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Thursday, 30 June 2011

नोंक-झोंक-2 उर्फ़ सरेंडर

नोंक-झोंक-1    वो  

पैर बाहर अब निकलने लग पड़े | खींच के चादर जरा लम्बी करो || 
                 आप
पैर अपने मोड़ कर रखो तनिक, दूसरी चादर मिले, धीरज धरो ||
                  वो 
आपके कम्बल से आती है महक  ओढ़ कर पीते हुए घी क्यूँ चुआये ||
                आप 
रोज तिल का ताड़ तुम बेशक करो, कान पर अब जूं हमारे न रेंगाये ||                
(अपनी  टांग  उघारिये  आपहिं  मरिये  लाज)
पर -नोंक झोंक परसनल कहाँ रही--
                                वो
अपनी गरज तो बावली, दूजा नहीं दिखाय | अस्सी रूपया रोज का,  पानी   रहे  बहाय  ||
                                     आप
हो बड़की शौकीन तुम, मलमल लहँगा पाय | मैट्रिक्स  पार्लर  घूमती, कौआ  रही  उड़ाय ||  
                    वो 
सींग काटकर के सदा,  बछड़ों में  घुस जात  | फ़ोकट में दिन-रात जो, झूठे कलम घिसात ||  

बस-बस बस ---
            आप
जीभ को तालु से लगा, गया छोड़  मैदान || कम्प्यूटर  पर बैठ के, साफ़  बचाई जान  ||
नोंक-झोंक  के बाद--लौट के बुद्धू घर को आये  

                        आप
सब  कुछ  बाहर  छोड  के  लौटा  तेरे पास |
भूखा तेरे प्यार का, डाल जरा सी घास ||

                        वो
घंटों  से तू था  किधर, रहा था दाने डाल ||
नहीं फंसी चिड़िया तभी, शाकाहारी ख्याल ||

                       आप
सांप  नहीं हम हैं प्रिये,  खायें मात्र हवा ||
ऊंट को जब-तब चाहिए,  दारु-भोज-दवा ||

                           वो
नीति-नियम से पक रहा, बासी न बच जाय |
हो राशन  बर्बाद क्यूँ ,  काहे  कुक्कुर खाय || 

                          आप
नित कोल्हू के बैल सा, खटता आठो याम |
कीचड़  में  टट्टू फंसा, होवे काम तमाम  ||

नाच  नाचता मैं रहूँ , पल्ला पकड़ा तोर |
गाढ़े के साथी तुम्ही, भूख मिटा दो मोर ||

                     वो
एक आँख से रो रहे, दूजी हंसती जाय |
करवट बैठे ऊंट उस, जो पहाड़ बतलाय ||  

9 comments:

  1. बहुत अच्छा नोंक झोंका...सारे बहुत अच्छे

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  2. आपकी रचना पढने में मजा आया है, दिल खुश हुआ।

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  3. आपकी इस उत्कृष्ट प्रवि्ष्टी की चर्चा कल शुक्रवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल उद्देश्य से दी जा रही है!

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  4. नीति नियम से पक रहा ,बासी न बच जाय ,
    हो राशन बर्बाद क्यों ,क्क्क्हे कुक्कर खाय ।
    दिनेश भाई इधर उधर भटक रहा था कुछ ताज़ा पढने को मिले ,ताज़ा माल यहीं मिलता है .आइन्दा ध्यान रखेंगे ।
    ताज़ा जब मिलता रहे ,काहे बासी खाय,
    .................................................

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  5. नीति-नियम से पक रहा, बासी न बच जाय |
    हो राशन बर्बाद क्यूँ , काहे कुक्कुर खाय ||

    Kya Bat...Bahut Sunder

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  6. आप के कवीता बहुत आचा लगा

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  7. बढ़िया रही ये नॉक झोंक भी ..:)

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