरु है मगर वह तो, परीक्षा ले रहा पहले,
सिखाता पाठ फिर पीछे, मनुज-मन मार से दहले।।

समस्यायें सुनाते भक्त दुखड़ा रोज गाते हैं-

प्रवंचक दे रहे प्रवचन सुने सब अक्ल के अंधे।
बड़े उद्योग में शामिल हुये अब धर्म के धंधे।।

अगर जीवन मरण भगवान के ही हाथ में बाबा।
सुरक्षा जेड श्रेणी की चले क्यों साथ में बाबा।
हमेशा मोह माया छोड़ना रविकर सिखाते जब
बना क्यों पुत्र को वारिस बिठाते माथ पे बाबा।।

समस्यायें सुनाते भक्त दुखड़ा रोज गाते हैं।
समझ भगवान बाबा को सदा दरबार आते हैं।
मगर जब रेप का आरोप बाबा पर लगे रविकर
वकीलों की बड़ी सी फौज तब बाबा बुलाते हैं।।

पड़ा बीमार जब वह भक्त पूजा-पाठ करवाये।
दुआ-ताबीज़ बाबा की मगर कुछ काम ना आये।
तबीयत किन्तु बाबा की जरा नासाज क्या होती
दुआयें भक्त तो करते, चिकित्सक किन्तु बुलवाये।।