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Friday, 8 July 2011

कई तरह के करों से, लगिहै मुर्ग-कबाब |

घर  की  चटनी-रोटियां, सदा मौज से चाब,
कई तरह के  टैक्स से,  लगिहै  मुर्ग-कबाब |

लगिहै  मुर्ग-कबाब, चला दतखुदनी   ऐसे, 
हो  मुर्गे  की  टांग , फँसी  दांतों  में जैसे |

कर  अभिनय  पुरजोर, डकरते  निकलो बाहर |
मँहगाई पुरजोर, चले अब ऐसे ही घर ||

6 comments:

  1. कर अभिनय पुरजोर, डकरते निकलो बाहर,
    ईंधन-राशन तेज, चले अब लुढ़क-लुढ़क घर ||
    सही है महंगाई की मार अच्छे अच्छों की कमर तोड़ देती है.बहुत खूब कही है

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  2. ईंधन-राशन तेज, चले अब लुढ़क-लुढ़क घर

    लगभग हर मध्यम वर्गीय परिवार की यही स्थिति है.

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  3. अहा! मज़ा आ गया। एक और सशक्त ब्लॉगर का प्रवेश हुआ है ब्लॉगजगत में।

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  4. सशक्त रचना .गागर में सागर .
    रूखी सूखी खाय के ठंडा पानी पीव ,
    देख पराई चूपड़ी मत ललचावे जीव .
    अब इसी रूखी सूखी खाने का वक्त आ गया है .महंगाई और सेहत दोनों के लिए मुफीद .

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  5. अच्छा संदेश...सुन्दर अभिव्यक्ति व्यंगात्मक स्वर में

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