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Tuesday, 15 May 2012

हिंदी तन मन प्राण, राष्ट्र की मंगल-रेखा-


रोजगार गहरे जुड़े, हिन्दी का व्यवहार |
जार जार बेजार हो, हिंदी बिन बाजार |

हिंदी बिन बाजार, अर्थ भी जब जुड़ जाता |
रहा विरोधी घोर, शीश खुद चला नवाता |

हिंदी तन मन प्राण, राष्ट्र की मंगल-रेखा |
तुलसी सूर कबीर, प्रेम जय देवी देखा ।।

"छँट जाएगा, दलाली का आवरण" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) at उच्चारण - 1 hour ago
शोक काल की ग्रह-दशा, हो हलचल दरबार |
भ्रष्ट आचरण ले बना, ड्राफ्ट लाभ अनुसार | 

ड्राफ्ट लाभ अनुसार, लोक न लोक-तंत्र में |
तंत्र ऊर्जा-हीन, शक्ति न बची मन्त्र में |

खाल खींचता पाल, बकरियाँ लोकपाल की |
मने खैर कब तलक, खबर है शोक-काल की ||


ब्लॉग जगत का चुनाव आयोग फ़र्ज़ी है ?


क्या हिंदी ब्लॉग जगत सचमुच बच्चा है जी ?

करें यहाँ गम गलत सब, सच्ची दुनिया छोड़ |
ढोंगी दुर्जन स्वार्थी, देखे वहाँ करोड़ |

देखे वहाँ करोड़, होड़ अब यहाँ देखता |
तुलसी स्वांत-सुखाय, यज्ञ लहलहा देखता | 

पुरस्कार का लोभ, क्षोभ ना  होता भैया |
रविकर जो पा जाय, बजाऊं द्वार बधैया ||

मेरे फैन भी मुझसे कोई नहीं छीन सकता है 

 (प्रवीण पाण्डेय) at न दैन्यं न पलायनम्
पटरंगा आर एस पता, डिस्ट्रिक्ट फ़ैजाबाद |
पास होम-सिग्नल खड़ा, होम वहीँ  आबाद |

होम वहीँ आबाद, बगल विद्यालय साजे |
घंटा तो था व्यर्थ, रेल की छुक छुक बाजे |  

जम्मू देहरादून,  करे तेजी  मनचंगा |
मिलता रहा सुकून, बड़ा प्यारा पटरंगा || 


बदले ज़माने देखो - कविता



जुबाँ काटे गला काटे, कलेजा काट कर फेंके |
जले श्मशान में काँटा, वहां भी हाथ वो सेंके ||

रही थी दोस्ती उनसे, गुजारे थे  हंसीं-लम्हे
उन्हें हरदम बुरा लगता, वही जो रास्ता छेंके ||

कभी निर्द्वंद घूमें वे, खुला था आसमां सर पर
धरा पर पैर न पड़ते, मिले आखिर छुरा लेके ||


मुहब्बत को सितम समझे, जरा गंतव्य जो पूंछा-
 गंवारा यह नहीं उनको, गए मुक्ती मुझे देके ।।

10 comments:

  1. 'हिंदी तन मन प्राण, राष्ट्र की मंगल-रेखा
    ' - कितना सुन्दर सूत्र-वाक्य !

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  2. Nice post.

    जान के बदले जान तो पोस्ट के बदले पोस्ट,
    पढ़िए-
    http://blogkikhabren.blogspot.in/2012/05/blog-post_16.html

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  3. करें यहाँ गम गलत सब, सच्ची दुनिया छोड़ |
    ढोंगी दुर्जन स्वार्थी, देखे वहाँ करोड़ |

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  4. वाह जी वाह....................

    सादर.

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  5. हिंदी तन मन प्राण, राष्ट्र की मंगल-रेखा |
    तुलसी सूर कबीर, प्रेम जय देवी देखा ।।

    बहुत सुंदर रचना,..अच्छी प्रस्तुति

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  6. आखिर असली जरुरतमंद कौन है
    भगवन जो खा नही सकते या वो जिनके पास खाने को नही है
    एक नज़र हमारे ब्लॉग पर भी
    http://blondmedia.blogspot.in/2012/05/blog-post_16.html

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  7. वाह: क्या बात है ? ..बहुत सुन्दर..

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  8. सुंदर टीप... सुंदर लिंक्स....
    सादर आभार।

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  9. रविकर जब काटे तो ऎसा काटे
    काटने वाला भूल जाये कैसे काटे।

    वाह जी वाह क्या काटा है ।

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