Follow by Email

Saturday, 31 August 2013

जहाँ निकम्मे हैं अधिकारी । प्रवचनकर्ता तक व्यभिचारी ॥



लोकतंत्र की शक्ल में, दिखने लगी चुड़ैल |
परियों सा लेकर फिरे, पर मिजाज यह बैल |


पर मिजाज यह बैल, भेद हैं कितने सारे |

वंश भतीजा वाद, प्रान्त भाषा संहारे |


जाति धर्म को वोट, जीत षड्यंत्र मन्त्र की |

 अक्षम विषम निहार, परिस्थिति लोकतंत्र की |



नहीं कहीं भी लगता नारा । पी एम चुप्पा चोर हमारा ॥

चोर नहीं चोरों के सरदार हैं पीएम !

महेन्द्र श्रीवास्तव 








नहीं कहीं भी लगता नारा । 

पी एम चुप्पा चोर हमारा ॥ 

चोर चुहाड़ कमीना बोले  । 

राज राज का बाहर खोले॥  


सत्ता सांसद यहाँ खरीदें  । 

रखे तभी जिन्दा उम्मीदें ॥ 

नौ दिन चले अढ़ाई माइल । 

होय काँख से गायब फ़ाइल ॥ 


जहाँ निकम्मे हैं अधिकारी । 

प्रवचनकर्ता तक व्यभिचारी ॥ 

जन गन मन मुद्रा में मस्ती । 

होती जाती मुद्रा सस्ती ।। 




Shalini Kaushik 



माफ़ी माता से मिले, पर माता का कृत्य |
माफ़ी के लायक नहीं, करती नंगा नृत्य |

करती नंगा नृत्य, भ्रूण में खुद को मारे |
दे दुष्टों का साथ, हमेशा बिना विचारे |

नरक वास हित मान, पाप तेरा यह काफी |
खोती खुद सम्मान, कौन देगा अब माफ़ी ??  

कार्टून :- ख़तरे का खि‍लाड़ी नं0-1



रवताई राजा हुआ, ऐसा होता अर्थ |
ऐसा ही कुछ रवतरा, करता यहाँ अनर्थ |

करता यहाँ अनर्थ, नहीं छू लेना भाई |
देगा झटका मार, एक राजा की नाईं |

रविकर का आकलन, रवकना जान गंवाई |
बिजली होती फेल, किन्तु ना हो रवताई ||
कैसे मुद्रा-पस्त, नहीं घर में हैं दाने-

कैडर से डर डर करे, कैकेयी कै-दस्त |
कैटभ कैकव-अपर्हति, कैसे मुद्रा-पस्त |

कैसे मुद्रा-पस्त, नहीं घर में हैं दाने |
कोंछे में वंचिका, चली जा रही भुनाने |

आये नानी याद, चाल चल रही भयंकर |
दे गरीब के नाम, करे खुश लेकिन कैडर ||

 कैकव-अपर्हति=असली बात बहाने से छिपाना  

मासूम नहीं रहे नाबालिग मुजरिम


टला फैसला दस दफा, लगी दफाएँ बीस |
अंध-न्याय की देवि ही, खड़ी निकाले खीस |

खड़ी निकाले खीस, रेप वह भी तो झेले |
न्याय मरे प्रत्यक्ष, कोर्ट के सहे झमेले |

नाबालिग को छूट, बढ़ाए विकट हौसला |


और बढ़ेंगे रेप, अगर यूँ टला फैसला ||

5 comments:

  1. बहुत खूब क्या बात है :)

    ReplyDelete
  2. धन्‍यवाद रवि‍कर जी सुंदर समीक्षा के लि‍ए

    ReplyDelete
  3. टला फैसला दस दफा, लगी दफाएँ बीस |
    अंध-न्याय की देवि ही,खड़ी निकाले खीस |

    खड़ी निकाले खीस,रेप वह भी तो झेले |
    न्याय मरे प्रत्यक्ष, कोर्ट के सहे झमेले |

    नाबालिग को छूट,बढ़ाए विकट हौसला |
    और बढ़ेंगे रेप , अगर यूँ टला फैसला ||

    बहुत ही बढ़िया प्रस्तुति,,,

    RECENT POST : फूल बिछा न सको

    ReplyDelete

  4. माफ़ी माता से मिले, पर माता का कृत्य |
    माफ़ी के लायक नहीं, करती नंगा नृत्य |

    करती नंगा नृत्य, भ्रूण में खुद को मारे |
    दे दुष्टों का साथ, हमेशा बिना विचारे |

    नरक वास हित मान, पाप तेरा यह काफी |
    खोती खुद सम्मान, कौन देगा अब माफ़ी ??

    बहुत मार्मिक और सुन्दर रचना व्यंग्य विड्म्बन लिए आज की।

    ReplyDelete