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Saturday, 12 May 2012

ईस्वी सन उनचास, किये खुद नेहरु कब का -


  ZEAL 


जनता खड़ी निहारती, चाचा चाबुक तान |
हैं घोंघे को ठेलते, लें बाबा संज्ञान |





लें बाबा संज्ञान, रोल हम सभी सराहें |
संविधान निर्माण , भरे संसद क्यूँ आहें | 


न कोई अपमान, विमोचन इस पुस्तक का |
ईस्वी सन उनचास, किये खुद नेहरु कब का ||


बीमा एक करोड़ का, करने से क्या लाभ |
कर जुगाड़ मालिक बड़ा,  बनकर नौकर चाभ |

बनकर नौकर चाभ, लाभ का सौदा प्यारे |
अवमूल्यन का दौर, किश्त भर बीमा मारे  |

आँखे रक्खो खोल, पोल बड़ खोलो भाई |
भरे पड़े हैं चोर, करो इस तरह कमाई ||

7 comments:

  1. वाह: बहुत सुन्दर...

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  2. चलिये अगली बार पोल उठाते हैं ।

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  3. वाह !!!! क्या बात है ,

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    --
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  5. इंस्टैंट कॉफ़ी , इंस्टेंट गीज़र , इंस्टैंट पराठे तो सुने देखे थे, लेकिन आलेखों पर , कविताओं के रूप में लिखी गयी आपकी "हाजिरजवाब टिप्पणियां" तो यकीनन मन मोह लेने वाली होती हैं। आभार।

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  6. जनता खड़ी निहारती, चाचा चाबुक तान |
    हैं घोंघे को ठेलते, लें बाबा संज्ञान |

    badhiyaaa hai bhaai saahab sateek .,nishaane par .

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