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Thursday, 10 May 2012

रविकर सज्जन वृन्द, कर्मरत हो मुस्काते -

"आभा मण्डल "

  21 minutes ago

भीतर से तन खोखला, मन को खला विशेष ।
आभा-मंडल ले बना, धर बहुरुपिया वेश  । 

धर बहुरुपिया वेश, गगरिया छलकत जाए ।
बण्डल-बाज भदेस, शान-शौकत दिखलाए । 

रविकर सज्जन वृन्द, कर्मरत हो मुस्काते ।
उपलब्धियां अनेक, किन्तु न छलकत जाते ।।

5 comments:

  1. जैसे ही हम दाल पकाते हैं
    रविकर आ कर घीं का तड़का लगाते हैं ।

    आभारी हूँ ।

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  2. धर बहुरुपिया वेश, गगरिया छलकत जाए ।
    बण्डल-बाज भदेस, शान-शौकत दिखलाए । सटीक व्यंग्य यथार्थपरक .
    .कृपया यहाँ भी पधारें -

    बुधवार, 9 मई 2012
    http://veerubhai1947.blogspot.in/

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  3. धर बहुरुपिया वेश, गगरिया छलकत जाए ।
    बण्डल-बाज भदेस, शान-शौकत दिखलाए । सटीक व्यंग्य यथार्थपरक .
    .कृपया यहाँ भी पधारें -
    बुधवार, 9 मई 2012
    शरीर की कैद में छटपटाता मनो -भौतिक शरीर
    जीवन में बड़ा मकसद रखना दिमाग में होने वाले कुछ ऐसे नुकसान दायक बदलावों को मुल्तवी रख सकता है जिनका अल्जाइमर्स से सम्बन्ध है .
    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/
    बुधवार, 9 मई 2012
    http://veerubhai1947.blogspot.in/
    बुधवार, 9 मई 2012
    .
    http://veerubhai1947.blogspot.in/

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  4. सुशील जी का कहना सही है, दाल पकते ही आप द्वारा घी का तडका...सब कुछ जायकेदार कर देता है।

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