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Friday, 11 May 2012

पौ बारह या हार, झेलना ही पड़ता है-

  (प्रवीण पाण्डेय) at न दैन्यं न पलायनम्

सट्टा शेयर जुआं से, रह सकते हम दूर |
जीवन के कुछ दांव पर, कर देते मजबूर |
कर देते मजबूर, खेलना ही पड़ता है |
पौ बारह या हार, झेलना ही पड़ता है |
पड़ता उलटा दांव, शाख पर लागे बट्टा |
बने सिकंदर जीत, खेल के जीवन सट्टा ||

हुई वोल्टेज लो तनिक, बिजली रानी जाँय |
पानी की मुश्किल हुई, गर्मी तन तड़पाय |
 गर्मी तन तड़पाय, हुई मंहगाई हाई ।
बैठा मन गम खाय, प्यास पर कौन बुझाई ।
लो-हाई का खेल, व्यवस्था पूर्ण हिलादी ।
तंत्र हुआ जब फेल, बनो सब इसके आदी ।


प्रेम-पंथ भाए कहाँ, विकट जगत जंजाल   |
चलिए उत्तर खोजिये, सम्मुख कठिन सवाल |
सम्मुख कठिन सवाल, भ्रूण में मरती बाला |
बिगड़  रहे सुरताल, समय करता मुंह काला |
रविकर नारी आज, पुन: छोड़ी सुख-शैया  |
करना ठीक समाज, पिता बाबा पति भैया ||

मेरे दोस्त, मैं एक बार मरना तो चाहता हूँ


मरकर ज़िंदा हो रहे, है हिम्मत का काम |
डबल बहादुर हैं प्रभू , बारम्बार सलाम |
बारम्बार सलाम, करे कुछ लोग तगादा |
बीबी ढूँढे  काम,  दोस्त दस बाढ़े ज्यादा |
बेटा डबल सवार, ढूंढता नया परिंदा |
ठीक-ठाक परिवार, करो क्या होकर ज़िंदा ||

5 comments:

  1. रविकर नारी आज, पुन: छोड़ी सुख-शैया |
    करना ठीक समाज, पिता बाबा पति भैया |

    क्या बात है, बहुत सुंदर,.......

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  2. बहुत सुन्दर....लाजवाब..

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  3. वाकई जवाब नहीं !!

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  4. दिनेश जी, टिप्पणियों के दोहे बहुत कमाल होते हैं आपके. रचना से संबद्ध अर्थपूर्ण दोहे के लिए बधाई. टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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