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Sunday, 26 June 2011

विविध दोहे

                                    
प्रेम-क्षुदित व्याकुल जगत, मांगे प्यार अपार |
जहाँ  कहीं   देना   पड़े,   कर   देता   है   मार  ||


आम  सभी  बौरा  गए,  खस-खस  होते ख़ास |
दुनिया  में  रविकर  मिटै, मिष्ठी-स्नेह-सुबास || 


सरपट  बग्घी  भागती,  बड़े  लक्ष्य  की ओर |
घोडा  चाबुक  खाय  के,  लखे  विचरते  ढोर || 


चले  हुए   नौ-दिन   हुए,  चला  अढ़ाई  कोस |  
लोकपाल का करी शुभ्र, तनिक होश में पोस ||  करी  =  हाथी

 
कुर्सी   के   खटमल   करें,  मोटी-चमड़ी  छेद |
मर  जाते  अफ़सोस  पर,  पी के खून सफ़ेद  ||  

म्याऊँ सोच रही गद्दी पर देख बिलौटा बैठे कब-

10 comments:

  1. पहली बार आपके ब्लॉग पर आये बड़ा अच्छा लगा.आपकी रचना भी काफी अच्छी लगी.

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  2. कुर्सी के खटमल करें, मोटी-चमड़ी छेद |
    मर जाते अफ़सोस पर, पी के खून सफ़ेद ||
    --
    वाह क्या बात है सर जी!
    मजा आ गया!

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  3. चले हुए नौ-दिन हुए, चला अढ़ाई कोस |
    लोकपाल का करी शुभ्र, तनिक होश में पोस || करी = हाथी


    कुर्सी के खटमल करें, मोटी-चमड़ी छेद |
    मर जाते अफ़सोस पर, पी के खून सफ़ेद ||

    बहुत बढ़िया ..सटीक कटाक्ष

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  4. चले हुए नौ-दिन हुए, चला अढ़ाई कोस |
    लोकपाल का करी शुभ्र, तनिक होश में पोस ||
    अब तो यही कहा जायेगा.

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  5. nice poem
    and last two lines are kya kahana
    great

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  6. इस बार कह रहा हूँ कि शब्दों में सरलता रखें। मैं ज्यादा शब्दों को समझ नहीं पाता। इसलिए कहा।

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  7. बहुत-बहुत आभार|

    हमेशा, स्वागत हेतु उत्सुक रहता हूँ |

    बहुत-बहुत धन्यवाद ||

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  8. सही लिखा है आपने इन बेशर्मो की खाल उतारनी ही होगी लिखते रहिये शुभकामनाएं

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  9. अच्छी व्यंग्योक्ति है वक्रोक्ति भी .बधाई .ये लोकतंत्री सेक्युलर खटमल हैं .इनका तो पैदायशी ही खून सफ़ेद है .बेहतरीन बुनावट है शिल्प की .गेयता ,सौन्दर्य और व्यंग्य सब एक जगह .

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