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Friday, 10 June 2011

माथे से अब खून बहेगा

कोठर  में  सोई  गौरैया ,   मार  झपट्टा  बाज  उठाये |
बिन प्रतिरोध सभी चूजों को , वो अपना आहार बनाए ||
पाण्डव  के  बच्चे  सोये  थे,  अश्वस्थामा  महाकुकर्मी  |
गला रेत कर, बहुतै खुश हो, दुर्योधन को खबर सुनाये ||

उस भारत की दुखती घटना, नव-भारत फिर से दोहराए
राम की लीला से घबरा कर, आत्मघात हित कदम उठाये | 
पागल सा भटकेगा शापित, जन्म से शोभित मणि छिनाये--
सदा  खून   माथे   से   बहता,  अश्वस्थामा  नजर  चुराए  ||

 

15 comments:

  1. रविकार जी बहुत sateek likha hai .aabhar

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  2. सत्य बात की कवित्व से भरी सुन्दर अभिव्यक्त i.

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  3. आप सभी का आभार .
    १० मिनट पहले ही बोध-गया से लौटा हूँ, पहले आपसब की नई पोस्ट का रसास्वादन कर लूँ फिर---

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  4. बहुत खूब!
    बिम्बों के माध्यम से सारी व्यथा कह दी आपने!

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  5. उस भारत की दुखती घटना, नव-भारत फिर से दोहराए
    राम की लीला से घबरा कर, आत्मघात हित कदम उठाये |
    पागल सा भटकेगा शापित, जन्म से शोभित मणि छिनाये--
    sahi likha hai aapne bimb kamalke hain
    rachana

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  6. बहुत-बहुत आभार,

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  7. हर शब्‍द बहुत कुछ कहता हुआ, बेहतरीन अभिव्‍यक्ति के लिये बधाई के साथ शुभकामनायें ।

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  8. सटीक और संदर्भित व्यंग्य -रविकार जी ,कायल हो गए हमभी आपके ,बहुत साहित्यक शैली में बहुत असरदार वजनी बात कह दी आप ।
    तुलसी के पत्ते सूखे हैं और कैक्टस आज हरें हैं ,
    आई राम को भूख लगी है रावण के भण्डार भरे हैं .

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  9. वीरू भाई सादर नमन ||
    आपका ब्लाग पर बारम्बार स्वागत है |
    आपने बड़ी सुन्दर पंक्तियों को पढने का अवसर दिया ||
    आभार ||

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  10. उस भारत की दुखती घटना ,नवभारत फिर से दोहराए
    राम की लीला से घबरा कर आत्म- घात फिर कदम उठाए .
    बहुत हृदय स्पर्शी प्रसंग दुर्घटना को मूर्त करता -
    याद आ गईं दो पंक्तियाँ -
    हो गई हर घाट पर पूरी व्यवस्था ,
    शौक से डूबे जिसे भी डूबना है .(दुष्यंत कुमार )।
    बाज़ जाने जिस तरह हमसे/हमको ये समझाता रहा ,
    क्यों परिंदों के दिलों से उसका डर जाता रहा (नसीम चसवाल ,मेरे पूर्व सहयोगी ,अब उस लोक में ).

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  11. श्रीमान जी !
    लगता है यह जुगल बंदी
    अब जरुर रंग लाएगी |
    आपके द्वारा प्रेषित पंक्तियाँ
    मेरी लेखनी की धार
    शर्तिया पैनी कर पाएंगी ||

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  12. संजय भास्कर जी का
    भी बहुत-बहुत आभार ||

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