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Tuesday, 24 September 2013

रविकर पुरुष समाज, नहीं जाए उकसाने-



नारी अब अबला नहीं, कहने लगा समाज -

कुण्डलियाँ-
नारी अब अबला नहीं, कहने लगा समाज । 
है घातक हथियार से, नारि सुशोभित आज । 
नारि सुशोभित आज,  सुरक्षा करना जाने । 
रविकर पुरुष समाज, नहीं जाए उकसाने ।
लेकिन अब भी नारि, पड़े अबला पर भारी | 
इक ढाती है जुल्म, तड़पती दूजी नारी ।|



बातें नीति विरुद्ध, बुद्ध पर लगा कहाने-

(1)
भटके राही लक्ष्य बिन, भट के झूठे युद्ध |
आशिक रूठे रूह से, देखूं ढोंग विशुद्ध |


देखूं ढोंग विशुद्ध, लगा सज्जन उकसाने |


बातें नीति विरुद्ध, बुद्ध पर लगा कहाने |



गा मनमाने गीत, दिखा के लटके-झटके |


मान बैठता जीत, जगत में क्यूँकर भटके ||



रविकर देखे दृश्य, डोर जीवन की ढीली-

"ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक - 30


कुण्डलियाँ 
ढीली ढाली गुर्रियाँ, पंचेन्द्रियाँ समेत । 

कर्म-चर्म पर झुर्रियां,  परिवर्तक संकेत ।

परिवर्तक संकेत, ज़रा-वय का परिवर्तन ।

हो जाऊं ना खेत, पौध हित कर लूँ चिंतन  । 

बन जाए वटवृक्ष, अभी तो मिट्टी गीली ।

रविकर देखे दृश्य, डोर जीवन की ढीली । 
 दोहे 
दो बित्ते दो सेर की, देह सींच दे वक्त ।
चार हाथ दो मन मगर , होता गया अशक्त ॥ 


सजाये मौत पहले बहस मौत के बाद !

Sushil Kumar Joshi 

नारि-सुरक्षा पर खड़े, यक्ष प्रश्न नहिं स्वच्छ |
सजा मीडिया कक्ष पर, मचता रहा अकच्छ |

मचता रहा अकच्छ, बचा नाबालिग मुजरिम |
लचर व्यवस्था नीति, सजा की गति भी मद्धिम |

आजादी की चाह, राह पर कड़ी परीक्षा |
कर लें स्वयं सलाह, तभी हो नारि-सुरक्षा ||

रविकर देखे चाँद, कल्पना करे व्यवस्थित

व्यथित पथिक बरबस चले, लगे खोजने चैन |
मृग मरीच से अलहदा, मूँदे दोनों नैन |

मूँदे दोनों नैन, वैन वैरी हो जाते |
आती ज्यों ज्यों रैन, रोज त्यों त्यों उकताते |

रविकर देखे चाँद, कल्पना करे व्यवस्थित |
मुखड़े पर मुस्कान, पथिक हो गया अव्यथित || 


4 comments:

  1. बहुत सुंदर कुण्डलियाँ ! आभार !

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  2. सुंदर लिंक्स के साथ बेहतरीन कुंडलियाँ |

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  3. लेकिन अब भी नारि, पड़े अबला पर भारी |
    इक ढाती है जुल्म, तड़पती दूजी नारी ।|

    खुद अपनी ही कोख रोज़ खाती है नारी

    नारी परे निरंतर नारी पर हैई भारी .

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