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Monday, 14 May 2012

गर्भवती हो जाय, ढूँढ़ता कुत्ता अगली-

  (सतीश पंचम) at सफ़ेद घर

विज्जेनर नर-श्रेष्ठ है, ज्यों बरदन में सांढ़ ।
गाँव-रांव का क्लेश है, दुर्बल जन में चांड़ |
दुर्बल जन में चांड़, गालियों का है ज्ञाता |
जीव-जंतु क्या बाप, खेत निर्जीव अघाता |
ऐसे ग्यानी पुरुष, भरे हैं घर में पानी |
घर अन्दर महराज, हाल होते  कुतियानी ||

"बच्चा बिकाऊ है"

ई. प्रदीप कुमार साहनी at भारतीय नारी  

 पगली है तो क्या हुआ, मांस देख कामांध ।
 अपने तीर बुलाय के, तीर साधता सान्ध |
तीर साधता सान्ध, बांधता जंजीरों से |
घायल तन मन प्राण, करे जालिम तीरों से |
गर्भवती हो जाय, ढूँढ़ता कुत्ता अगली |
दुष्ट मस्त निर्द्वन्द, करे उसका क्या पगली ||


टूटते परिवार, बिखरता समाज – विश्व परिवार दिवस पर कुछ विचार

मनोज कुमार at विचार - 58 minutes ago
संसाधन सा जानिये, संयुत कुल परिवार |
गाढ़े में ठाढ़े मिलें, बिना लिए आभार |

बिना लिए आभार, कृपा की करते वृष्टी |
दादा दादी देव, दुआ दे दुर्लभ दृष्टी |

सच्चे रिश्ते मुफ्त, हमेशा भला इरादा |
रखे सकल परिवार, सदा अक्षुण मर्यादा |

5 comments:

  1. Nice .

    Please see

    दशक का ब्लॉगर, एक और गड़बड़झाला
    http://blogkikhabren.blogspot.in/2012/05/blog-post_14.html

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  2. जबरदस्त काव्यात्मक हलचल ..

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  3. कुत्ता भी ढूँढता है
    रविकर को पता है।
    वाह !!

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  4. पगली है तो क्या हुआ, मांस देख कामांध ।
    अपने तीर बुलाय के, तीर साधता सान्ध |
    तीर साधता सान्ध, बांधता जंजीरों से |
    घायल तन मन प्राण, करे जालिम तीरों से |
    गर्भवती हो जाय, ढूँढ़ता कुत्ता अगली |
    दुष्ट मस्त निर्द्वन्द, करे उसका क्या पगली ||
    तीर का यमक काबिले गौर है मूल पोस्ट पढ़ा है अभी .बहुत ही मार्मिक प्रस्तुति अमूर्त समाज का सुरूप चेरा नोंचती सी

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