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Thursday, 21 July 2011

बहन ने परदेशी भाई को दिए जख्म ||

सम्बन्धों  में जब दिखे, अपने तनिक खटास |
बलि का बकरा ढूंढ़ लो,  जो   कोई   हो  पास || 

क्यों भाई जोशी  ?
हाँ पडोसी ||

जख्मों का दुर्गन्ध जो,  फ़ैल रहा है आज |
मरहम पट्टी का सही, रहा नहीं अन्दाज ||
                                                                     
क्यों भाई जोशी  ?
हाँ पडोसी ||

दुनिया  की  खातिर किया, भर्ती  नर्सिंग होम,
अग्नि में जलकर बंटा, धरा वायु जल व्योम ||

क्यों भाई जोशी  ?
हाँ पडोसी ||

चुनो फूल सम्मान से,  गये  छोड़ इहलोक |
सगे  हमारे बाप जी,  कर तेरह दिन शोक ||

क्यों भाई जोशी  ?
हाँ पडोसी || 

तेरहवीं  भी  हो  गई, विदा  हुए  मेहमान |
बहनोई-बहिने रुकी, लेकर जमी-मकान ||   

क्यों भाई जोशी  ?
हाँ पडोसी ||

घटी  रोशनी  में भला,  बटेगा  कैसे  माल |
फूल झाड़कर के जरा, फिरसे दीपक बाल ||

क्यों भाई जोशी  ?
हाँ पडोसी ||

अपना  हिस्सा  पाय  के,  धूनी  रहे  रमाय |
इक मकान में "सात" घर, देखो रहे समाय ||


क्यों भाई जोशी  ?
हाँ पडोसी ||

था  दहेज़  मोटा दिया, कर्जा  भरा कमाय,
बहिनों के वर्ताव से, घर-भर गए अघाय ||

क्यों भाई जोशी  ?
हाँ पडोसी || 

30 comments:

  1. कयों भाई रविकर! ऐसा क्यूँ कर...वाह! जी वाह!

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  2. क्यों भाई जोशी
    हाँ पड़ोसी
    के साथ घर घर की व्यथा का गहरा विश्लेषण .

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  3. क्यों भाई जोशी ?
    हाँ पडोसी ||
    बहुत अच्छी लगी ये भावाभिव्यक्ति आपकी याद दिला गयी
    एक फ़िल्मी गाने की-
    ''क्यों भाई चाचा
    हाँ भतीजा

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  4. kyo bhai
    beautiful poem

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  5. गहन बात ..पर ज्यादातर बहने ऐसी निर्दयी नहीं होतीं

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  6. क्यों भाई जोशी ?
    हाँ पडोसी ||
    baar baar in shabdon ka prayog gudgudata hai..phir jindago ki hakikat batata hai...aapka prayas kaphi accha laga..hardi badhayi

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  7. क्यों भाई जोशी
    हाँ पड़ोसी ....के सुन्दर शब्द योजना के पीछे घर घर का दर्द छिपा है

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  8. आप सभी का स्वागत है ||

    आभार सभी भाई-बहनों का ||

    अधिकतर बहनें इस श्रेणी में नहीं आती ||

    भाइयों को भी अनवरत राखी की लाज रखनी चाहिए ||

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  9. गहन भावों का समावेश ...बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  10. एक सलाह और जोड़ कर देते हम को खुश

    पड़ना पचड़ो मे दूसरों के है सदा अहितकर

    खास कर जब पड़ोसी नया नया आया हो मोहल्ले मे

    अपने राम अपने मे खुश लड़्ते रहे लादेन और जार्ज बुश

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  11. बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  12. अपना हिस्सा पाय के, धूनी रहे रमाय |
    इक मकान में "सात" घर, देखो रहे समाय ||...

    jitni bhi taareef karun , kam hogi !

    waah !


    .

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  13. तेरहवीं भी हो गई, विदा हुए मेहमान |
    बहनोई-बहिने रुकी, लेकर जमी-मकान ||

    आम के आम , गुठलियों के दाम.

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  14. रविकर के दोहे -
    क्या खूब -मस्त अंदाज -गजब का व्यंग -दोहों के हर अंग में समाया दर्द पीड़ा -आँखें खोल देने वाले सटीक -बधाई हो -

    तेरहवीं भी हो गई, विदा हुए मेहमान |
    बहनोई-बहिने रुकी, लेकर जमी-मकान ||

    आदरणीय रविकर जी हार्दिक आभार आप का बच्चों की रचनाओं और इस ब्लॉग को आप का समर्थन मिला ख़ुशी हुयी अपना सुझाव् व् समर्थन भी देते रहें
    सच कहा आप ने-नन्हे मुन्ने बच्चे बन लिखना संयम से बहुत कठिन है
    आभार आप का पुनः
    शुक्ल भ्रमर ५
    बाल झरोखा सत्यम की दुनिया

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  15. जीवन के समानांतर दोहे
    ठोस लग रहे जैसे लोहे
    बेहद नीको लागे मोहे
    धन्यवाद है कविवर तोहे

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  16. अच्छी प्रस्तुति।

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  17. तेरहवीं भी हो गई, विदा हुए मेहमान |
    बहनोई-बहिने रुकी, लेकर जमी-मकान ...

    वाह वाह दिनेश जी ... कुछ कड़वी बातें जरूर हैं पर सत्य हैं ...

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  18. क्यों भाई रविकर, हाँ संदीप

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  19. बहुत ख़ूबसूरत और भावपूर्ण रचना! बेहतरीन प्रस्तुती!
    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

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  20. बहुत सुंदर अंदाज,
    वाह,

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  21. तेरहवीं भी हो गई, विदा हुए मेहमान |
    बहनोई-बहिने रुकी, लेकर जमी-मकान ||
    हर पँक्ति समाज पर गहरा कटाक्ष है। शुभकामनायें।

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  22. सुंदर कोमल और संवेदनशील भाव

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  23. आपका तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और शुभकामनाएं देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद/शुक्रिया

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  24. 9 दिन तक ब्लोगिंग से दूर रहा इस लिए आपके ब्लॉग पर नहीं आया उसके लिए क्षमा चाहता हूँ ...आपका सवाई सिंह राजपुरोहित

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  25. अरे वाह!...बहुत ख़ूब

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  26. इक "मकान में सात "घर" देखो रहे समाय .मार्मिक शब्द चित्र घरु व्यथा का .

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  27. रवि कवि जी ! गुड़ , देहात में आज भी गुड़ मिलता है और कोल्हू पे जाओ तो फ़्री मिलता है बिल्कुल आपकी पोस्ट की तरह ।

    धन्यवाद !

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