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Monday, 21 May 2012

करे शमन अभिमान, नहीं ये दम्भी-ज्ञानी-

लेखकीय स्वाभिमान के निहितार्थ



(1)

दम्भी ज्ञानी हर सके, साधुवेश में नार |
नीति नियम ना सुन सके, झटक लात दे मार |

झटक लात दे मार, चाहता लल्लो-चप्पो |
झूठी शान दिखाय, रखे नित हाई टम्पो |

जाने ना पुरुषार्थ, करे पर बात सयानी |
नहीं शमन अभिमान, करे ये दम्भी-ज्ञानी ||

(2)
एम् टेक एड्मिसन लई, अरुण निगम सह पूत |
मेजबान मेरे बने, पाया स्नेह अकूत |

पाया स्नेह अकूत, बिदाई  हुई आज है |
था पहला कर्तव्य, हुआ संपन्न काज है |

रविकर है निश्चिन्त, करेगा नियमित दर्शन |
सादर सुज्ञ प्रणाम, करूं टिप्पण का सृजन || 


6 comments:

  1. जाने ना पुरुषार्थ, करे पर बात सयानी |
    नहीं शमन अभिमान, करे ये दम्भी-ज्ञानी ||
    मनभावन सृजन के क्षण हैं ये ज़नाबे आला आना आपके ब्लॉग पर आरती की टेक है .
    सुपुत्र निगम को बधाई हमारी भी .
    कृपया यहाँ भी पधारें -
    सोमवार, 21 मई 2012
    यह बोम्बे मेरी जान (चौथा भाग )
    http://veerubhai1947.blogspot.in/
    तेरी आँखों की रिचाओं को पढ़ा है -
    उसने ,
    यकीन कर ,न कर .

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  2. वाह ,,,, बहुत अच्छी प्रस्तुति,,,,

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  3. सिम्पली ब्रिलिएंट!

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...

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  5. तो यहाँ भी सजाया है? आभार!!
    अर्थ समर्थ काव्य!!

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