Follow by Email

Friday, 7 September 2012

है रो बो में खोट, नहीं कोयला चबाये -

कार्टून कुछ बोलता है- एक रोबोट क्या खा सकता है ?

पी.सी.गोदियाल "परचेत" at अंधड़ !  

बिजली खाने के लिए, है स्वतंत्र रोबोट |
पन बिजली में आजकल, उत्तरांचल की चोट |
उत्तरांचल की चोट, ताप बिजलीघर आये |
है रो बो में खोट,  नहीं कोयला चबाये |
दस जनपथ पर टहल, टहल करता है घर के |
बिजली रूपी कोल, तानता है भर भर के ||

‘लंगोटिया ब्लॉगिंग‘: परिभाषा, उपयोग और सावधानियां Hindi Blogging

अदना पदना ढेर हैं, हूँ उनमे से एक |
सच्ची बात बताइये, नहीं रहे ना फेंक |
नहीं रहे ना फेंक, बड़ा ब्लॉगर है बनना |
मिले टिप्पणी चार, इन्हें सौ दो सौ करना |
रचता दस कुंडली, मगर पड़ता है पदना |
सुन्दर बढ़िया वाह, मिले यह भी न अदना || 


आज की टिप्पणियां यहाँ भी हैं -

नियमित हो यह "आंच", हमें भी चढ़ा दीजिये-



5 comments:

  1. साहब बेहद उपयोगी टिप्पणियां ...
    सावधान रहूँगा
    सादर !!!

    ReplyDelete

  2. बिजली खाने के लिए, है स्वतंत्र रोबोट |
    पन बिजली में आजकल, उत्तरांचल की चोट |
    उत्तरांचल की चोट, ताप बिजलीघर आये |
    है रो बो में खोट, नहीं कोयला चबाये |
    दस जनपथ पर टहल, टहल करता है घर के |
    बिजली रूपी कोल, तानता है भर भर के ||

    शुक्रवार, 7 सितम्बर 2012
    शब्दार्थ ,व्याप्ति और विस्तार :काइरोप्रेक्टिक

    शब्दार्थ ,व्याप्ति और विस्तार :काइरोप्रेक्टिक
    इस स्तंभ "कभी कभार "के तहत चिकित्सा पारिभाषिक शब्दावली का अर्थ और विस्तार (स्कोप )पर विमर्श ज़ारी रहेगा .यह पहली किस्त है .
    काइरोप्रेक्टिक कुदरती स्वास्थ्य संभाल जीविका है जिसके लिए उच्च प्रशिक्षण और शिक्षा दोनों ही ज़रूरी हैं .गत सौ सालों से इसके माहिर हमारे बीच मौजूद हैं .अमरीका में यह वैकल्पिक और प्राकृत चिकित्सा का सबसे बड़ा पेशा है ,वैकल्पिक चिकित्सा की एक ख़ास किस्म है .

    इस वैकल्पिक चिकित्सा व्यवस्था की बुनियादी अवधारणा के तहत बीमारियों की वजह हमारे स्नायुविक तंत्र पर आ पड़ने वाला दवाब ,स्पाइनल स्ट्रेस बनती है .यह स्नायुविक प्रणाली (नर्वस सिस्टम )एक अंतर जाल है कोशाओं का ,तंत्रिकाओं का ,जो हर मिलने वाली सूचना का संसाधन करता ,संचार का एक सेतु बनता है .हमारे दिमागी टेलीफोन एक्सचेज का यह एक एहम हिस्सा है .इसके काम में किसी भी किस्म की बाधा आने पर हमारी काया अपने एक नैसर्गिक गुण से वंचित रह जाती है .वह गुण है हीलिंग ,खुद -बा -खुद स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करते रहना ,टूट फूट की मरम्मत करते रहना .सेल्फ हीलिंग ओर्गेन हैं हमारी बॉडी .

    इसी लिए इस चिकित्सा प्रणाली का माहिर उन तमाम लोगों को राहत पहुंचाने की कोशिश करता है जो जुदा किस्म की स्वास्थ्य सम्बन्धी शिकायतें लेकर आतें हैं ,कोई सिर दर्द ,कोई पाचन सम्बन्धी ,कोई हारमोनों के उतार चढ़ाव से सम्बंधित जबकि काइरोप्रेक्टर (इस चिकित्सा व्यवस्था के डोकटर या माहिर )के पास अमूमन लोग गर्दन और कमर के निचले हिस्से में रहने वाले दर्द की शिकायत के लिए ही अकसर जातें हैं .

    काइरोप्रेक्टर अपना सारा ध्यान अपनी सारी तवज्जो तंत्रिकापेशीय प्रणाली (न्यूरोमस्कुलर सिस्टम ) को देतें हैं .यहाँ न कोई दवा है न शल्य कर्म .तवज्जो में भी तवज्जो (ख़ास तवज्जो )का केंद्र बनती है हमारी रीढ़ (स्पाइन )क्योंकि यह रीढ़ या मेरुदंड ही हमारी स्नायुविक प्रणाली से विशेष ताल्लुक रखता है .इसका एहम किरदार है .

    रीढ़ के किसी हिस्से या खंड में संरेखण का अभाव ,किसी भी किस्म का विक्षोभ या विचलन ,स्पाइनल मिसएलाइनमेंट ,ही तंत्रिकाओं के काम में खलल पैदा कर देता है .इस पेशे की ख़ास भाषा में इस गंभीर खलल को vertebral subluxation (मेरुदंड खलल ,रीढीय गडबडी ) को कहा जाता है .

    काइरोप्रेक्टर इस खलल को दूर कर देतें हैं विशेष रीढ़ समायोजन ,रीढ़ संधान से ,स्पाइनल एडजस्टमेंट से .क्योंकि ये सारा काम माहिर के हाथों का ही विशेष हुनर होता है इसीलिए इस चिकित्सा व्यवस्था को कहा जाता है -काइरोप्रेक्टिक .

    After all, the word chir is derived from the Greek word meaning “referring to the hand”, and prassein “to do”.

    (kiro praktik )

    CHIRO +Greek praktikos "effective"

    ReplyDelete
  3. Hindi Blogging
    अदना पदना ढेर हैं, हूँ उनमे से एक |
    सच्ची बात बताइये, नहीं रहे ना फेंक |
    नहीं रहे ना फेंक, बड़ा ब्लॉगर है बनना |
    मिले टिप्पणी चार, इन्हें सौ दो सौ करना |
    रचता दस कुंडली, मगर पड़ता है पदना |
    सुन्दर बढ़िया वाह, मिले यह भी न अदना ||

    ReplyDelete
  4. क्या बात है सर !रोबोट और कोयला एक तो कडवा ऊपर से नीम चढा .बेहतरीन अंदाज़ हैं आपके -
    Hindi Blogging
    अदना पदना ढेर हैं, हूँ उनमे से एक |
    सच्ची बात बताइये, नहीं रहे ना फेंक |
    नहीं रहे ना फेंक, बड़ा ब्लॉगर है बनना |
    मिले टिप्पणी चार, इन्हें सौ दो सौ करना |
    रचता दस कुंडली, मगर पड़ता है पदना |
    सुन्दर बढ़िया वाह, मिले यह भी न अदना ||

    ReplyDelete
  5. बहुत बहुत आभार रविकर जी ! पद्ध्यात्मक कटाक्ष आपके काफी सटीक हैं !

    ReplyDelete