Friday, 9 March 2012

भ्रूण-हत्या आघात, पाय न पातक पानी


संजय की दृष्टी सजग, जात्य-जगत जा जाग ।
जीवन में जागे  नहीं, लगे पिता पर दाग ।
लगे पिता पर दाग, पालिए सकल भवानी।
भ्रूण-हत्या आघात, पाय न पातक पानी ।
निर्भय जीवन सौंप, बचाओ पावन सृष्टी ।
कहीं होय न लोप, दिखाती संजय दृष्टी ।।

प्रतियोगी बिलकुल नहीं, हैं प्रतिपूरक जान ।
इक दूजे की मदद से, दुनिया बने महान ।
दुनिया बने महान, सही आशा-प्रत्याशा ।
पुत्री बने महान, बाँटता पिता बताशा ।
बच्चों के प्रतिमोह, किसे ममता ना होगी ।
पति-पत्नी माँ-बाप, नहीं कोई प्रतियोगी ।। 


इष्ट-मित्र परिवार को, सहनशक्ति दे राम ।
रावण-कुल का नाश हो, होवे काम तमाम ।
होवे काम तमाम, अजन्मे दे दे माफ़ी ।
अमर पिता का नाम, बढ़ाना आगे काफी ।
इस दुनिया का हाल, राम जी अच्छा करिए ।
नव-आगन्तुक बाल, हाथ उसके सिर धरिये ।।



मृदुला'ज ब्लॉग  
अमल-पुष्प सह-गंध को, दूँ ढेरों आशीष ।
यश फैले सारे जगत, सुख शान्ति दे ईश ।। 




भय का भी जग में रहा, भला अनोखा योग ।
 निर्धारक सुन नीति के, कर अभिनव प्रयोग ।
कर अभिनव प्रयोग, दूर से छड़ी दिखाना  ।
 इम्तिहान का भय, तनिक  फिर से ले आना ।
मर्जी से सब बाल, पढ़ें ना पाठ जरुरी ।
जिम्मेदारी डाल, करे शिक्षा तो पूरी ।।


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होली है होलो हुलस, हुल्लड़ हुन हुल्लास।
कामयाब काया किलक, होय पूर्ण सब आस ।।

Wednesday, 7 March 2012

हो री हो ली चरम पर, भरमित घुर्मित लोग-

  दिलबाग विर्क 
 चर्चामंच   पर टिप्पणी
हो! हो! हो! होली हुई, हरफ-हरफ हुलसाय |
प्रेम-पत्रिका पाठकर,  पटु-पाठक पगलाय ||



पटु-पाठक पगलाय, प्रेम-पर प्रस्तुत परचा |
चंचल-मन चितलाय, चढ़े चाचरि चहुँ चरचा |



बाग़ बाग़ दिलबाग, निखरता तन-मन धो- धो |
होली सबको लाग, करें सब पागल हो! हो !!


कुछ पकड़ने में कुछ छूट जाता है।
बिटिया को शुभकामना, मात-पिता का स्नेह ।
सफल यात्रा हो प्रभू, बरसे मेहर-मेह ।
बरसे मेहर-मेह, छूटने कुछ न पाए ।
न कोई संदेह, समझ-दृढ़ता शुभ आये ।
पिता श्री बेचैन, भटकना इनकी आदत ।
यह होली की रैन, सभी का स्वागत-स्वागत ।।

स्पर्श प्यार का

खारा सागर मीठी गागर, शीत-ऊष्ण धाराएं |
कहीं मरुस्थल-उद्यानों में, भीषण-सुखद हवाएं |
चंदा की फितरत समझे मन, तन समझे घन वर्षा
अमृत बूंदाबांदी से यह जीवन-ऊसर हर्षा || 

हो री हो ली चरम पर, भरमित घुर्मित लोग ।
शर मारे कुसुमेस सर, सहना कठिन वियोग ।।  

होली की फाग .....

कान्हा लीला कर रहे, छत्तीसगढ़ को जात ।
मायावी योगी बड़े, सपना हैं भरमात । 
सपना हैं भरमात, खेलती दुनिया सारी।
रँगते सबके गात , चला के खुब पिचकारी ।
राधा धानी रंग, लाल से रंगे नीला ।
होली में भी तंग, करे है कान्हा-लीला ।। 
 (दिगम्बर नासवा)  
  स्वप्न मेरे......... 


आज दिगम्बर की गली, गली ठीक से दाल ।
कैलासी डोलें सकल, लागा नेह-गुलाल ।।
 हर पहलू को जांचती, आँखे अख्तर साब ।
  जो पढ़ ले ऑंखें उन्हें, मिलते सकल जवाब ।।  


एक साल सचमुच हुआ, पुत्र  बसा परदेस  |
अंत वित्तीय वर्ष कर, आएगा फिर देस ।
आएगा फिर देस, बेटियां घर को आईं ।
गलाकाट यह रेस, कैरिअर और पढ़ाई ।
होली का त्यौहार, दिवाली रक्षाबंधन ।
झूठे होते पार, साल से मेरे आँगन ।।

तीव्र वेग हो तीव्रतर, भरसक भागम भाग ।
 रोना फिर भी समय का, मिटे मोह अनुराग ।  
मिटे मोह अनुराग, लगे त्यौहार बदलने ।
नौसिखुओं की फाग, दाल लगती है गलने ।
संवाद हुए संक्षिप्त, रेस में पहले दौड़ें ।
मोबाइल विक्षिप्त,  भेजता मैसेज भौंडे ।।


दिनेश की टिप्पणी : आपका लिंक
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होली है होलो हुलस, हुल्लड़ हुन हुल्लास।
कामयाब काया किलक, होय पूर्ण सब आस ।।

Tuesday, 6 March 2012

किन्तु समय ना पास, समय का रोना रोते



गई बैलगाड़ी बदल, मेट्रो का कर साथ ।
त्वरित वेग वाहन चलें, लगे घूमने माथ । 
http://0.tqn.com/d/goindia/1/0/5/E/-/-/1166983_22947210.jpg
लगे घूमने माथ, स्वयं से हर-पल भोगे ।
भरे ऊर्जा पाथ,  सेकेण्ड नैनो उपयोगे ।
http://www.sportscarcup.com/cars/black-ferrari-fxx-front.jpg
किन्तु समय ना पास, समय का रोना रोते ।
हुए समय के दास, साथ अपनों का खोते ।।



Sunday, 4 March 2012

बाबा रहे सँभाल, बाबा को तुम देखना--


खुशियाँ हो भरपूर, कीर्तिवान हो जगत में ।
हो मनोकामना-पूर्ण, प्यारे बाबा के सकल ।।

बिद्या-बुद्धि शौर्य, शारद दुर्गा भेंटती ।
संयम निष्ठा धैर्य, मात-पिता गुरु से मिले ।।

अभ्युदय खुशहाल, होय निरोगी देह पुष्ट ।
बाबा रहे सँभाल, बाबा को तुम देखना ।।

ग़ाफ़िल की अमानत

लीडर यह सचमुच निडर, मिटा प्रतिष्ठा मूल।
फिरे जहन्नुम ढूंढता, फिर से खता क़ुबूल ।। 



रजनी में रजनीश की, धवल किरण इक आय ।
कालनिषा में दी दिखा, पाठक एक उपाय ।
पाठक एक उपाय, स्वान्त: लिखने वालों ।
जांचो-परखो खूब, पकाओ पहले सालों ।
 हो जाये जब टेस्ट, छापिये पुस्तक अपनी ।
तब दीमक न खाय, सुवासित होवे रजनी ।।


बढ़िया विश्लेषण पढ़ा,  कविवर तुम्हें प्रणाम ।
मातु नर्मदा का किया, वर्णन विविध तमाम ।
वर्णन विविध तमाम, बनी गंगा सी पावन ।
सींचे पेड़-पहाड़, अमर-कंटक से उपवन ।
सबसे बढ़िया बात, बूंद ताकत दिखलाए ।
एकल क्या औकात, मिले धरा बन जाए ।।


शीर्षक में है सादगी, मिला मसाला खूब ।
पीने का टाइम हुआ, गए घड़े में डूब ।। 
गए घड़े में डूब, होश की बातें भूले ।
नहीं तनिक भी ऊब, मस्त हो झूले झूले ।
पचपन थी यह देह, पचासी होती जाये ।
मद्य पचा सस्नेह, बुराई सारी भाये ।।


बेटी का दर्द देख बन गए बच्चों के हमदर्द

India Darpan

 

निज बेटे के दर्द सा, करे अलग अनुभूति ।
जज्बे की कर वंदना, करूँ प्रणम्य विभूति ।
करूँ प्रणम्य विभूति, धनी का हृदय भेदे ।
कर गरीब कल्याण, रोग दुनिया से खेदे ।
बुरी दशा है मित्र, आज भी इन गावों की ।
सब सरकार विचित्र, पोल खुलती दावों की ।।


मत बाँटो इंसान को

 

पंछी 

फितरत यह इंसान की, कहता हूँ दो टूक ।
टूक टूक करता रहे, नस्ल क्षेत्र पद कूट ।
नस्ल क्षेत्र पद कूट, बाँटता खुद को जावे ।
जाति-धर्म पथ गोत्र, जिला भाषा बहकावे ।
गौर सांवला वर्ण, पढ़े-अनपढ़ में बांटे ।
खड़ा अकेला पाय, अंत में खुद को काटे ।। 

च च  चपला चंचला, चमत्कार चौन्धाय।
चकित चकोरी चिहुकती, चभक चापती चाय । 
चभक चापती चाय, चकीरा चक्कस चलता ।
चकमक चक चिंगार, चीन्ह चुपचाप चुबलता ।
ऐ रविकर चल चाप, चरफरा चना चबैना ।
चुप चूँ-चूँ चिचियान,  चाहिए चौगुन चैना ।।


  बाल-बुद्धि लायक प्रभू , दुनिया देव बनाय ।
 दुनिया लायक अन्यथा, हिकमत देव सिखाय ।।

 दिनेश की टिप्पणी : आपका लिंक 
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होली  है  होलो  हुलस, हुल्लड़  हुन  हुल्लास।
कामयाब काया किलक, होय पूर्ण सब आस ।।

Saturday, 3 March 2012

बाहर की क्या बात, आज घर में ही डरती

प्यार मिले परिवार का, पुत्र-पिता पति साथ ।
देवी मुझको मत बना, झुका नहीं नित माथ ।
झुका नहीं नित माथ, झूठ आडम्बर छाये ।
कन्या-देवी पूज, जुल्म उनपर ही ढाये ।
दुग्ध-रक्त तन प्राण, निछावर सब कुछ करती ।
बाहर की क्या बात, आज घर में ही डरती ।।

कविताओं की बात है, बड़ी निराली मित्र ।
जैसा चाहे खींच ले, मनमाफिक कवि चित्र । 
मनमाफिक कवि चित्र, सजन के संग में झूले ।
पिया बसे परदेश, मजे से उनको छूले ।
केवल करे सवाल, चुने उत्तर फिर आला ।
मांगे नहीं जवाब, बंद जो मुख पर ताला।।
लेखक आलोचक बुधिल, चिंतन में मशगूल ।
 वे ही तो व्याख्या करें, कवि की ऊलजुलूल ।।

फिल्म समीक्षा है कठिन, विषयवस्तु जब सत्य ।
दिल-दिमाग रोमांच में, जाय भटक न तथ्य  ।
जाय भटक न तथ्य, खिलाड़ी कितना आला ।
किन्तु नपुंसक राज, पान को चम्बल पाला ।
ज्यादातर उन्माद, लिया है कड़ी परीक्षा ।
जब चम्बल की बात, कठिन तब फिल्म समीक्षा ।।
 होली का त्यौहार, मनाये इस्ट्राबेरी ।
हरी हरी हो लाल, करे काहे तू देरी ।
सुन्दर स्वाद सुगंध, मोह लेती है मन को  
भर लो रंग-गुलाल, बजे होली रणभेरी ।।



सुलझे अंतरजाल पर, दिया दनादन छाप ।
 अध्ययन चिंतन के बिना, पूरा किया प्रलाप ।
पूरा किया प्रलाप, अजी मौलिकता छोड़े ।
दृष्टिकोण ना साफ़, विषय को तोड़-मरोड़े ।
नहीं विधा की बात, स्वयं में उलझे उलझे ।
मत करना उम्मीद, नहीं प्रतिपादन सुलझे । 


पानी ढोने का करे, जो बन्दा व्यापार ।
मरे डूब कर पर कभी, प्यास सके न मार ।
प्यास सके न मार, नदी में बहते जाते ।
क्या खारा जलधार, आज जो अश्क बहाते ।
है रविकर खुदगर्ज, नहीं समझो बेइमानी ।
बढ़ जायेगा मर्ज, जरा सा पी लो पानी ।। 



शिद्दत से चाहा किये, करते नहीं प्रयास ।
चाहत तो रहती बनी, पूर्ण न होवे आस ।।
पूर्ण न होवे आस, घास न डाले किस्मत ।
उद्दम बिन अरदास, टूट जाती है हिम्मत।
टिटिहरी अड़ जाय, समंदर भी हारा है ।
करते रहो उपाय, साथ कृष्णा प्यारा है ।।
दिनेश की टिप्पणी-आपकी पोस्ट का लिंक  
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Friday, 2 March 2012

मनोजात अज्ञान, मने मनुजा की माया-


भाया ओज मनोज का, उल्लू कहती रोज ।
सम्मुख माने क्यूँ भला,  देती रहती डोज ।
देती रहती डोज, खोज कर मौके लाती ।
करूँ कर्म मैं सोझ, मगर हरदम नखराती ।
मनोजात अज्ञान, मने मनुजा की माया ।
चौबिस घंटे ध्यान, मगर न मुंह को भाया ।।



हँसी ख़ुशी से कर रही, वर्षों से मनुहार ।
मुखड़े पर मुस्कान की, है कबसे दरकार ।
है कबसे दरकार, उदासी तन्हाई है ।
सदा जोहता बाट, संदेशा पहुंचाई है ।
सुन रे ऐ नादान, ख़ुशी जमकर इतराती ।
जहाँ रहे मुस्कान, वहाँ मैं पहले आती ।। 
जोखू ने जोखा सही, यही है भैया रीत ।
पीढ़ी दर पीढ़ी बनत, भरत-जनों की मीत ।
भरत-जनों की मीत, ढीठ *दिग्गीश्वर जैसा ।*इंद्र 
माँ को एकै रोग, ठिकाने जमता पैसा ।
   द्रव्य सदी से सोख, चले देने फिर धोखा।
जमा बाप का माल, सही जोखू ने जोखा ।।


कंधे कुल्हाड़ी रखे, चला कृषक अनजान ।
सूरज की छाया मिले, चन्दा पथ की शान ।
चन्दा पथ की शान, हरे पत्ते फल लाली ।
यह नीला आकाश, काम के बने सवाली ।
हल की पकड़ी मूठ, चला गहरे वो गहरे ।
गन की गोली झूठ, लगा चाहे सौ पहरे ।।

  बस्तर की अभिव्यक्ति -जैसे कोई

नहीं कालिया-डाह था, गया जगह था छोड़ ।
रीढ़-विहीनों में लगी, रही तभी से होड़ ।
 रही तभी से होड़, छुपा कर रक्खा फन को ।
मिलें आज हर मोड़,  करें त्रस्त सज्जन गन को ।
तीन फनी यह सर्प, भूल से आया सम्मुख ।
भगा देखकर दर्प, दुर्जनों के दो सौ मुख ।।


  उच्चारण

शास्त्री जी की पोस्ट है, पाठक बेहद ख़ास ।

क्रम-संख्या सुनिए जरा, बारह सौ पच्चास ।

बारह सौ पच्चास, गुरु है बारहबानी ।

बारहमासी रास, नहीं है कोई सानी ।

लगा चुके हैं आप, आज पच्चीस पचासा ।

इन्तजार है पाक, करें हम सौ की आशा  ।।


और अंत में --

  महेन्द्र श्रीवास्तव  
 आधा सच..

चालिसवाँ मन भर गया, मन भर मने चुनाव ।
नगर-नगर भटका किये, घूम हजारों गाँव ।
घूम हजारों गाँव, खबर राहुल की बढ़िया ।
एस पी खेली दाँव, पकेगी सत्ता-हड़िया ।
भाजप फूंके छाछ, गाछ से बसपा नीचे ।
राज न जाना राज, अजित हैं आँखे मीचे ।। 

आगरा मे चौपाल के दौरान समय मिला तो मैं और संदीप पहुंच गए ताजमहल...

होली है होलो हुलस, हाजिर हफ्ता-हाट ।
चर्चित चर्चा-मंच पर, रविकर जोहे बाट ।

Thursday, 1 March 2012

गोरी कोरी क्यूँ रहे, होरी का त्यौहार --

    INDIAN CLICK GALLERY
 चीं-चीं चिड़िया चली उड़,चिचियाहट चित भंग ।
सूर्य अस्तगामी हुआ, रक्त आसमाँ रंग ।

रक्त आसमाँ रंग, साँझ होने को आई |
जंग आज की बन्द, काल्ह फिर करे चढ़ाई ।

प्राकृत का है खेल, समय ने सीमा खींची |
भोर लगे अलबेल, मस्त चिड़िया की चीं चीं ।। 

गोरी कोरी क्यूँ रहे, होरी का त्यौहार ।
छोरा छोरी दे कसम, ठुकराए इसरार ।

ठुकराए इसरार, छबीले का यह दुखड़ा ।
फिर पाया न पार, रँगा न गोरी मुखड़ा ।

लेकर रंग पलाश,  करूँ जो जोर-जोरी ।
डोरी तोड़ तड़ाक,  रूठ जाये ना गोरी ।।

सौ सुनार की चोट हित, मतदाता तैयार ।
इक लुहार की ठोक के, चाहे सुख-भिनसार ।
चाहे सुख-भिनसार, रात कुल पांच साल की ।
दुर्गति के आसार,  मुसीबत जान-माल की ।
चोरी लूट खसोट,  डकैती बलत्कार की ।
लुटा दिया जब वोट, सहो अब सौ सुनार की ।।
छज्जे पर बैठी गौरैय्या, फुर्र हो गई ।
द्वार बुहारे मेरी मैया, कहाँ खो गई ।
कौआ उल्लू तोता व्याकुल आसमान में-
मारक मोबाइल की टिन-टिन, उन्हें धो गई ।। 

पिट्सबर्ग का भारती, है गिट-पिट से दूर ।  
करे देश की आरती, देशभक्ति में चूर ।

देशभक्ति में चूर, सूंढ़ हाथी की शुभ-शुभ ।
 औषधि तुलसी बाघ, कैक्टस जाती चुभ-चुभ ।

तरी मसालेदार, बाग़ में सजी रंगोली ।
रेल कमल बुद्धत्व, गजब वो खेले होली ।। 

   उच्चारण
यह इम्तिहान है नहीं सखे, यही परम अभ्यास है ।  
गुण-दोष विवेचन पल पल करती, नित धरती आकाश है ।

सामर्थ्यवान बनने की रीती, अपनी एक समीक्षा यह-
बढ़ते तन के तुल्य बताती, बुद्धि हमारे पास है ।। 

charchamanch.blogspot.com
जिम्मेदारी  के  प्रती, रहते विर्क सचेत ।
पूरी निष्ठां से तुरत, चर्चा हैं कर देत ।
चर्चा हैं कर देत, लिंक सुन्दर सब साजे ।
होली का मृदंग, नगाड़े ढोलक बाजे ।
रविकर कहता मित्र, जमेगी अपनी यारी ।
कई उकेरे चित्र, निभाई जिम्मेदारी ।।