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Sunday, 8 April 2012

कुरुक्षेत्र-मन बिकल है, चलिए प्रभू शरण -

चलो इसे घर ले चलें

satish sharma 'yashomad' at यात्रानामा  


जंगल की लकड़ी ख़तम, बढ़ते ईंधन दाम ।
बिजली बिल आये बहुत, ले चल सूरज थाम ।।

  मनोज  

जीवन में ठहराव से, ठहरी हवा -किरण ।
कुरुक्षेत्र-मन बिकल है, चलिए प्रभू शरण  ।।  

हम पहले ही मारे जा चुके हैं....

Anita at मन पाए विश्राम जहाँ -

दर्शन रूप विराट के, मिली दिव्यतम दृष्ट ।
मरे हुए हम भी दिखे, सृजित करें नव सृष्ट ।।

आस का एक धागा ....

सदा at SADA  
सदा दीखती दृष्टि-नवल, धवल प्रेम संवाद ।
संग जुड़ें शक्ति मिले, प्रेम सूत्र नाबाद ।। 

 dineshkidillagi.blogspot.in



3 comments:

  1. जंगल की लकड़ी ख़तम, बढ़ते ईंधन दाम ।
    बिजली बिल आये बहुत, ले चल सूरज थाम ।।
    .पर्यावरण सचेत दृष्टि -ये तेजाबी बारिशे ,बिजली घर की राख ,

    एक दिन होगा भूपटल वारणावर्त की लाख .

    महानगर ने फैंक दी मौसम की संदूक ,

    पेड़ परिंदों से हुआ ,कितना बुरा सुलूक .

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  2. बहुत बढ़िया. लाजवाब..रविकर जी..

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  3. वाह!!!!बहुत उम्दा प्रस्तुति,.....

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