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Sunday, 25 August 2013

सोच नफा-नुक्सान, हुवे खुश दोनों खेमे-





हमारा देश बिना बाड़ के खेत जैसा हो गया हैं !!
पूरण खण्डेलवाल 


बिना बाड़ के हो गया, अपना देश महान |
बाड़-पडोसी खा रही, नित्य खेत-मैदान |

नित्य खेत-मैदान, बाड़ उनकी यह घातक |
करते हम आराम, आदतें बड़ी विनाशक |

चेतो नेता मूढ़, जाय नित शत्रु ताड़ के |
विषय बहुत ही गूढ़, रहो मत बिना बाड़ के ||

रविकर 
टेढ़ी-मेढ़ी डगरिया, पड़ते डग-मग पैर |
बीती यूँ ही उमरिया, रहे मनाते खैर | 
रहे मनाते खैर, खैर वो बीत चुकी है |
गया हमेशा चूक, सफलता छिपी-लुकी है |
तौर-तरीके श्रेष्ठ, पकड़ ना पाया *मेढ़ी |
 अब कैसा अफ़सोस, करे क्या उँगली-टेढ़ी ??

*तीन शिराओं वाली चोटी |

ram ram bhai

कबिरा को ही मुँह-बिरा, चिढ़ा रहा धर्मांध |
करता आडम्बर निरा, तन मन बेड़ी-बाँध |


तन मन बेड़ी-बाँध, भटकता मन्दिर महजिद |
जिद में है इन्सान, भूलता अम्मा वालिद |


मन पर चाबुक मार, आज रविकर को हांको |
भूल गया है सीख, भूलता है कबिरा को |


 उल्लूक टाईम्स
छोटी मोटी जगह पर, करता खुद को बन्द |
बिना रीढ़ के जीव का, अपना ही आनन्द |
अपना ही आनन्द, चरण चुम्बन में माहिर |
भरे पड़े छल-छंद, किन्तु न होते जाहिर |
चले समय के साथ, लाल कर अपनी गोटी |
ऊँचा झंडा हाथ, बात क्या छोटी मोटी ??

 विवादास्पद सुन बयाँ, जन-जन जाए चौंक |
नामुराद वे आदतन, करते पूरा शौक |
करते पूरा शौक, छौंक शेखियाँ बघारें |
बात करें अटपटी, हमेशा डींगे मारें |
रखते सीमित सोच, ओढ़ते छद्म लबादा |
खोलूं इनकी पोल, करे रविकर कवि वादा |

आह वजीरे-आजमी, आहा आजम खान |
रहे धरे के धरे कुल, मन्सूबे आहवान |

मन्सूबे आह्वान, रही रौनक सूबे में |
सोच नफा-नुक्सान, हुवे खुश दोनों खेमे |

राम-लला फिलहाल, विराजे सरयू तीरे |
लगा पुराना टेंट, भरें वह आह, वजीरे ||
 

7 comments:

  1. लिखो रविकर भाई साखियाँ कबीर की हर साखी ,दोहे पर आज की यही ज़रूरीयात है ,बहुत सुन्दर साखियाँ लिखीं हैं आपने .

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  2. आपकी इस उत्कृष्ट रचना की चर्चा कल मंगलवार २७ /८ /१३ को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका हार्दिक स्वागत है।

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  3. एक से बढ़कर एक कुंडलियाँ !

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  4. राम-लला फिलहाल, विराजे सरयू तीरे |
    लगा पुराना टेंट, भरें वह आह, वजीरे ||

    क्या बात है .

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति। ।

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