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Thursday, 5 September 2013

मिले खिलाते गुल गुरू, गुलछर्रे गुट बाल -


शिक्षक दिवस के बहाने ज़रा विचार तो कीजिये !!

पूरण खण्डेलवाल 
 

गुरु-गुरुता गायब गजब, अजब आधुनिक काल । 
मिले खिलाते गुल गुरू, गुलछर्रे गुट बाल । 

गुलछर्रे गुट बाल, चाल चल जाय अनोखी । 
नीति नियम उपदेश, लगें ना बातें चोखी । 

बढ़े कला संगीत, मिटे ना लेकिन पशुता । 
भरा पड़ा साहित्य, नहीं कायम गुरु-गुरुता ॥

आश्रम हित आ श्रम करें, कर ले रविकर धर्म-

आश्रम हित आ श्रम करें, कर ले रविकर धर्म |
जब जमीर जग जाय तो, छोड़ अनीति कुकर्म |

छोड़ अनीति कुकर्म, नर्म व्यवहार करेंगे |
देंगे प्रवचन मस्त, भक्त की पीर हरेंगे |

किन्तु मढ़ैया एक, दिखाने खातिर आक्रम |
बनवा दूँगा दूर, सदाचारी जो आश्रम ||

हिन्दी सिनेमा में अध्यापक के बदलते प्रतिमान

Ankur Jain 





 मिलते गुरु कौशिक सरिस, बनते "लक्ष्मण" राम ।
रावण-वध सम्भव तभी,  खुशियाँ मिलें तमाम ॥ 


"शिक्षक का सम्मान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


 गुरुवर करूँ प्रणाम मैं, रविकर मेरो नाम |

पाया अक्षर ज्ञान है, पाया ज्ञान तमाम |

पाया ज्ञान तमाम, निपट अज्ञानी लेकिन |

बहियाँ मेरी थाम, अनाड़ी हूँ तेरे बिन |

सतत मिले आशीष, पुन: आया हूँ दरपर |

करिए शुभ कल्याण, शिष्य सच्चा हूँ गुरुवर -

रविकर रह चैतन्य, अन्यथा उघड़े बखिया -

बखियाने से साड़ियाँ, बने टिकाऊ माल | 
लेकिन खोंचा मार के, कर दे दुष्ट बवाल |

कर दे दुष्ट बवाल, भूख नहिं देखे जूठा |
सोवे टूटी खाट, नींद का नियम अनूठा |

खोंच नींद तन भूख, कभी भी देगा लतिया |
रविकर रह चैतन्य, अन्यथा उघड़े बखिया || 



Sushil Kumar Joshi 

अच्छे खासे गुरू जी, अच्छा खासा नाम |

मिला ज्ञान विज्ञान है, रविकर करे प्रणाम ||


8 comments:

  1. शिक्षक दिवस पर सुन्दर प्रस्तुति !!
    सादर आभार !!

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  2. बहुत सुंदर प्रस्तुति
    आभार !

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  3. बहुत सुंदर प्रस्तुति ....

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    गुरूजनों को नमन करते हुए..शिक्षक दिवस की शुभकामनाएँ।
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल शुक्रवार (06-09-2013) के सुबह सुबह तुम जागती हो: चर्चा मंच 1361 ....शुक्रवारीय अंक.... में मयंक का कोना पर भी होगी!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. गुरुवर करूँ प्रणाम मैं, रविकर मेरो नाम |

    पाया अक्षर ज्ञान है, पाया ज्ञान तमाम |

    पाया ज्ञान तमाम, निपट अज्ञानी लेकिन |

    बहियाँ मेरी थाम, अनाड़ी हूँ तेरे बिन |

    सतत मिले आशीष, पुन: आया हूँ दरपर |

    करिए शुभ कल्याण, शिष्य सच्चा हूँ गुरुवर -

    रविकर जैसा शिष्य हो तुलसी जैसा दास ,

    ....................................................

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  6. गुरु-गुरुता गायब गजब, अजब आधुनिक काल ।
    मिले खिलाते गुल गुरू, गुलछर्रे गुट बाल ।
    सुन्दर .

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