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Sunday, 19 June 2011

रक्त-कोष की पहरेदारी--(पूरी रचना)

मिला बाज को काज अनोखा, करता चिड़ियों की रखवाली |

शीत-घरों की सकल व्यवस्था, चूहों ने चुपचाप सँभाली |

दुग्ध-केंद्र मे धामिन ने जब, गाय-भैंस पर छान्द लगाया |
मगरमच्छ ने अपनी हद में, मत्स्य-केंद्र मंजूर कराया ||

महाघुटाले - बाजों ने ली, जब तिहाड़ की जिम्मेदारी |
अंग-रक्षकों ने मालिक की, ले ली जब से मौत-सुपारी |

तिलचट्टों ने तेल कुओं पर, अपनी कुत्सित नजर गढ़ाई |
जल्लादों ने झपटी झट से, पूजा-घर की कुल मुख्तारी ||

संविधान की रक्षा करने, चले उचक्के अत्याचारी ||
तो रक्त-कोष की पहरेदारी, नर-पिशाच के जिम्मे आई ||

4 comments:

  1. अंग-रक्षकों ने मालिक की ले ली जब से मौत-सुपारी |
    लुटती राहें, करता रहबर उस रहजन की ताबेदारी ||
    शीत-घरों के बोरों की रखवाली चूहों का अधिकार |
    भले-राम की नैया खेवें, टुंडे-मुंडे बिन पतवार ||
    आपकी प्रस्तुति अद्भुत स्वरुप लिए आती है.बहुत खूब.

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  2. आपकी अमूल्य टिप्पणियों

    का करता हूँ दिल से इन्तजार |

    क्योंकि भर रही हैं मुझ मे

    ये आत्म-विश्वास अपार ||

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  3. शीत घरों के बोरों की रखवाली ,चूहों का अधिकार ।
    भले राम की नैया खेवें टुंडे मुंडे बिन पतवार ।
    नैया खेवें तो भी ठीक ये गणतंत्री चूहे तो लोक तंत्र को कुतर कुतर खा रहें हैं .

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  4. ये गणतंत्री चूहे तो लोक तंत्र
    को कुतर कुतर खा रहें हैं .

    हाँ |
    अफ़सोस ||

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