Follow by Email

Friday, 21 September 2012

पैसा पा'के पेड़ पर, रुपया कोल खदान-



 fact n figure

 पैसा पा'के  पेड़ पर, रुपया कोल खदान ।
किन्तु उधारीकरण से, चुकता करे लगान ।
चुकता करे लगान, विदेशी खाद उर्वरक ।
जब मजदूर किसान, करेगा मेहनत भरसक ।
पर मण्डी मुहताज, उन्हीं की रहे हमेशा ।
लागत नहीं वसूल, वसूलें वो तो पैसा ।।


गैर के बहकावे में न आयें (ये काम हमारा है)

कमल कुमार सिंह (नारद )  


 झूठ बोलने से भला, मारो-मन मुँह-मौन ।
चले विदेशी बहू की, कर बेटे का गौन ।
कर बेटे का गौन, कौन रोकेगा साला ।
 ससुर निठल्ला बैठ, निकाले अगर दिवाला ।
आये वह ससुराल, दुकाने ढेर खोलने ।
भैया वन टू आल,  लगे हैं झूठ बोलने ।।


फ़ुरसत में ... तीन टिक्कट महा विकट

मनोज कुमार  

तीन साल पूरा हुआ, शुभकामना मनोज ।
ओजस्वी ये ब्लॉग सब, पाठक पढ़ते रोज ।
पाठक पढ़ते रोज, तीन तेरह क्यूँ भाई ।
तीन-पाँच नहिं आँच, नई फुर्सत महकाई ।
वर्ष पूरते तीन, चौथ का चाँद भाद्रपद ।
झूठ मूठ की बात, दुखी कर देता बेहद ।


दीदी-दादा तानते, कुर्सी वो मजबूत ।
भैया-बहना बांधते, मोहन रक्षा-सूत्र ।
मोहन रक्षा-सूत्र, सकल यू पी भरमाया ।
जीवन भर बंगाल,  कहीं मुंबई  कमाया ।
एफ़ डी आई, तेल, सिलिंडर काटे कौवा ।
साम्प्रदायिक संघ, हुआ हिंदू ही हौव्वा ।

कीमत चाहत की

"अनंत" अरुन शर्मा  
दास्ताँने - दिल (ये दुनिया है दिलवालों की )
चाहत की कीमत मिली, अहा हाय हतभाग ।
इक चितवन देती चुका, तड़पूं अब दिन रात ।
तड़पूं अब दिन रात,  आँख पर आंसू छाये ।
दिल में यह तश्वीर, गजब हलचलें मचाये ।
देती कंटक बोझ, इसी से पाई राहत । 
कर्म कर गई सोझ, कोंच के नोचूं चाहत ।।


सफ़ेद घर
चालिसवीं सेंचुरी में, बोले पन्ने जोर।
अन्ने अनशन अन्न से, हुवे पुरुष कमजोर ।
हुवे पुरुष कमजोर, पूर्व में ममता छाई ।
माया शीला केंद्र, जया दक्षिण से आई ।
सबसे ज्यादा शक्ति, मुलायम  सबको कर दे ।
हुई एक गौरांग, झोलियाँ भर भर भर दे ।।


क्या फालिज के दौरे (पक्षाघात या स्ट्रोक ,ब्रेन अटेक ) की दवाएं स्टेन्ट से बेहतर विकल्प हैं

Virendra Kumar Sharma  

माहिर बेचारे बने, सकते नहीं सुधार |
चिरकुटियों की जबरदस्त, पकड़ हाट मक्कार |
पकड़ हाट मक्कार, फायदे का कर सौदा |
बुन विज्ञापन जाल, तोड़ते रहे घरौंदा |
यह बाजारी-करण,  करे व्यापारी शातिर |
चले उन्हीं की आज, हुवे बेचारे माहिर ||


भगवान् राम की सहोदरा (बहन) : भगवती शांता परम-16

सर्ग-4
भाग-4 
अंग-देश में अकाल     

Shanta (Ramayana)

Shanta is a character in the Ramayana. She was the daughter of Dasharatha and Kausalya, adopted by the couple Rompad and Vershini.[1] Shanta was a wife of Rishyasringa.[1] The descendants of Shanta and Rishyasringa are Sengar Rajputs who are called the only Rishivanshi rajputs.

9 comments:

  1. बेहतरीन प्रस्‍तुति।

    ReplyDelete
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (23-09-2012) के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    सूचनार्थ!

    ReplyDelete
  3. दिल की लगी दिल्लगी !
    बाकी कल को !

    ReplyDelete

  4. रविवार, 23 सितम्बर 2012
    ब्लॉग जगत में शब्द कृपणता ठीक नहीं मेरे भैया ,
    ब्लॉग जगत में शब्द कृपणता ठीक नहीं मेरे भैया ,

    नाव भंवर में अटक गई तो ,कोई नहीं नहीं खिवैया |

    विषय बड़ा सपाट है अभिधा में ही आगे बढेगा ,लक्षणा और व्यंजना की गुंजाइश ही नहीं मेरे भैया .चिठ्ठा -कारी भले एक व्यसन बना कईओं का ,फिर भी भैया सहजीवन है यहाँ पे छैयां छैयां

    .चल छैयां छैयां छैयां छैयां .आ पकड मेरी बैयाँ बैयाँ .

    क्यों शब्द कृपण दिखता है रे ! कन्हैयाँ?

    धन कंजूस चल जाता है .भई किसी का कुछ ले नहीं रहा ,अपना फायदा कर रहा है .सीधा सा गणित है कंजूसी का :मनी नोट स्पेंट इज मनी सेव्ड .लेकिन यहाँ मेरे राजन यह फार्मूला लगाया तो सारे समर्थक ,अभी तलक टिपियाए लोग आपके दायरे से बाहर आ जायेंगें .शब्द कृपणता आपको आखिर में निस्संग कर देगी .आप भले "निरंतर ",लिखें "सुमन" सा खिलें ,

    साथ में चिठ्ठा -वीर और बिना बघनखे धारे चिठ्ठा -धीर दिखें .आखिर में कुछ होना हवाना नहीं है सिवाय इसके -

    चल अकेला चल अकेला ,चल अकेला ,तेरा "चिठ्ठा "कच्चा फूटा राही चल अकेला .

    यहाँ कुछ लोग आत्म मुग्ध दिखतें हैं .आत्म संतुष्ट भी .महान होने का भी भ्रम रखतें हैं/रखती हैं .आरती करो इनकी करो इनकी "वंदना "हो सकता है हों भी महान .शिज़ोफ्रेनिक भी तो हो सकते है .मेनियाक फेज़ में भी हो सकतें हैं बाई -पोलर इलनेस की ,मेजर -डिप्रेसिव -डिस -ऑर्डर की ..

    ये चिठ्ठा है मेरे भाई ,अखबार की तरह एक दिनी अवधि है इसकी. बाद इसके कूड़े का ढेर .

    इतनी अकड काहे की ?

    निरभिमान बन ,मत बन शब्द कृपण .आपके दो शब्द दूसरे को सारे दिन खुश रख सकतें हैं .

    शब्दों से ही चलती है ज़िन्दगी प्यारे .

    कुछ शब्द हम अपने गिर्द पाल लेतें हैं .

    "अपनी किस्मत में यही लिखा था भैया ,अपनी तो किस्मत ही फूटी हुई है ,कोई हाल पूछे तो कहतें हैं बीमार हूँ भैया "-बस तथास्तु ही हो जाता है .

    बस इतना ध्यान रख तुझे लेके कोई ये न कहे मेरे प्रियवर तू मेरी टिपण्णी को तरसे .सारे दिन तेरा जिया धडके ...

    और तू गाये :जिया बे -करार है ,छाई बहार है आजा मेरे टिपिया तेरा इंतज़ार है .

    यहाँ प्यारे! आने- जाने का अनुपात सम है .स्त्री -पुरुष की तरह विषम नहीं .तेरा चिठ्ठा भी प्यारे कन्या भ्रूण की तरह किसी दिन कूढ़े के ढेर पे मिल सकता है .तू मेरे घर आ! मैं आऊँ तेरे. .जितनी मर्जी बार आ ,खाली हाथ न आ .भले मानस दो चार शब्द ला .

    पटक जा मेरे दुआरे !

    गुड़ न दे, गुड़ सी बात तो कह .

    एक टिपण्णी का ही तो सवाल है जो दे उसका भला ,जो न दे उसका भी बेड़ा रामजी पार करें .

    राम राम भाई !

    सुन !इधर आ !

    मत शरमा !

    जिसने की शरम उसके फूटे करम

    शर्माज आर दा मोस्ट बे -शर्माज . .

    "मौन सिंह" मत बन .

    इटली का कुप्पा सूजा मत दिख .

    निर्भाव न दिख ,भाव भले ख़ा ,भावपूर्ण दिख .

    प्यार कर ले नहीं तो पीछे पछतायेगा .

    साईबोर्ग मत बन ,होमो -सेपियन बन ,

    सीढ़ी -दर-सीढ़ी ऊपर की तरफ चढ़ ,

    शब्द कृपण मत बन !

    चढ़ लोगों की आँखों में चढ़ .

    दिल में जगह बना सबकी !

    खिलखिला के हँस !

    ReplyDelete
  5. उल्लेखित थीम पर आशु कविता चाहिए दाता .दे दाता के नाम तुझको अल्लाह रख्खे .

    ReplyDelete
  6. पार्टियां न हुईं गैस सब्सिडी का सिलिंडर हो गए .बेहतरीन व्यंग्य विनोद .हमारे दौर की यही तो विडंबना है .

    ReplyDelete
  7. अपने लिंक के बारे में आपका लिक्खाड़ मन को छू गया।

    ReplyDelete
  8. बर्फी के ऊपर
    चाँदी का वर्क
    दिख जाता है
    रविकर जब कुछ
    टिपिया जाता है !

    ReplyDelete