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Sunday, 20 May 2012

कृष्णा छलिया श्रेष्ठ, भजूँ वो लगे मनोरम -


चिर प्रतीक्षित रह गया एकांत

ऋता शेखर मधु at मधुर गुंजन

लगे मनोरम अति-प्रिये, खिन्न मनस्थिति शांत |
रमे *कांत-एकांत में, अब भावे ना **कांत |


अब भावे ना कांत, ***कांती-कष्ट-कांदना |
छोड़ चलूं यह प्रांत, करूँगी कृष्ण-साधना |


मन में रही ना भ्रांत, छला जो तुमने हरदम  |
कृष्णा छलिया श्रेष्ठ, भजूँ वो लगे मनोरम ||
*मनोरम
**पति
***बिच्छू का दंश


धन्य-धन्य भाग्य तेरे यदुरानी ,तुझको मेरा शत-शत नमन



यदुरानी तू धन्य है, धन्य हुआ गोपाल ।
दही-मथानी से रही, माखन प्रेम निकाल ।

माखन प्रेम निकाल, खाय के गया सकाले ।
ग्वालिन खड़ी निढाल, श्याम माखन जब खाले ।

जकड कृष्ण को लाय, पड़े  दो दही मथानी ।
बस नितम्ब सहलाय, हँसे गोपी यदुरानी ।।

"चोरवा विवाह और मास्टर"

शनै: शनै: शनीचरा, गुरुवर हुआ  समाप्त |
मासिक वेतन पा रहे, अभी रईसी व्याप्त |

अभी रईसी व्याप्त, पकडुआ व्याह रचाए |
पाया नहीं दहेज़, किन्तु किडनेप हो जाए |

दो रविकर दस लाख, शुरू टीचर की बारी
किस्मत जाए जाग, बढ़ा  रूतबा संसारी  ||
 


8 comments:

  1. वाह...अद्भुत रचना...बधाई स्वीकारें.

    नीरज

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  2. बहुत सुन्दर.....

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  3. वाह ...बेहतरीन प्रस्‍तुति।

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  4. आपकी इस उत्कृष्ठ प्रविष्टि की चर्चा कल मंगल वार २२ /५/१२ को राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी |

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  5. तुरत फुरत ऊठाता है
    रविकर मिनट में कुछ
    कलाकारी कर दिखाता हृ
    छा जाता है ।

    आभार !!

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  6. वाह ,,,,
    बहुत अच्छी प्रस्तुति,,,,

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