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Tuesday, 6 November 2012

खुद में करूँ सुधार अब, छमहुं गलतियाँ मोर-रविकर



"पहाड़ों के ढलानों पर-चित्रग़ज़ल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


दुसह परिस्थिति देश की, प्राकृत है प्रतिकूल |
भाईचारा प्रेम सत्य, है ईमान उसूल |
है ईमान उसूल, भूल कर भी नहिं गन्दा |
पर्वत अपना मूल, नेक प्रभु का यह बन्दा |
बनता चौकीदार, देश की करे हिफाजत |
लिए सुरक्षा भार, सभी लोगों को छाजत ||

बारह सालों से चला आ रहा एक संघर्ष

गगन शर्मा, कुछ अलग सा 
  कुछ अलग सा  

जय इरोम शर्मिला चनु जी, अनशन बारह साल ।
 सत्ता खाना ठूस रही है, डाल नाक में नाल । 
डाल नाक में नाल, नहीं अधिनियम बदलता ।
बोल रही सरकार, यहाँ पर सब कुछ चलता ।
क्षेत्र शुद्ध सीमांत, नहीं जाने यह कोई ।
चर्चा चली विदेश, बुराई जम के होई ।।



सागर,,,

dheerendra bhadauriya  
सागर से क्या बात करें, उनके नयनों सी गहराई ।
डूब डूब उतराते हरदिन, नाप नहीं पाता भाई ।।
सागर के क्या पास चलें,  आंसू से भी खारा ज्यादा।
छूछे वापस लेकर लौटा, प्रेम-गगरिया नहीं डुबाई ।।

 मच्छर नहिं कमजोर जो, मार सके अखबार ।
मार सकोगे तभी जब, हो दोतरफा वार ।
हो दोतरफा वार , प्यार है अघ-कसाब से ।
 डेंगू जैसा वार, मारता बेहिसाब ये ।
आई-क्यु की कर बात, गडकरी जैसे लगते ।
बढ़िया मौका पाय,  दनादन मुंह से हगते । 

ये मेरे बुजर्गो का खजाना

DINESH PAREEK

  जाना है तो एक दिन, दनदनाय दिन बीत |
समय सतत गतिमान है, यही जगत की रीत |
यही जगत की रीत, तकाजा जिम्मा बंधन |
अनुभव बढ़ता जाय, सीखता जाता जीवन |
पर आ जाता काल, व्यर्थ हो गया मनाना |
बचुवा इसे संभाल, छोड़ कर चला खजाना ||

कुछ गुनाह ...!!!

 SADA

सच से हरदम भागते, भारी विकट गुनाह |
कहीं बदल कर रखी तो, आह आह ही आह |
आह आह ही आह, राह बाधित हो जाए |
खैरख्वाह शैतान, नहीं फिर पास बुलाये |
खुराफात में लीन, अगर यह नहीं रहेगा |
इस दुनिया से जाय, भला क्या वहाँ कहेगा ||

इसीलिए करता रहे, बन्दा यहाँ कुकर्म |
छोड़ छाड़ के शर्म को, छेड़-छाड़ का धर्म ||

पानी रे पानी

Saleem akhter Siddiqui 
उसका एफ़ डी आय है, बना आय का स्रोत्र  ।
सुखा दिया जल-स्रोत्र को, रुपियों का हो होत्र ।।
रुपियों का हो होत्र, गोत्र से शॉप विदेशी ।
पैदल बनता ऊँट , चले टेढा वह वेशी ।
नदी नहर नल कूप, मिटाता मानव मुस्का ।
  कुदरत कहीं वजूद, मिटा नहिं देवे उसका ।। 

महेन्द्र श्रीवास्तव
 भाजी पी-नट  की सड़ी,  गंध-करी  में आय ।
है नरेंद्र उपवास पर,  दाउद खाये जाय ।
दाउद खाये जाय, गधे के माफिक आई-क्यू ।
करे बरोबर बात, वाह रे कुक्कुर का व्यू ।
वह भी तो ना खाय, कहो क्या कहते काजी ।
हाँ जी हाँ जी सत्य, सड़ी निकली यह भाजी ।।   

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छूछ आग से 'के-जरी', जे 'गुट-करी' जनाब |
'सोनी-या' रोनी शकल, करती काम खराब |
करती काम खराब, बड़ा डेंगू है फैला |
सुबह कपाली काँख, फाँक ले सूखा मैला |
मत घबराना किन्तु, वोट तो मिलें भाग से |
नाती पुत्र दमाद, डरें नहीं छूछ आग से ||

मौन रतनपुर

Rahul Singh 
 आरे के उपयोग को, वर्जित कर इतिहास |
वन रक्षा में दे रहा, योगदान है ख़ास ||

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.....और मैं हतप्रभ सा देखता रह गया!

  (Arvind Mishra) 
 क्वचिदन्यतोSपि... 

चार दिनों से झेलता, झारखण्ड बरसात |
नीलम का यह असर है, चलता झंझावात |
चलता झंझावात, उपग्रह है प्राकृतिक |
दर्पण सा अवलोक, गगन से घटना हर इक |
हुवे घाघ अति श्रेष्ठ, पढ़ें संकेत अनोखे |
करे आकलन शुद्ध, मिलें फल हरदम चोखे || 

 (1)

रविकर की धज्जियाँ उडाती आ. अरुण निगम की पोस्ट 

(2)

आदरणीय रविकर जी की कुण्डलिया को समर्पित दो कुण्डलिया....(विचार आमंत्रित)...

भली बहस का अंत कर, रविकर कह कर जोर |
खुद में करूँ सुधार अब, छमहुं गलतियाँ मोर |
छमहुं गलतियाँ मोर, खीर पूरी है खाना |
पत्नी रही बुलाय, प्रेम से रविकर जाना |
रही जलेबी छान, काम सब उसके बस का |
रब की मेहर रहे, अंत अब भली बहस का ||

मैंने क्यूँ गाये हैं नारे

  (पूरण खंडेलवाल)  

गाँधी के बंदरों पर, नारे ये उत्कृष्ट ।
असर डाल पाते नहीं, दुष्ट कलेजे कृष्ण ।
दुष्ट कलेजे कृष्ण , कर्म रत रहिये हरदम ।
भूलो निज अधिकार, चलो चित्कारो भरदम ।
जूँ नहिं रेंगे कान, चले नारों की आँधी ।
आँख कान मुँह बंद, जमे अलबेले गाँधी ।।
मेरा बेटा
नादिर ख़ान 
http://www.openbooksonline.com/
 होली में झटपट मले, चेहरे पे मुस्कान |
लाल हरे के भेद से, बच्चा है अनजान |
बच्चा है अनजान, दिवाली दीप बटोरे |
क्रिसमस ईद मनाय, खिलौने से भर झोले |
रहता खुद में मस्त, सजाता रहे रंगोली |
बच्चा बच्चा रहे, मनाये यूँ ही होली ||

गांधी जी की प्रतिज्ञा

मनोज कुमार 

भीष्म कुँवारे की शपथ, सरिस वचन यह श्रेष्ठ ।
परतंत्री कलिकाल में,  यही लग रही ज्येष्ठ ।
यही लग रही ज्येष्ठ, आप इन्द्रिय सुख छोड़ा ।
धन्य धन्य हे वैद्य, सुधरता रोगी थोडा ।
त्याग तपस्या कर्म, अहिंसा सदगुण सारे ।
गाँधी दिखते श्रेष्ठ, पिछड़ते भीष्म कुंवारे ।।


(विवेकानंद-दाउद जैसा मत समझ लेना  विद्वानों )

मेरा भारत

lokendra singh 

मोहन केशव सा लगे, बड़ा सुदर्शन चित्र |
टोपी मामा ने पिन्हा, दिया छिड़क के इत्र |
दिया छिड़क के इत्र, मित्र यह प्यार मुबारक |
बना देश का यही, समझिये सच्चा तारक |
विजयादशमी मने, जलेंगे दुष्टों के शव |
लगा रखो उम्मीद, करेंगे मोहन केशव ||


8 comments:

  1. भले बहस का अन्तकर,ले चाहे कर जोर,
    बीस पड़े है अरुणजी,रविकर तुम कमजोर,,,,,,

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    1. रविकर अनुभवहीन है, सुनिए मेरे मीत |
      भैया का अनुभव अधिक, जाँय तभी तो जीत |
      जाँय तभी तो जीत, हकीकत सदा जीतती |
      बनावटी अंदाज, कहाँ बकवाद खींचती |
      जीत सत्य की होय, झूठ क्या देगा टक्कर |
      अरुण शब्द ही मूल, निकलते उससे रविकर ||

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  2. जोरदार लिंक्स पर धारदार कुंडली जड़ि आये कविराज।

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  3. आपकी उम्दा पोस्ट बुधवार (07-11-12) को चर्चा मंच पर | जरूर पधारें |
    सूचनार्थ |

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  4. .....और मैं हतप्रभ सा देखता रह गया!
    (Arvind Mishra)
    क्वचिदन्यतोSपि...

    चार दिनों से झेलता, झारखण्ड बरसात |
    नीलम का यह असर है, चलता झंझावात |
    चलता झंझावात, उपग्रह है प्राकृतिक |
    दर्पण सा अवलोक, गगन से घटना हर इक |
    हुवे घाघ अति श्रेष्ठ, पढ़ें संकेत अनोखे |
    करे आकलन शुद्ध, मिलें फल हरदम चोखे ||

    जोरदार लिंक्स पर धारदार कुंडली जड़ि आये कविराज।din din aaye nikhaar .

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  5. अपसंस्कृति व्यवहार, आज मानव ना मानव ||---अति सुन्दर ...धन्यवाद रविकर

    --- कुंडलियों की पंचायत भी बहुत सुन्दर है....

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