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Thursday, 17 May 2012

चीनी कडुवी होय, कहाँ अब प्रेम-सेवइयां -

"कड़वी चीनी"


नमक खाय के भी करें, लुच्चे हमें हलाल ।
घूस खाय के ख़ास-जन, खूब बजावें गाल । 

खूब बजावें गाल, चाल टेढ़ी ही चलते।
आम रसीले चूस, भद्र-जनता को छलते ।

कडुआहट भरपूर, भरें जीवन में भैया  ।
चीनी कडुवी होय,  कहाँ अब प्रेम-सेवइयां ।।

"देश में हम जहर उगलते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


गिरगिटान ने गिलट से,  गिला किया है दूर |
गिरहबाज गोते लगा, मजा करे भरपूर |


मजा करे भरपूर, चूर कलई करवा कर |
पद-मद चढ़ा शुरूर, चना थोथा बजवाकर |


पर कलई जिस रोज, खुलेगी रविकर तेरी |
*गिलगिल मार भगाय, नहीं किंचित भी देरी |

*घड़ियाल / मगरमच्छ



रोजगार गहरे जुड़े, हिन्दी का व्यवहार |
जार जार बेजार हो, हिंदी बिन बाजार |

हिंदी बिन बाजार, अर्थ भी जब जुड़ जाता |
रहा विरोधी घोर, शीश खुद चला नवाता |

हिंदी तन मन प्राण, राष्ट्र की मंगल-रेखा |
तुलसी सूर कबीर, प्रेम जय देवी देखा ।।

6 comments:

  1. हिंदी तन मन प्राण, राष्ट्र की मंगल-रेखा |
    तुलसी सूर कबीर, प्रेम जय देवी देखा ।।

    बहुत सुंदर कुंडलियाँ ,..अच्छी प्रस्तुति

    MY RECENT POST,,,,फुहार....: बदनसीबी,.....

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  2. कडुआहट भरपूर, भरें जीवन में भैया ।
    चीनी कडुवी होय, कहाँ अब प्रेम-सेवइयां ।।टिपण्णी खूब लिखें अपने ये रविकर भैया
    हिंदी तन मन प्राण, राष्ट्र की मंगल-रेखा |
    तुलसी सूर कबीर, प्रेम जय देवी देखा ।।

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  3. बहुत उत्तम कुण्डलियाँ

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  4. .चर्चा मंच पर फिर अच्छी लगी यह रचना .

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