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Saturday, 14 April 2012

कर जीवन-पर्यंत, भाग्य उद्यम से जागे -

मुलाक़ात कर लूँ


बड़ी बेतुकी बात है, प्रियवर कवि-यशवंत ।
क़दमों के पाए निशाँ , क्यूँ चूके श्रीमंत ।

क्यूँ चूके श्रीमंत, बढ़ो चिन्हों पर आगे  ।
कर जीवन-पर्यंत, भाग्य उद्यम से जागे ।

रविकर सच्ची रूह,  ढूंढता हरदम जिसको ।
मुलाक़ात कर जाय, पकड़ ले जल्दी उसको ।।

 ढर्रा बहुत खराब यह, सोच चढ़े परवान ।
छोटी मोटी चोरियां, करें नहीं कल्याण ।

करें नहीं कल्याण, हाथ लंबा कुछ मारो ।
कालेज में कलेज, व्यर्थ ही भैया जारो ।
 
मिला नहीं प्रोजेक्ट, कलेजा कर के कर्रा ।
लेक्चर का अभ्यास, पकड़ बाबा का ढर्रा ।  

Saturday, 17 March 2012

क्यूँ महंगी सिगरेट से, रहा करेज जलाय-


नमक छिड़किये घाव पर, बजट रहा बरसाय ।
क्यूँ महंगी सिगरेट से, रहा करेज जलाय । 
रहा करेज जलाय , जलाए खुद को बन्दा ।
माचिस सस्ती पाय, फूंक दे बजट पुलिन्दा ।
तौले प्रणव प्रधान, धान सब बइस पसेरी ।
खींचे चौपट कान,  बढ़ा फिर नगर अँधेरी ।।

चर्चा में खर्चा करे, घंटों चर्चाकार |
सुन्दर-अतिसुन्दर लिखे, पाठक होता पार |
पाठक होता पार, समय की पड़ती मुश्किल |
बाढ़े ब्लॉग अपार, श्रेष्ठ प्रस्तुति कर शामिल |
सुविधा देता मंच, पढो सब बढ़िया परचा |
करता नहीं प्रपंच, करे तन-मन से चर्चा ||


हास्य टिप्पणी - गंभीर हो गई ।।
जहर बुझी बातें करें, जब प्राणान्तक चोट ।  
जहर-मोहरा पीस के, लूँ दारू संग घोट ।
लूँ दारू संग घोट, पोट न तुमको पाया।
मुझमे थी सब खोट, आज मै खूब अघाया ।
प्रश्न-पत्र सा ध्यान, लगाकर व्यर्थे ताका ।
सौ प्रतिशत सहमत रहा, कथा हकीकत पास |
मगर कुतर्की को कभी, सत्य न आये रास ||  


फुहार....: रिश्वत लिए वगैर.... 


रिश्वत-मद नस-नस बहे, बेबस "धीर" शरीर ।
श्रोता-पाठक एक से, प्यासे छोड़ें तीर ।  
प्यासे छोड़ें तीर, तीर सब कवि के सहता ।
विषय बड़ा गंभीर, कभी न कुछ भी कहता ।
जाए टिप्पण छोड़, वाह री उसकी किस्मत ।
चाहे बांह मरोड़,  धरो पहले कुछ रिश्वत ।


 पूरब से आती खबर, करे कलेजा चाक ।
शूर्पनखा सरकार की, कटी हमेशा नाक ।  
कटी हमेशा नाक, करे न ठोस फैसला ।
घातक ज्वर का वार, गार्जियन हुआ बावला ।
सूझे नहीं उपाय, रही संतानें खाती ।
मारे है तड़पाय, खबर पूरब से आती । 


तम में उषा की किरण, झींगुर नीरव माँय |
प्यासा चाटे ओस कण, क्रोध हरे मुसकाय |

जंगल में इक पथ मिले, कोलाहल में मौन | 
जीवन के प्रतीति सी, कण कण में तू कौन | 

Saturday, 3 March 2012

बाहर की क्या बात, आज घर में ही डरती

प्यार मिले परिवार का, पुत्र-पिता पति साथ ।
देवी मुझको मत बना, झुका नहीं नित माथ ।
झुका नहीं नित माथ, झूठ आडम्बर छाये ।
कन्या-देवी पूज, जुल्म उनपर ही ढाये ।
दुग्ध-रक्त तन प्राण, निछावर सब कुछ करती ।
बाहर की क्या बात, आज घर में ही डरती ।।

कविताओं की बात है, बड़ी निराली मित्र ।
जैसा चाहे खींच ले, मनमाफिक कवि चित्र । 
मनमाफिक कवि चित्र, सजन के संग में झूले ।
पिया बसे परदेश, मजे से उनको छूले ।
केवल करे सवाल, चुने उत्तर फिर आला ।
मांगे नहीं जवाब, बंद जो मुख पर ताला।।
लेखक आलोचक बुधिल, चिंतन में मशगूल ।
 वे ही तो व्याख्या करें, कवि की ऊलजुलूल ।।

फिल्म समीक्षा है कठिन, विषयवस्तु जब सत्य ।
दिल-दिमाग रोमांच में, जाय भटक न तथ्य  ।
जाय भटक न तथ्य, खिलाड़ी कितना आला ।
किन्तु नपुंसक राज, पान को चम्बल पाला ।
ज्यादातर उन्माद, लिया है कड़ी परीक्षा ।
जब चम्बल की बात, कठिन तब फिल्म समीक्षा ।।
 होली का त्यौहार, मनाये इस्ट्राबेरी ।
हरी हरी हो लाल, करे काहे तू देरी ।
सुन्दर स्वाद सुगंध, मोह लेती है मन को  
भर लो रंग-गुलाल, बजे होली रणभेरी ।।



सुलझे अंतरजाल पर, दिया दनादन छाप ।
 अध्ययन चिंतन के बिना, पूरा किया प्रलाप ।
पूरा किया प्रलाप, अजी मौलिकता छोड़े ।
दृष्टिकोण ना साफ़, विषय को तोड़-मरोड़े ।
नहीं विधा की बात, स्वयं में उलझे उलझे ।
मत करना उम्मीद, नहीं प्रतिपादन सुलझे । 


पानी ढोने का करे, जो बन्दा व्यापार ।
मरे डूब कर पर कभी, प्यास सके न मार ।
प्यास सके न मार, नदी में बहते जाते ।
क्या खारा जलधार, आज जो अश्क बहाते ।
है रविकर खुदगर्ज, नहीं समझो बेइमानी ।
बढ़ जायेगा मर्ज, जरा सा पी लो पानी ।। 



शिद्दत से चाहा किये, करते नहीं प्रयास ।
चाहत तो रहती बनी, पूर्ण न होवे आस ।।
पूर्ण न होवे आस, घास न डाले किस्मत ।
उद्दम बिन अरदास, टूट जाती है हिम्मत।
टिटिहरी अड़ जाय, समंदर भी हारा है ।
करते रहो उपाय, साथ कृष्णा प्यारा है ।।
दिनेश की टिप्पणी-आपकी पोस्ट का लिंक  
dineshkidillagi.blogspot.com

Wednesday, 29 February 2012

मिल जाता मनमीत, छूटती सखियाँ सारी-


झारखंड से भेजता, शुभ-कामना असीम ।
मन-रंजक, मन-भावनी, इस प्रस्तुति की थीम । 
इस प्रस्तुति की थीम, नया जो कुछ भी पाया।
होता मन गमगीन, पुराना बहुत लुटाया ।
पर रविकर यह रीत, चुकाते कीमत भारी ।
मिल जाता मनमीत, छूटती सखियाँ सारी ।।

 
नेताओं पर कर रहे, शास्त्री जी जब व्यंग ।
होली में जैसे लगा, तारकोल सा रंग ।
तारकोल सा रंग, बड़ी मोटी है चमड़ी ।
नेताओं के ढंग, देश बेंचे दस दमड़ी । 
बेचारी यह फौज, आज तक बचा रही है ।
करें अन्यथा मौज, नीचता नचा रही है ।।

 
अपने मन-माफिक चलें, तोड़ें नित कानून ।
जो इनकी माने नहीं, देते उसको भून ।
देते उसको भून, खून इनका है गन्दा ।
सत्ता लागे चून, पड़े न धंधा मन्दा ।
बच के रहिये लोग, मिले न इनसे माफ़ी ।
महानगर में एक, माफिया होता काफी ।।
  चंदा का धंधा चले, कभी होय न मंद ।
गन्दा बन्दा भी भला, डाले सिक्के चंद ।
डाले सिक्के चंद, बंद फिर करिए नाहीं ।
चूसो नित मकरंद, करो पुरजोर उगाही ।
सर्वेसर्वा मस्त, तोड़ कानूनी फंदा  ।
होवे मार्ग प्रशस्त, बटोरो खुलकर चंदा ।।

खुद को सुकून देते हो या उसे ..

खुश होने के कारण तो अपने पास होते हैं 
सामनेवाला ( अधिकांशतः ) आंसू देखने में सुकून पाता है 
अब फैसला तुम्हारे हाथ है 
खुद को सुकून देते हो या उसे ..
- रश्मि प्रभा
दूजे के दुःख में ख़ुशी, दुर्जन लेते ढूँढ़ ।
अश्रु बहाते व्यर्थ ही, निर्बल अबला मूढ़ ।।




सुनिए प्रभू पुकार, आर्तनाद पर शांत क्यूँ ।
हाथ आपके चार, क्या शोभा की चीज है ।

सारी दुनिया त्रस्त, कुछ पाखंडी लूटते ।
भक्त आपके पस्त, बढती जाती खीज है ।।



आशा के विश्वास को, लगे न प्रभु जी ठेस ।
होवे हरदम बलवती, धर-धर कर नव भेस ।। 

कल की खूबी-खामियाँ, रखो बाँध के गाँठ ।
विश्लेषण करते रहो, उमर हो रही साठ ।
उमर हो रही साठ, हुआ सठियाना चालू ।
बहुत निकाला तेल, मसल कर-कर के बालू ।
 दिया सदा उपदेश, भेजा अब ना खा मियाँ  ।
देत खामियाँ क्लेश,  कल की खूबी ला मियाँ ।।

Sunday, 23 October 2011

रविकर की पहली रचना ; अक्तूबर1978

री अजन्ते दूर अब तुझसे चला मैं, http://www.shunya.net/Pictures/South%20India/Ajanta/AjantaCaves38.jpg

विश्वास है बिलकुल नहीं कि भूल मैं तुझको सकूँगा -
जब रुपहली मोतियाँ खिलखिलायेंगी कभी -
घिर घटाएं माह पावस में सुनाएँ गरजने-
जब कभी व्याकुल नजर जा टिके उत्तुंग शिख पर -
ऋतुराज आकर या सुनाये जब प्रिये रव कोकिला-
याद कैसे छोड़ दूंगा तब भला मैं |
री अजन्ते दूर अब तुझसे चला मैं ||

India Ajanta Cave Painting: Ajanta Caves Photos, Ajanta Caves Wallpapers, Ajanta Caves Galleries ...
सत्य है अब भी यही कि रूप पर आसक्त हूँ मैं -
पर तिमिर एकांत में, आवेश में उन्माद में भी -
कह नहीं सकती कि चाहा रूप पर अधिकार तेरे |
पर मधुप क्या दूर रह पाया मधुरता से कभी -
बन पतिंगा रूप पर तेरे जला  मैं |
री अजन्ते दूर अब तुझसे चला मैं ||
http://www.shunya.net/Pictures/South%20India/Ajanta/Ajanta08.jpg
पर समझ पाया नहीं मैं आप का यह खेल अब भी -
भूल करके इस भले को घर बनाओगी धरा पर -
खूबसूरत गुम्बदों को शीश पर ढोती रही तुम-
अंगूरी लताएँ खूबसूरत साथ में सजती रही जो -
चैन कैसे पा सकूँ उनको भुला मैं |
री अजन्ते दूर अब तुझसे चला मैं ||

Sunday, 16 October 2011

तुकबन्दियाँ करने लगा, होवे जरा नजरे-इनायत

 फातिमा  कुलसुम  जोहर  गोदाबरी 

सउदी  अरबिया की मलिका 

Most Beautiful Woman In THe World
क्षमा सहित, सादर  

सुन दर्द के ओ कारखाने, 
कम पड़ा क्या माल कच्चा 
आधा-अधूरा  ही बना,  
मझधार में  इक  और गच्चा ||

Image of Rusty the Boy Robot
है खुब जरुरत आँसुओं की, 
ये दिल दरकने के करीब-
अब जुल्म सारे सह सकूँगा,  
रह गया ना छोट बच्चा ||

उस रात खर्राटें भरीं थी
अखिल भारत गोष्ठी  में-
कैसे बनोगे श्रेष्ठ-शायर ?
 पूँछ  बैठे  बड़े  चच्चा ||  


  
Mirza_ghalib_t600
तुकबन्दियाँ  करने  लगा, 
होवे  जरा नजरे-इनायत-
आशुकवि  'रविकर' बने
  तू गटक मेरा प्रेम-सच्चा ||


Friday, 15 July 2011

बाबा बहुत बुलाये रे --

 प्रेरक - शास्त्री जी और शर्मा जी 
                                  (1)
आजा वापस प्यारे बचपन, पचपन  बड़ा  सताए  रे |
गठिया की पीड़ा से ज्यादा, मन-गठिया तडपाये  रे |
भटक-भटक के अटक रहा ये, जिधर इसे कुछ भाये रे  |
आजा वापस प्यारे बचपन, पचपन  बड़ा  सताए  रे ||1||
                                 (2)
बच्चों के संग अपना जीवन, मस्ती  भरा  बिताया  रे |
रोज साथ में खेलकूद कर, नीति-नियम सिखलाया रे |
माता  वैरी, शत्रु  पिता  जो,  बच्चे  नहीं  पढाया   रे |

तन्मयता से एक-एक को,  डिग्री  बड़ी  दिलाया  रे  ||2||
                                 (3)
गये सभी परदेस कमाने, विरह-गीत मन गाये रे |

रूप बदल के आजा बचपन, बाबा  बहुत बुलाये रे |
गठिया की पीड़ा से ज्यादा, मन-गठिया तडपाये रे | 
आजा वापस प्यारे बचपन, पचपन बड़ा सताए रे ||3||

जनता पूछे देश में, कितने महिने और |