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Friday, 20 September 2013

अग्गी करने से बचो, अग्गी करे अनर्थ -


रविकर रोटी सेंक, बोलता जिन्दा रह मत

रहमत लाशों पर नहीं, रहम तलाशो व्यर्थ |
अग्गी करने से बचो, अग्गी करे अनर्थ |

अग्गी करे अनर्थ, अगाड़ी जलती तीली |
जीवन-गाड़ी ख़ाक, आग फिर लाखों लीली |

करता गलती एक, उठाये कुनबा जहमत |
रविकर रोटी सेंक, बोलता जिन्दा रह मत ||



मुर्गे बड़े सुकून में, जब से मँहगा प्याज |
झटके और हलाल से, मनुज मिटाते खाज |

मनुज मिटाते खाज, मुजफ्फर नगर बना के |
बिन हर्रे फिटकरी, प्याज बिन पर्व मना के |

पाते बेहतर स्वाद, लड़ाके रविकर गुर्गे |
नेताओं को दाद, बांग दे देते मुर्गे ||


दंगाई महफूज, मार के निचले-तबके -
 तब के दंगे और थे, अब के दंगे और |
हुड़दंगी सिरमौर तब, अब नेता सिरमौर |

अब नेता सिरमौर, गौर आ-जम कर करलें |
ये दंगे के दौर, वोट से थैली भर लें |

मरते हैं मर जाँय, कुचल कर बन्दे रब के |
दंगाई महफूज, मार के निचले-तबके ||

 फिर भी दिल्ली दूर है, नहीं राह आसान |
अज्ञानी खुद में रमे, परेशान विद्वान |

परेशान विद्वान, बड़े भी अपनी जिद में |
ले पहले घर देख, ताकना फिर मस्जिद में | 

डंडे से ही खेल, नहीं पायेगा गिल्ली |
आस-पास बरसात, तरसती फिर भी दिल्ली || 

(आज के राजनैतिक माहौल पर)
नीले रंग में मुहावरे हैं-



कर अफसर बर्खास्त, वजीरे आजम आ-जम

आ जम जा कुर्सी पड़ी, सिखा विधर्मी पाठ |
वोट बैंक मजबूत कर, बढ़ा चढ़ा के ठाठ |

बढ़ा चढ़ा के ठाठ, कहीं कातिल छुड़वाए |
*जटा जाय जग माहिं, जुल्म का फल भी पाए |

फिर भी गोटी लाल, लाल का करना क्या गम |
कर अफसर बर्खास्त, वजीरे आजम आ-जम ||
*ठगा जाना / धोखे में आकर हानि उठाना 

11 comments:

  1. मुर्गे बड़े सुकून में, जब से मँहगा प्याज-

    मुर्गे बड़े सुकून में, जब से मँहगा प्याज |
    झटके और हलाल से, मनुज मिटाते खाज |

    मनुज मिटाते खाज, मुजफ्फर नगर बना के |
    बिन हर्रे फिटकरी, प्याज बिन पर्व मना के |

    पाते बेहतर स्वाद, लड़ाके रविकर गुर्गे |
    नेताओं को दाद, बांग दे देते मुर्गे ||

    क्या बात है रविकर जी क्या बखिया उधेड़ी है आपने दंगा खोरी की ,सेकुलर जोड़ी की ,
    आ से आज़म ,अ से अखिलेश ,

    गले मिल जुगल से सकल मिटे कलेश

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  2. मुर्गे बड़े सुकून में, जब से मँहगा प्याज-

    मुर्गे बड़े सुकून में, जब से मँहगा प्याज |
    झटके और हलाल से, मनुज मिटाते खाज |

    मनुज मिटाते खाज, मुजफ्फर नगर बना के |
    बिन हर्रे फिटकरी, प्याज बिन पर्व मना के |

    पाते बेहतर स्वाद, लड़ाके रविकर गुर्गे |
    नेताओं को दाद, बांग दे देते मुर्गे ||

    क्या बात है रविकर जी क्या बखिया उधेड़ी है आपने दंगा खोरी की ,सेकुलर जोड़ी की ,
    आ से आज़म ,अ से अखिलेश ,

    मिल गले जुगल से सकल मिटे कलेश

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  3. आजाने दो साल चौदह ,

    दंगों का भी हल निकलेगा ,

    सेकुलर घूँघट पट खिसकेगा।

    उनका सारा छल निकलेगा।

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक कल शनिवार (21-09-2013) को "एक भीड़ एक पोस्टर और एक देश" (चर्चा मंचःअंक-1375) पर भी होगा!
    हिन्दी पखवाड़े की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. kuch panktiyon ne dil ko chu liya aur kuch ne dil ko lot pot kar diya....Thank you so much for sharing these fabulous lines with us.

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  6. khub .. aj ki rajniti raj neta .. par gahara kataksh .. :) shubhkamnaye :)

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  7. करारे व्यंग्य

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