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Friday, 1 July 2011

याद प्रिय आते रहो

याद प्रिय आते रहो कुछ इस तरह,
मन-समंदर में कि जैसे  ज्वार आये|

प्रत्येक दिन एक बार हौले से सही,
मास में पुरजोर प्रिय दो बार आये |

पूर्णिमा की चांदनी अथवा अमावस,
तार  के  बेतार   से   टंकार   आये |

सीपियों-शंखो की  भाषा में लिखे,
हृदय-तट पर प्यार फैले प्यार आये |

किरणे-उजाले - धूप-तारे - चांदनी,
की शिकायत तू मिटा दे  द्वार आये|

काम का बन्दा,  नकारा  हो चुका, 
शब्द-भावों पर जरा अधिकार आये |

जब कभी होगी प्रिये नजरे-इनायत,
और 'रविकर' शायरी में धार आये ||

9 comments:

  1. दिनेश जी, आपकी रचनाएँ केवल दिल्लगी नहीं लगतीं, ये तो का भाव का उत्कर्ष हैं.
    ऎसी तराशी हुई रचनाओं के सृजन की कामना तो मैं निरंतर 'माँ शारदा' से करता रहा हूँ.
    आपका लेखन ऊँचाइयाँ छू रहा है. केवल उच्चारण का सुख जिह्वा ही नहीं ले रही अपितु
    मन भी रमा जा रहा है.

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  2. 'सीपियों-शंखो की भाषा में लिखे,
    हृदय-तट पर प्यार फैले प्यार आये'

    इसको केवल दिल्लगी नहीं कहा जाएगा ज़नाब! गहरे भावों और सुआग्रहों से परिपूर्ण गम्भीर रचना है...बधाई

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  3. पूर्णिमा की चांदनी अथवा अमावस ,
    मॉस में पुरजोर प्रिय दो बार आये ।
    तार के बे -तार से टंकार आये ।
    जब कभी होगी प्रिये नजरे इनायत ,

    और रविकर शायरी में जान आये ।
    बहुत खूब !पूरी धार है साहब शायरी में और क्या बच्चे की जान लोगे .

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  4. बहुत ही सुंदर और जानदार,
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  5. आस्था रखने पर बल जरुर मिलेगा ! सुन्दर कविता !

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  6. सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ शानदार और ज़बरदस्त रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है!

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  7. काम का बन्दा, नकारा हो चुका,
    शब्द-भावों पर जरा अधिकार आये |
    --
    ग़ज़ल का हर एक अशआर बहुत खूबसूरत है!

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  8. याद प्रिय आते रहो कुछ इस तरह,
    मन-समंदर में कि जैसे ज्वार आये|..
    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति सुन्दर भाव एवं शब्दों का संयोजन....

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