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Sunday, 25 November 2012

समझे ये शैतान, धर्म को चना-चबेना-


धर्म के नाम पर अधर्म कब तक?

Shah Nawaz 

 धमाचौकड़ी झूमना, शोर-शराबा खेल |
आज धर्म के नाम पर, साधु रहे हैं झेल |
साधु रहे हैं झेल, शहादत में भी रौनक |
नहिं कोई कानून, दिखाते शानो-शौकत |
हुडदंगी चहुँओर, नहीं कुछ लेना देना |
समझे ये शैतान, धर्म को चना-चबेना ||
कविता कर-कर के करे, कवि-कुल आत्मोत्थान ।
जैसे योगी तन्मयी, करे ईश का ध्यान ।

करे ईश का ध्यान, शान में पढ़े कसीदे ।
भावों में ले ढाल, ढाल से सौ उम्मीदें  ।

रोके छुरी कटार, व्यंग वाणों को रविकर ।
कायम रखे इमान, हमेशा कविता कर कर ।।

पोखरा की यात्रा-2

देवेन्द्र पाण्डेय 

 मनभावन परिदृश्य यह, कोई भी खो जाय ।
ओशोवाणी टहलना, योग ध्यान मस्ताय ।
योग ध्यान मस्ताय, बड़ी बढ़िया दिनचर्या ।
आप रहे सुस्ताय, मस्त जीवन आचार्या ।
सादर उन्हें प्रणाम, हिमालय पाप नशावन ।
दर्शनीय सब चित्र, लगे रविकर मनभावन ।। 

"सोच-समझकर बोलो..बाबा..!" (कार्टूनिस्ट-मयंक)

 घूमे पहले दिवस से, पिच बाम्बे में मांग ।
धोनी गड्ढे खोद के, फंसा बैठते टांग ।
 फंसा बैठते टांग, टांग बल्ला खूँटी पर ।
नामी बल्लेबाज, बाज नहिं आते रविकर ।
 बेहतर हैं अंग्रेज, जीत का मैडल चूमें ।
दो दिन धोनी टीम, मुंबई पूरा घूमे ।।

"नानकमत्ता साहिब का दिवाली मेला” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) 
मेले में सबसे अधिक, बिके चाट मिष्ठान ।
गुरूद्वारे की शरण में, करें सभी उत्थान ।
 करें सभी उत्थान, मौज मस्ती का खेला ।
घंटे बीते चार, छूट सब जाय झमेला ।
ठोकर लग ना जाय, नहीं पब्लिक को ठेलें ।
घुटने में है चोट, घूमते क्यूँकर मेले ??

 ZEAL
दावा कंगरसिया करे, साथ आदमी आम ।
कैसे रखते केजरी, पार्टी का यह नाम ।
पार्टी का यह नाम, हमारा हित ही साधे।
करें परस्पर रार, राष्ट्रवादी भी आधे ।
सारे सेक्युलर साथ, मुलायम माया पावा ।
साथ आदमी आम, गलत केजरि का दावा ।।

नारी के अकेलेपन से पुरुष का अकेलापन ज्यादा घातक

शालिनी कौशिक
डेरा है शैतान का, खाली पड़ा दिमाग ।
बिन नारी के घर लगे, भूतों का संभाग ।
भूतों का संभाग, नारि से भूत भागते ।
संस्कार आदर्श, सत्य कर्तव्य जागते ।
नारी अगर अकेल, कभी नहिं होय सवेरा ।
दुनिया बड़ी अजीब, लफंगे डालें  डेरा ।

सेहतनामा

Virendra Kumar Sharma 
*नारिकेर जल दुग्ध में, कॉपर है भरपूर |
भरा विटामिन ए यहाँ, दूर खड़ा मत घूर |
दूर खड़ा मत घूर , करे जो नियमित सेवन |
चमड़ी हो नहिं रुक्ष, लचीलापन भी एवन |
है प्रस्तुति यह मस्त, डंक गर मारे कीड़ा |
सिरका रगडो वहां, हरे झट पट यह पीड़ा |||
  
*नारियल


6 comments:

  1. वाह बहुत खूब!

    मेरी ब्लॉग-पोस्ट पर आपकी बेहतरीन टिप्पणी के लिए आभार!

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  2. वाह ... बेहतरीन प्रस्‍तुति।

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