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Friday, 16 November 2012

रविकर हिट दे मार, बंद हो जाए हल्ला -



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मच्छर

Posted  
PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA
हल्ला कर, मरहम मले, जन-मत लेता पोट ।
 फिर डंके की चोट पर, पहुंचा जाता चोट ।
पहुंचा जाता  चोट, चूसता खून प्यार से ।
एक घरी की खाज, तड़पता व्यक्ति वार से ।
अक्सरहाँ दे दर्द,  जहर तन भरे निठल्ला ।
रविकर हिट दे मार, बंद हो जाए हल्ला ।।

 rajesh kumari  

रविकर के दोहे  
बाबा बापू चल बसे, बसे अनोखे पूत ।
संस्कार की छत ढहे, अजब गजब करतूत ।।

 चिंगारी भड़का गई, जली बुझी दिल-आग।
 जमी समय की राख है, मत कुरेद कर भाग ।।
  
जल-धारा अनुकूल पा, चले जिंदगी नाव ।
धूप-छाँव लू कँपकपी, मिलते गए पड़ाव ।।

दिल से निकली बात जब, जाए ज्यादा दूर ।
मचे तहलका जगत में, नव-गुल खिले जरूर 
   
महलों में बिगड़ें बड़े, बच्चों की क्या बात ।
नया घोसला ले बना, मार महल को लात ।

बच्ची बहिनी बन बुआ, मौसी बीबी माय ।
नए नए नित नाम दे, नित सूरत बदलाय ।। 

पटाक्षेप होने चला, सुख दुःख का यह खेल ।
करवट देखो ऊंट की, मत कर ठेलमठेल ।।

 चूहे पहले भागते, डूबे अगर जहाज ।
गिरती देख दिवार को, ईंट करे नहिं लाज ।



 
पत्नी पग-पग पर परे, पल-पल पति पतियाय-
 
पति-अनुनय  को कह धता, 
कुपित होय तत्काल |
बरछी-बोल  कटार-गम,
दरक जाय मन-ढाल ||



रक्त-कोष की पहरेदारी-

चालबाज, ठग, धूर्तराज   सब,   पकडे   बैठे   डाली - डाली | 

आज बाज को काम मिला वह करता चिड़ियों की रखवाली |

गौशाला मे धामिन ने जब, सब गायों पर छान्द लगाया |
मगरमच्छ ने  अपनी हद में,  मछली-घर मंजूर  कराया ||  

6 comments:


  1. जल-धारा अनुकूल पा, चले जिंदगी नाव ।
    धूप-छाँव लू कँपकपी, मिलते गए पड़ाव ।
    काव्य सौन्दर्य देखते ही बनता है इस दोहे में .

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  2. वाह बहुत खूब डिजिटल बाण लायें हैं आज तो .

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  3. जल-धारा अनुकूल पा, चले जिंदगी नाव ।
    धूप-छाँव लू कँपकपी, मिलते गए पड़ाव ।।

    काव्य सौन्दर्य की अनुपम छटा बिखरी है यहाँ .

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  4. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति

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  5. वाह रविकर सर छा गए आप, बेहतरीन सर एक से बढ़ कर एक।

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  6. बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी ...बेह्तरीन अभिव्यक्ति ...!!शुभकामनायें.

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