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Monday, 19 November 2012

प्रथम-पहर प्रचरण प्रचय, पावो प्रग्य सुभाव-रविकर



'चित्र से काव्य तक' प्रतियोगिता अंक -२०

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 रविकर की प्रविष्टियाँ 
 दुर्मिल सवैया 

जलबिंदु जमें दस-बारह ठो, कवि वृन्द जमे जलसा जमता  |

जलहार खड़ा पद-चिन्ह पड़ा जलकेश जले जल जो कमता ।

जलवाह खफा जलरूह मरे जलमूर्ति दिखे खुद में रमता  ।

जलथान घटे जगदादि सुनो जलशायि जगो जड़ जी थमता ।।

जलहार=जल वाहक 
जलकेश=सेंवार  घास 
जलवाह=बादल 
जलारूह = कमल 
जलथान =जलस्थान 
जलमूर्ति = शंकर 
जगदादि = ब्रह्मा 
जलशायि = विष्णु 
जड़ =अचेतन , चेष्टाहीन, मूर्ख 
जी = चित्त मन दम संकल्प 


 कुंडलियाँ 
पानी जैसा धन बहा, मरते डूब कपूत ।
हुई कहावत बेतुकी, और आग मत मूत ।

और आग मत मूत, हिदायत गाँठ बाँध इक ।
बदल कहावत आज, खर्च पानी धन माफिक ।

कह रविकर कविराय, सिखाई दादी नानी ।
बन जा पानीदार, सुरक्षित रखना पानी ।।


  विधाता (शुद्धगा) छंद. (यगण + गुरु)x 4

घमंडी का सदा नीचा हुआ है सर सभी जानें ।
अकारथ ही बहा पानी हमारे घर गुशल-खाने ।
संभालो अब अगर अब भी हिदायत यह नहीं माने ।
मरोगे सब करोगे क्या अगर वर्षा उलट ठाने ।


  विष्णुपद छंद 
(अभ्यास किया है ) 

द्वि-चरणों के चिन्ह, पादोदक, भक्त  हटे पा के ।
प्रतियोगिता भिन्न, मनमोहक, चित्र छापा ला के ।
आदरणीय नमन, महोत्सव,  कहाँ छुपे जा के ।
आभारी रविकर, विष्णुपद, सिखा गए आ के ।।

 कुंडलियाँ
पावन पादोदक पियो, प्रभु पदचिन्ह प्रभाव ।
प्रथम-पहर प्रचरण प्रचय, पावो प्रग्य सुभाव ।

पावो प्रग्य सुभाव, पारदर्शी दस गोले ।
आयत हैं द्विदेह, गंगधर बोले भोले ।

परजा शील उपाय, ज्ञान सह दशबल वंदन ।
दान वीर्य बल ध्यान, क्षमा प्राणिधि पी पावन ।।
प्रचरण=विचरण
द्विदेह=गणेश

सवैया-
सूखत स्रोत सरोवर नित्य, सहे मन-मीन महा बाधा ।
पैर पखारन हेतु मंगावत, भक्त पखाल भरा आधा ।
बर्तन एक मंगाय भरा, इक यग्य बड़ा रविकर नाधा ।
साइत आकर ठाढ़ भई पद चिन्ह बनाय गए पाधा ।।
पखाल=मसक
पाधा=उपाध्याय


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4 comments:

  1. बहुत ही लिंक्‍स के साथ बेहतरीन प्रस्‍तुति

    आभार

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  2. वाह बहुत खूबसूरत अहसास हर लफ्ज़ में आपने भावों की बहुत गहरी अभिव्यक्ति देने का प्रयास किया है... बधाई आपको... सादर वन्दे...

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  3. लाजबाब प्रस्तुति,,,रविकर जी बहुत२ बधाई,,,,

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