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Tuesday, 17 September 2013

बाकी बातें बाद में, सबसे आगे वोट -


दंगो को प्रायोजित तौर  पर भड़काया जाता है 

बाकी बातें बाद में, सबसे आगे वोट |
करते हमले ओट से, खर्च करोड़ों नोट | 

खर्च करोड़ों नोट, चोट पीड़ा पहुँचाये |
पीते जाते रक्त, माँस अपनों का खायें |

अग्गी करके धूर्त, दिखाते हैं चालाकी |
जाँय अंतत: हार, दिखी "पूरण" बेबाकी ||

कर अफसर बर्खास्त, वजीरे आजम आ-जम

आ जम जा कुर्सी पड़ी, सिखा विधर्मी पाठ |
वोट बैंक मजबूत कर, बढ़ा चढ़ा के ठाठ |

बढ़ा चढ़ा के ठाठ, कहीं कातिल छुड़वाए |
*जटा जाय जग माहिं, जुल्म का फल भी पाए |

फिर भी गोटी लाल, लाल का करना क्या गम |
कर अफसर बर्खास्त, वजीरे आजम आ-जम ||
*ठगा जाना / धोखे में आकर हानि उठाना 


रहमत लाशों पर नहीं, रहम तलाशो व्यर्थ -

रहमत लाशों पर नहीं, रहम तलाशो व्यर्थ |
अग्गी करने से बचो, अग्गी करे अनर्थ |


अग्गी करे अनर्थ, अगाड़ी जलती तीली |
जीवन-गाड़ी ख़ाक, आग फिर लाखों लीली |



करता गलती एक, उठाये कुनबा जहमत |
रविकर रोटी सेंक, बाँटता मरहम रहमत ||

छौंक छौंक के दाल, हुआ अब काला चमचा-

मचा रहे हल्ला सभी, कभी नहीं हों मौन |
मची हुई है होड़ नित, आगे निकले कौन |

आगे निकले कौन, लगाते कसके नारे |
काली पीली दाल, गलाके छौंक बघारें |

रचते नित षड्यंत्र, चलें तलवार तमंचा |
छौंक छौंक के दाल, हुआ अब काला चमचा ||


ले पहले घर देख, ताकना फिर मस्जिद में-

फिर भी दिल्ली दूर है, नहीं राह आसान |
अज्ञानी खुद में रमे, परेशान विद्वान |

परेशान विद्वान, बड़े भी अपनी जिद में |
ले पहले घर देख, ताकना फिर मस्जिद में | 

डंडे से ही खेल, नहीं पायेगा गिल्ली |
आस-पास बरसात, तरसती फिर भी दिल्ली || 

(आज के राजनैतिक माहौल पर)
नीले रंग में मुहावरे हैं-



पूरे हों अरमान आपके, होना चाहो खेत |
लड्डू खा के हो गए, कितने मूर्ख अचेत |


कितने मूर्ख अचेत, निकलता तेल रेत में  |

होंगी मटियामेट, ख्वाहिशें सेत-मेत में |


नहीं रहें अरमान, शौक ना रहें अधूरे |

शेष बचे दिन चार, राम जी कर दो पूरे ||


5 comments:

  1. आज के राजनितिक माहोल पे गज़ब चुटकी ली है भाई जी ... मज़ा आ गया ...

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  2. राम जी पूरे जरूर करेंगे
    जल्दी ही सारे अरमान
    दो दिन करो इंतजार बस
    दो दिन में ही होता काम !

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  3. कर अफसर बर्खास्त, वजीरे आजम आ-जम
    आ जम जा कुर्सी पड़ी, सिखा विधर्मी पाठ |
    वोट बैंक मजबूत कर, बढ़ा चढ़ा के ठाठ |

    बेहद प्रासंगिक व्यंग्य विडंबन।

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