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Saturday, 27 October 2012

नहीं कहें आभार, कभी भी बड़के आके-



यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) 

 चौवालिस सौ हिट मिली, एक माह में मित्र ।
गाल फुला के बैठते, हालत बड़ी विचित्र ।
हालत बड़ी विचित्र, मित्र यशवंत बताएं ।
शुभकामना सँदेश, जन्म दिन में भिजवायें ।
वर्षगाँठ हर विविध, पलक पाँवड़े विछा के ।
नहीं कहें आभार, कभी भी बड़के आके ।।


ईद मुबारक

Surendra shukla" Bhramar"5 

एक नियंता विश्व का, वो ही पालनहार ।
मानव पर करता रहे, अदल बदल व्यवहार । 
अदल बदल व्यवहार, हार को जीत समझता । 
मेरा तेरा ईश, करे बकवाद उलझता ।
समझ धर्म का मूल,  नहीं कर तू नादानी ।
झगडे झंझट छोड़, बोल ले मीठी वाणी ।।

"मेरा सुझाव अच्छा लगे तो इस कड़वे घूँट का पान करें"

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) 

अपना न्यौता बांटते, पढवाते निज लेख |
स्वयं कहीं जाते नहीं, मारें शेखी शेख |
मारें शेखी शेख, कभी दूजे घर जाओ |
इक प्यारी टिप्पणी, वहां पर जाय लगाओ |
करो तनिक आसान, टिप्पणी करना भाये  |
कभी कभी रोबोट, हमें भी बहुत सताए ||

बिटिया अपूर्वा हुईं दो साल की : जीवन के विविध रंग

KK Yadav 
अनुपम सुता अपूर्वा, नए अनोखे चित्र ।
मात-पिता की नाज यह, है दीदी की मित्र ।
है दीदी की मित्र, विचित्र गतिविधियाँ देखीं ।
उदीयमान बालिका, वेग ब्लॉगर संरेखी ।
रविकर शुभकामना, स्वास्थ्य बल बुद्धि शिक्षा ।
करो सदा उत्तीर्ण,  धरा की विविध परीक्षा ।  

सुरकण्डा देवी की बर्फ़ व उत्तरकाशी से नरेन्द्रनगर तक बारिश bike trip


बारिस की रिश ना सकी, वेग जाट का थाम ।
देवी दर्शन के बिना, कहाँ उसे विश्राम ।
कहाँ उसे विश्राम, यात्रा पूर्ण अखंडा ।
पार करे व्यवधान, दर्श देवी सुरकंडा ।
रविकर की हे जाट, करो तो तनिक सिफारिस ।
माँ की होवे कृपा, स्नेह की हरदम बारिस ।। 

बांध न मुझ को बाहू पाश में .....

Suman 

पुष्पराज तू  दुष्ट है, मद पराग रज बाँट ।
तन मन मादकता भरे, लेते हम जो चाट ।

लेते हम जो चाट, नयन अधखुले हमारे ।

समझ सके ना रात, बंद पंखुड़ी किंवारे ।

छलता रे अभिजात्य, भूलता सत रिवाज तू ।

छोड़े मुझको प्रात, छली है पुष्पराज तू ।।

kavitayen
 शहरों की यह बेरुखी, दिन प्रतिदिन गंभीर ।
जीव-जंतु की क्या कहें, दे मानव को पीर ।
दे मानव को पीर, किन्तु शहरों से गायब ।
बस्ती रही मशीन, बना यह शहर अजायब ।
कंक्रीट को पीट, सीट अधिसंख्य बनाई ।
एक अदद भी नहीं, कहीं से चिड़िया आई ।।


man ka manthan. मन का मंथन।
फुर्सत में भगवान् हैं, धरे हाथ पर हाथ ।
धरती पर ही हो गए, लाखों स्वामी नाथ ।

लाखों स्वामी नाथ , भक्त ले लेकर भागे ।

चढ़े चढ़ावा ढेर, मनोरथ पूरे आगे ।

करिए कुछ भगवान्, थामिए गन्दी हरकत ।

करें लोक कल्याण, त्यागिये ऐसी फुर्सत ।।


 ram ram bhai  

अधकचरे नव विज्ञानी, परखें पित्तर पाख ।
 दिखा रहे अनवरत वे, हमें तार्किक आँख ।
हमें तार्किक आँख, शुद्ध श्रद्धा का मसला ।

समझाओ यह लाख, समझता वह ना पगला ।

पर पश्चिम सन्देश, अगर धरती पर पसरे ।

चपटी धरती कहे, यही बन्दे अधकचरे ।।

5 comments:

  1. धन्यवाद अंकल!अपना आशीर्वाद यूं ही बनाए रखें।

    सादर

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  2. अरे वाह!
    अब तो बहुतों की पोस्ट को टिपिया दिया आपने!

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  3. प्रिय रविकर जी आभार आप का
    आप ने सुन्दर वचन कहे काश सभी ऐसे ही मानें जाने गले मिलें तो ईद का आनंद और आये इस सुन्दर बनायें लोग ...

    बहुत सुन्दर लिंक्स और आप के अनमोल वचन सोने पर सुहागा सभी प्रिय कवी लेखक गण को बधाई
    भ्रमर 5

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  4. आज लिस्ट लंबी हो गयी. वैसे लिंक्स बहुत अच्छे हैं. धन्यबाद.

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