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Wednesday, 8 June 2011

पहचानो लोकतंत्र के कातिलों को

उन  दरख्तों  के  बगल  में  खून  के  छींटे  दिखे |
तख्तियों पर  कातिलों  के  नाम  यूँ  पाए  लिखे ||

गुरुमुखी में था लिखा "भलभेचना" पढ़कर लगा |
पहचानता मकतूल होगा, था कोई उसका सगा ||

पास  काले  कोट  सा  गाउन  पड़ा  था  घास  पर |
खून-कीचड़ में सना था, "सिलवटें-बल" तर-बतर ||

गोल त्रिभुज और डब्ल्यू सी  दिखी इक वर्ण-माला |
भारी तबाही थी मचाई, जुड़ गया अध्याय काला ||
 
जो उधर  जिन्दा  बचे,  उनका यही पैगाम है --
संघर्ष  का आगाज  होवे,  राष्ट्र-हित  अंजाम  है ||  
 

12 comments:

  1. जो उधर जिन्दा बचे, उनका यही पैगाम है --
    संघर्ष का आगाज होवे, राष्ट्र-हित अंजाम है ||
    BAHUT KHOOB.

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  2. आभार

    इन पंक्तियों भी देखिये
    बेटे को पढ़ने दो |
    * घट रही है रोटियां घटती रहें---गेहूं को सड़ने दो |
    * बँट रही हैं बोटियाँ बटती रहें--लोभी को लड़ने दो |

    * गल रही हैं चोटियाँ गलती रहें---आरोही चढ़ने दो |
    * मिट रही हैं बेटियां मिटती रहे---बेटे को पढ़ने दो |

    * घुट रही है बच्चियां घुटती रहें-- बर्तन को मलने दो ||
    * लग रही हैं बंदिशें लगती रहें--- दौलत को बढ़ने दो |

    * पिट रही हैं गोटियाँ पिटती रहें---रानी को चलने दो |
    * मिट रही हैं हसरतें मिटती रहें--जीवन को मरने दो ||

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  3. उन दरख्तों के बगल में खून के छींटे दिखे |
    तख्तियों पर कातिलों के नाम यूँ पाए लिखे ||

    खूब कहा .....बेहतरीन पंक्तियाँ

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  4. दिनेश चंद्र गुप्ता रविकर जी
    सादर वंदे मातरम्!

    जो उधर जिन्दा बचे, उनका यही पैगाम है --
    संघर्ष का आगाज होवे, राष्ट्र-हित अंजाम है


    बहुत मार्मिक है …

    देश के ताज़ा घटनाक्रम पर आपकी अन्य रचनाएं भी अच्छी लगीं ।

    अब तक तो लादेन-इलियास
    करते थे छुप-छुप कर वार !
    सोए हुओं पर अश्रुगैस
    डंडे और गोली बौछार !
    बूढ़ों-मांओं-बच्चों पर
    पागल कुत्ते पांच हज़ार !

    सौ धिक्कार ! सौ धिक्कार !
    ऐ दिल्ली वाली सरकार !

    पूरी रचना के लिए उपरोक्त लिंक पर पधारिए…
    आपका हार्दिक स्वागत है

    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  5. .

    दिनेश जी ,

    बहुत ही ओजमयी रचना है।

    .

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  6. बहुत ही बढ़िया रचना है,
    साभार- विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  7. हर शब्‍द बहुत कुछ कहता हुआ, बेहतरीन अभिव्‍यक्ति के लिये बधाई के साथ शुभकामनायें ।

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  8. तेज़ धार व्यंग्य की ,जो उधर ज़िंदा बचे उनका यही पैगाम है ........,बधाई भाई साहब !एक बानगी आपकी भेंट -सह -भावित दोहे :वीरेंद्र शर्मा ,डॉ .नन्द लाल मेहता वागीश .डी .लिट .।
    चाटुकार चमचे करें ,नेता की जय -कार ,
    चलती कारों में हुई ,देश की इज्ज़त तार ,
    छप रहे अखबार में ,समाचार हर बार ,
    कुर्सी वर्दी मिल गए भली करे करतार ।
    बाबा को पहना दीनि ,कल जिसने सलवार ,
    अब तो बनने से रही ,वह काफिर सरकार ।
    है कैसा यह लोकतंत्र ,है कैसी सरकार ,
    चोर उचक्के सब हुए ,घर के पहरे -दार ,
    संसद में होने लगा यह कैसा व्यापार ,
    आंधी में उड़ने लगे नोटों के अम्बार ।
    मध्य रात पिटने लगे ,बाल वृद्ध लाचार ,
    मोहर लगी थी हाथ पर ,हाथ करे अब वार ।
    और जोर से बोल लो उनकी जय -जय कार ,
    सरे आम लुटने लगे इज्ज़त ,कौम परिवार ,
    जब से पीज़ा पाश्ता ,हुए मूल आहार ,
    इटली से चलने लगा ,सारा कारोबार ।
    प्रस्तुती :वीरेंद्र शर्मा (वीरुभाई ).

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  9. वीरू भाई सादर नमन ||
    आपका ब्लाग पर बारम्बार स्वागत है |
    आपने बड़ी सुन्दर पंक्तियों को पढने का अवसर दिया ||
    आभार ||

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