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Friday, 27 April 2012

चढ़ते रहो पहाड़, सदा जय माँ जी कहिये-

कविता

हिम्मत से रहिये डटे, घटे नहीं उत्साह |
कोशिश चढ़ने की सतत, चाहे दुर्गम राह |

चाहे दुर्गम राह, चाह से मिले सफलता |
करो नहीं परवाह,  दिया तूफां में जलता |

चढ़ते रहो पहाड़, सदा जय माँ जी कहिये |
दीजै झंडे गाड़, डटे हिम्मत से रहिये ||


मैंने तो मन की लिख डाली ( भूमिका मेरे गीत की )


दीदी जैसा मुखड़ा मेरा, माथा तेरे जैसा ।
थोड़ी सी झुर्री भी डालो, दो चिंता की रेखा ।

पैरों में चक्कर थे मेरे, आँचल भीगा भीगा -
असमय तुझको छोड़ी बौआ, था किस्मत का लेखा ।

माएं तो सब एक सरीखी, बच्चों को तुम देखो-
उठा कूचिका चित्र बना लो, जो आँखों में देखा ।।

इन दिनों ....

Dr (Miss) Sharad Singh at Sharad Singh



कविता को ऐसा छुआ, बनी कहानी आप ।
बिखरी थी लय बद्ध्ता, तेरा स्नेह-प्रताप ।।


रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था "प्यार" तुमने ।

  प्रेम सरोवर  


 सरल शब्द में बंध रहा, प्रेम-सरोवर-चाँद ।
 उच्च रूढ़ियाँ थीं खड़ी, कैसे जाये फांद ।।


उनके पास गीत है...!

अनुपमा पाठक at अनुशील


 खुले विचारों वाला जीवन, चाहत उनकी थोड़ी ।
मुक्त गगन उन्मुक्त उड़ाने, गाये गीत निगोड़ी ।

चौबिस घंटे परबस रविकर, मुट्ठी भर ले दाने-

 रोटी कपडा से हुआ, पहले आज मकान ।
खाय विटामिन गोलियां, मानव फिर नंगान ।।

नारी के प्रति सोच को, न बदले नादान ।
देखेगी दुनिया सकल, खुद अपना अवसान ।।

4 comments:

  1. वाह...आपकी टिप्पणी पाकर लोग धन्य हो जाते हैं!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  2. वाह ...बहुत बढिया।

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