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Sunday, 25 November 2012

सादर हे हुत-आत्मा, श्रद्धांजलि के फूल -




श्रद्धांजलि........(26 नवंबर विशेष)

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) 
सादर हे हुत-आत्मा, श्रद्धांजलि के फूल ।
भारत अर्पित कर रहा, करिए इन्हें क़ुबूल ।
  करिए इन्हें क़ुबूल, भूल तुमको नहिं पायें ।
किया निछावर जान, ढाल खुद ही बन जाएँ ।
मरते मरते मार, दिए आतंकी चुनकर ।
ऐसे पुलिस जवान, नमन करते हम सादर ।। 

शिवम् मिश्रा 
 खाने को दाने नहीं, अम्मा रही भुनाय ।
दानवता माने नहीं, दुनिया को सुलगाय ।
दुनिया को सुलगाय, करे विध्वंसक धंधे ।
करते इस्तेमाल, दुष्ट धर्मान्धी कंधे । 
भेजें चटा अफीम, साधु की शान्ति मिटाने ।
भारत है तैयार, नहीं घुस, मुंह की खाने ।

होना ही चाहिए -

udaya veer singh 

 आँखें पथराती गईं, नहीं सुबह नहिं शाम |
हँसी -ख़ुशी के आ रहे,  नहीं कहीं पैगाम |
नहीं कहीं पैगाम, दाम नित्य मौत वसूले |
मिटता गया वजूद, आज तो जीवन भूले |
बुझती आशा ज्योति, दागती गर्म सलाखें |
अब आयेगा कौन, करकती रविकर आँखें |




"दोहा सप्तक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण)  

 भ्रष्टाचारी व्यवस्था, सबसे प्यारा नोट |
सर्वोपरि अब स्वार्थ है, मिटें विकट अघ खोट |
मिटें विकट अघ खोट, लोट ले इस वैतरणी |
माल मलाई घोट, मूल निकले इस करणी |
जीने का अंदाज, बदल सज्जन नर-नारी |
वही यहाँ खुशहाल, बना जो भ्रष्ट चारी ||

थानेदार बदलता है

मनोज कुमार 

बरगद के नीचे कई, गई पीढ़िया बीत |
आते जाते कारवाँ, वर्षा गर्मी शीत |
वर्षा गर्मी शीत, रीत ना बदल सकी है |
चूल्हा जाया होय, आत्मा वहीँ पकी है |
मिला क़त्ल का केस, हुआ थाना फिर गदगद |
जड़-गवाह चुपचाप, आज भी ताके बरगद ||

धर्म के नाम पर अधर्म कब तक?

Shah Nawaz 
 धमाचौकड़ी झूमना, शोर-शराबा खेल |
आज धर्म के नाम पर, साधु रहे हैं झेल |
साधु रहे हैं झेल, शहादत में भी रौनक |
नहिं कोई कानून, दिखाते शानो-शौकत |
हुडदंगी चहुँओर, नहीं कुछ लेना देना |
समझे ये शैतान, धर्म को चना-चबेना ||


रूह से रूह का रिश्‍ता ...!!!

सदा  
SADA  

 प्रेम जिए हर हाल में, मर मर जाय शरीर |
फर्क पड़े कंकाल में, हो प्राणान्तक पीर |
हो प्राणान्तक पीर, वासना को धिक्कारो |
मिले जहाँ में सत्य, राधिके तन-मन वारो |
कृष्णा ने दी पीर, वही चरणामृत पावन |
होवे अंधा प्रेम, दिखे सावन ही सावन ||

पोखरा की यात्रा-2

देवेन्द्र पाण्डेय 
 मनभावन परिदृश्य यह, कोई भी खो जाय ।
ओशोवाणी टहलना, योग ध्यान मस्ताय ।
योग ध्यान मस्ताय, बड़ी बढ़िया दिनचर्या ।
आप रहे सुस्ताय, मस्त जीवन आचार्या ।
सादर उन्हें प्रणाम, हिमालय पाप नशावन ।
दर्शनीय सब चित्र, लगे रविकर मनभावन ।।

ram ram bhai
गंदे हाथों को रगड़, ले साबुन या राख |
सर्वव्याप्त जीवाणु हैं, सेहत करते खाख |
सेहत करते खाख, कीजिये लाख सुरक्षा |
हवा धूल जल वस्तु, भरे घर दफ्तर कक्षा |
छोड़ फिरंगीपना, भला मानुष बन बन्दे |
पॉक्स फ्लू ज्वर एड्स, तपेदिक हैजा गंदे ||

बस मूक हूँ .............पीड़ा का दिग्दर्शन करके

वन्दना 


दर्दनाक घटना घटी, मेरा पास पड़ोस ।
दुष्टों की हरकत लटी, था *धैया में रोष ।
था *धैया में रोष, कोसते हम दुष्कर्मी ।
जेल प्रशासन ढीठ, दिखाया बेहद नरमी ।
उठे मदद को हाथ, पीडिता की खातिर अब ।
अपराधी को सजा, मिलेगी ना जाने कब ।।
*धैया ग्राम हमारे कालेज के बगल में ही है जहाँ यह घटना हुई-

6 comments:

  1. बहुत बहुत धन्यवाद अंकल!
    आपकी हर टिप्पणी लाजवाब होती है।

    सादर

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  2. बहुत ही बढ़िया रोचक और लाजवाब रविकर सर बधाई स्वीकारें.

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  3. वाह ... बहुत ही बढिया ।

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  4. आभार आपका जो आपने इस पोस्ट को यहाँ स्थान दिया हम और कुछ तो नही कर सकते बस अपनी अपनी तरह कोशिश करने के सिवा ताकि ऐसे दरिंदों की दरिंदगी और कानून की लचर व्यवस्था का सबको पता चल सके ………फिर आप तो इस बारे में हम सबसे ज्यादा जानते होंगे बहुत मन व्यथित है ।

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  5. मरते मरते मार, दिए आतंकी चुनकर ।
    ऐसे पुलिस जवान,नमन करते हम सादर ।।

    आपकी हमेशा तरह हर टिप्पणी लाजवाब,,

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  6. लाजवाब!
    शहीदों को नमन!
    --
    ओह..!
    बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण हैं ऐसे प्रायोजित हादसे!
    मगर हमारा कानून अन्धा भी है और बहरा भी!
    बदलाव होना जरूरी है कानून की धाराओं में!

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