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Wednesday, 31 October 2012

अस्वाभाविक ग्रोथ का, सीधा सरल निचोड़-



 Politics To Fashion
अस्वाभाविक ग्रोथ का, सीधा सरल निचोड़ |
आम जनों के रक्त से, करते जमा करोड़ |
करते जमा करोड़, जुगाड़ी जुगल जोड़ियाँ |
करें अशर्फी जमा, बड़ी दमदार कौडियाँ |
मूत रहे ये आग, बड़ा साम्राज्य खडा है |
हाड़ मांस की नींव, आदमी दबा पड़ा है ||


नहीं रूकेंगे बलात्कार

रणधीर सिंह सुमन 

मारा पहले कोख में, बिना दोष के दोस्त |
ज़िंदा बच जाए अगर, सोंधा सोंधा गोश्त |
सोंधा सोंधा गोश्त, नोच कर कच्चा खाओ |
खाप गई है खेप, इसे श्मशान भिजाओ |
मूल विषय को भूल, कुतर्की यह हत्यारा |
ठीक करे अनुपात, करे ना मारी मारा ||

वक्त को संभालो.... !!!

यादें...

कैसे भूल जाऊं तेरी यादो को, जिन्हे याद करने से तू याद आए॥ 
 
गुजर-बसर में गुजरता, सारा जीवन काल ।
 किन्तु काल सिर पर खड़ा, पूछे हाल हवाल ।   
 
पूछे हाल हवाल, सवालों ने है घेरा ।
लगा  रहा रे जीव, युगों से जग का फेरा ।
 
इन्तजार क्या करे, जुटे अब इंतजाम में ।
छोड़ो काम-तमाम, देर अब नहीं शाम में ।।
 

गोत्रज विवाह-

गुण-सूत्रों की विविधता, बहुत जरूरी चीज |
गोत्रज में कैसे मिलें, रखिये सतत तमीज ||
गोत्रज दुल्हन जनमती, एकल-सूत्री रोग |
दैहिक सुख की लालसा, बेबस संतति भोग ||
मिटते दारुण दोष पर, ईश्वर अगर सहाय |
सबसे उत्तम ब्याह हित, दूरी रखो बनाय ||
गोत्र-प्रांत की भिन्नता, नए नए गुण देत |
संयम विद्या बुद्धि बल, साहस रूप समेत ||

मेरे हिस्से की धूप

दूरी विरह शिकायतें, महायुद्ध हो जाय |
इन्तजार यादें बनीं, सही प्रेम पर्याय |
सही प्रेम पर्याय,  झाड़ भी रही स्वादमय |
झूठ-मूठ का क्रोध, हमेशा कच्चा अभिनय |
यह सब मिलकर प्यार, बने संसार हमारा |
कान्हा का उपकार, विरह भी बने सहारा ||


नारी

Minakshi Pant  
छुट्टी का हक़ है सखी, चौबिस घंटा काम |
  सास ससुर सुत सुता पति, सेवा में हो शाम |

सेवा में हो शाम, नहीं सी. एल. नहिं इ. एल. |
जब केवल सिक लीव,  जाय ना जीवन जीयल |


रविकर मइके जाय, पिए जो माँ की घुट्टी |
  ढूँढे निज अस्तित्व, बिता के दस दिन छुट्टी ||

थरूर की बीबी - मोदी का दर्द

Arunesh c dave 
अपनी सत्ता सुंदरी, पर कर मोदी गौर |
व्याह करा दें कहीं ना, थेथर थूर खखोर |
थेथर थूर खखोर,  पड़ा कल जबर चटकना |
बाकी रहते भोर, बंद कर उधर भटकना |
कर समाज कल्याण, खबर तेरी सब छपनी |
अरबों की माशूक, संभाले भरदम अपनी ||



तांडव शंकर दे मचा , नचा विश्व परिदृश्य |
विशिष्ट ऊर्जा जल भरे, करे जलजला पृश्य |
करे जलजला पृश्य, दृश्य नहिं देखा जाए |
जल जाए जब जगत, हजारों जाने खाए |
क्षिति जल पावक गगन, वायू से मंच पांडव |
छेड़ छाड़ कर बंद, नहीं तो झेल तांडव || 


पिला रही निज रक्त, मदर-विदुषी यह बोली- 
दूध मांसाहार है, अंडा शाकाहार ।
भ्रष्ट-बुद्धि की बतकही, ममता का सहकार ।
ममता का सहकार, रुदन शिशु का अपराधिक ।
माता हटकु पसीज, छद्म गौ-बछड़े माफिक ।
पिला रही निज रक्त, मदर-विदुषी यह बोली ।
युगों युगों की खोज, बड़ी शिद्दत से खोली ।।

हैं फॉलोवर ढेर, चेत हे ब्लॉगर नामी-

कामी क्रोधी लालची, पाये बाह्य उपाय ।
उद्दीपक का तेज नित, इधर उधर भटकाय ।
इधर उधर भटकाय, कुकर्मों में फंस जाता ।
अहंकार का दोष, मगर अंतर से आता।
हैं फॉलोवर ढेर, चेत हे ब्लॉगर नामी ।
पद मद में हो चूर, बने नहिं क्रोधी कामी ।।



15 comments:



  1. नहीं रूकेंगे बलात्कार
    रणधीर सिंह सुमन
    लो क सं घ र्ष !


    मारा पहले कोख में, बिना दोष के दोस्त |
    ज़िंदा बच जाए अगर, सोंधा सोंधा गोश्त |
    सोंधा सोंधा गोश्त, नोच कर कच्चा खाओ |
    खाप गई है खेप, इसे श्मशान भिजाओ |
    मूल विषय को भूल, कुतर्की यह हत्यारा |
    ठीक करे अनुपात, करे ना मारी मारा ||
    बहुत सटीक धारदार काव्य .बधाई .

    बहुत मार्मिक प्रस्तुति .

    ReplyDelete
  2. नहीं रूकेंगे बलात्कार
    रणधीर सिंह सुमन
    लो क सं घ र्ष !


    मारा पहले कोख में, बिना दोष के दोस्त |
    ज़िंदा बच जाए अगर, सोंधा सोंधा गोश्त |
    सोंधा सोंधा गोश्त, नोच कर कच्चा खाओ |
    खाप गई है खेप, इसे श्मशान भिजाओ |
    मूल विषय को भूल, कुतर्की यह हत्यारा |
    ठीक करे अनुपात, करे ना मारी मारा ||
    बहुत सटीक धारदार काव्य .बधाई .

    बहुत मार्मिक प्रस्तुति .

    जाएं तो हम इनके इहाँ भी टिपियाने लेकिन ई ससुर (सुसर )केकड़ा वृत्ति से ग्रस्त हैं कोई आगे बढ़ता है ,ईर्ष्या से उसकी ये टांग पीछे की ओर खींच लेते हैं .अब ये ही सुमन हैं ये पुष्प हैं .

    ReplyDelete
  3. गोत्रज विवाह-
    गुण-सूत्रों की विविधता, बहुत जरूरी चीज |

    गोत्रज में कैसे मिलें, रखिये सतत तमीज ||

    गोत्रज दुल्हन जनमती, एकल-सूत्री रोग |

    दैहिक सुख की लालसा, बेबस संतति भोग ||

    मिटते दारुण दोष पर, ईश्वर अगर सहाय |

    सबसे उत्तम ब्याह हित, दूरी रखो बनाय ||

    गोत्र-प्रांत की भिन्नता, नए नए गुण देत |

    संयम विद्या बुद्धि बल, साहस रूप समेत ||

    बहुत सही कहा है रविकर जी .जीनी विविधता (जीवन खंडों की विविधता )तथा

    संततियों के बौद्धिक विकास के लिए जीन विविधता ज़रूरी है जीन विविधता बोले तो

    अंतर -जातीय ,अंतर -प्रांतीय ,अंतर -कोस्मिक विवाह .नोट करें खापी ./खापिये /खापड़े .
    http://dineshkidillagi.blogspot.com/2012/10/blog-post_31.html?showComment=1351711577286#c2839803669644452090

    WEDNESDAY, 31 OCTOBER 2012

    अस्वाभाविक ग्रोथ का, सीधा सरल निचोड़-

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  4. Super Storm Sandy


    वीरू भाई




    ram ram bhai

    तांडव शंकर दे मचा , नचा विश्व परिदृश्य |
    विशिष्ट ऊर्जा जल भरे, करे जलजला पृश्य |
    करे जलजला पृश्य, दृश्य नहिं देखा जाए |
    जल जाए जब जगत, हजारों जाने खाए |
    क्षिति जल पावक गगन, वायू से मंच पांडव |
    छेड़ छाड़ कर बंद, नहीं तो झेल तांडव ||

    बेहतरीन भावांतरण मूल आलेख का .शुक्रिया .

    ReplyDelete
  5. नहीं रूकेंगे बलात्कार
    रणधीर सिंह सुमन
    लो क सं घ र्ष !


    मारा पहले कोख में, बिना दोष के दोस्त |
    ज़िंदा बच जाए अगर, सोंधा सोंधा गोश्त |
    सोंधा सोंधा गोश्त, नोच कर कच्चा खाओ |
    खाप गई है खेप, इसे श्मशान भिजाओ |
    मूल विषय को भूल, कुतर्की यह हत्यारा |
    ठीक करे अनुपात, करे ना मारी मारा ||
    बहुत सटीक धारदार काव्य .बधाई .

    बहुत मार्मिक प्रस्तुति .

    जाएं तो हम इनके इहाँ भी टिपियाने लेकिन ई ससुर (सुसर )केकड़ा वृत्ति से ग्रस्त हैं कोई आगे बढ़ता है ,ईर्ष्या से उसकी ये टांग पीछे की ओर खींच लेते हैं .अब ये ही सुमन हैं ये पुष्प हैं .
    गोत्रज विवाह-
    गुण-सूत्रों की विविधता, बहुत जरूरी चीज |

    गोत्रज में कैसे मिलें, रखिये सतत तमीज ||

    गोत्रज दुल्हन जनमती, एकल-सूत्री रोग |

    दैहिक सुख की लालसा, बेबस संतति भोग ||

    मिटते दारुण दोष पर, ईश्वर अगर सहाय |

    सबसे उत्तम ब्याह हित, दूरी रखो बनाय ||

    गोत्र-प्रांत की भिन्नता, नए नए गुण देत |

    संयम विद्या बुद्धि बल, साहस रूप समेत ||

    बहुत सही कहा है रविकर जी .जीनी विविधता (जीवन खंडों की विविधता )तथा

    संततियों के बौद्धिक विकास के लिए जीन विविधता ज़रूरी है जीन विविधता बोले तो

    अंतर -जातीय ,अंतर -प्रांतीय ,अंतर -कोस्मिक विवाह .नोट करें खापी ./खापिये /खापड़े .

    बेहतरीन भावांतरण मूल आलेख का .शुक्रिया .

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  6. नहीं रूकेंगे बलात्कार
    रणधीर सिंह सुमन
    लो क सं घ र्ष !


    मारा पहले कोख में, बिना दोष के दोस्त |
    ज़िंदा बच जाए अगर, सोंधा सोंधा गोश्त |
    सोंधा सोंधा गोश्त, नोच कर कच्चा खाओ |
    खाप गई है खेप, इसे श्मशान भिजाओ |
    मूल विषय को भूल, कुतर्की यह हत्यारा |
    ठीक करे अनुपात, करे ना मारी मारा ||
    बहुत सटीक धारदार काव्य .बधाई .

    बहुत मार्मिक प्रस्तुति .

    जाएं तो हम इनके इहाँ भी टिपियाने लेकिन ई ससुर (सुसर )केकड़ा वृत्ति से ग्रस्त हैं कोई आगे बढ़ता है ,ईर्ष्या से उसकी ये टांग पीछे की ओर खींच लेते हैं .अब ये ही सुमन हैं ये पुष्प हैं .
    गोत्रज विवाह-
    गुण-सूत्रों की विविधता, बहुत जरूरी चीज |

    गोत्रज में कैसे मिलें, रखिये सतत तमीज ||

    गोत्रज दुल्हन जनमती, एकल-सूत्री रोग |

    दैहिक सुख की लालसा, बेबस संतति भोग ||

    मिटते दारुण दोष पर, ईश्वर अगर सहाय |

    सबसे उत्तम ब्याह हित, दूरी रखो बनाय ||

    गोत्र-प्रांत की भिन्नता, नए नए गुण देत |

    संयम विद्या बुद्धि बल, साहस रूप समेत ||

    बहुत सही कहा है रविकर जी .जीनी विविधता (जीवन खंडों की विविधता )तथा

    संततियों के बौद्धिक विकास के लिए जीन विविधता ज़रूरी है जीन विविधता बोले तो

    अंतर -जातीय ,अंतर -प्रांतीय ,अंतर -कोस्मिक विवाह .नोट करें खापी ./खापिये /खापड़े .

    बेहतरीन भावांतरण मूल आलेख का .शुक्रिया .

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  7. नहीं रूकेंगे बलात्कार
    रणधीर सिंह सुमन
    लो क सं घ र्ष !


    मारा पहले कोख में, बिना दोष के दोस्त |
    ज़िंदा बच जाए अगर, सोंधा सोंधा गोश्त |
    सोंधा सोंधा गोश्त, नोच कर कच्चा खाओ |
    खाप गई है खेप, इसे श्मशान भिजाओ |
    मूल विषय को भूल, कुतर्की यह हत्यारा |
    ठीक करे अनुपात, करे ना मारी मारा ||
    बहुत सटीक धारदार काव्य .बधाई .

    बहुत मार्मिक प्रस्तुति .

    जाएं तो हम इनके इहाँ भी टिपियाने लेकिन ई ससुर (सुसर )केकड़ा वृत्ति से ग्रस्त हैं कोई आगे बढ़ता है ,ईर्ष्या से उसकी ये टांग पीछे की ओर खींच लेते हैं .अब ये ही सुमन हैं ये पुष्प हैं .
    गोत्रज विवाह-
    गुण-सूत्रों की विविधता, बहुत जरूरी चीज |

    गोत्रज में कैसे मिलें, रखिये सतत तमीज ||

    गोत्रज दुल्हन जनमती, एकल-सूत्री रोग |

    दैहिक सुख की लालसा, बेबस संतति भोग ||

    मिटते दारुण दोष पर, ईश्वर अगर सहाय |

    सबसे उत्तम ब्याह हित, दूरी रखो बनाय ||

    गोत्र-प्रांत की भिन्नता, नए नए गुण देत |

    संयम विद्या बुद्धि बल, साहस रूप समेत ||

    बहुत सही कहा है रविकर जी .जीनी विविधता (जीवन खंडों की विविधता )तथा

    संततियों के बौद्धिक विकास के लिए जीन विविधता ज़रूरी है जीन विविधता बोले तो

    अंतर -जातीय ,अंतर -प्रांतीय ,अंतर -कोस्मिक विवाह .नोट करें खापी ./खापिये /खापड़े .

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  8. ar Sharma veerubhai1947@gmail.com
    3:39 PM (0 minutes ago)

    to dinesh
    सुप्रिय रविकर जी ,

    टिप्पणियों को आप सर्व -भक्षी खान्ग्रेसी हो चुके स्पैम से बचा नहीं पा रहे हैं .

    इसीलिए यहाँ भी -

    नहीं रूकेंगे बलात्कार
    रणधीर सिंह सुमन
    लो क सं घ र्ष !


    मारा पहले कोख में, बिना दोष के दोस्त |
    ज़िंदा बच जाए अगर, सोंधा सोंधा गोश्त |
    सोंधा सोंधा गोश्त, नोच कर कच्चा खाओ |
    खाप गई है खेप, इसे श्मशान भिजाओ |
    मूल विषय को भूल, कुतर्की यह हत्यारा |
    ठीक करे अनुपात, करे ना मारी मारा ||
    बहुत सटीक धारदार काव्य .बधाई .

    बहुत मार्मिक प्रस्तुति .

    जाएं तो हम इनके इहाँ भी टिपियाने लेकिन ई ससुर (सुसर )केकड़ा वृत्ति से ग्रस्त हैं कोई आगे बढ़ता है ,ईर्ष्या से उसकी ये टांग पीछे की ओर खींच लेते हैं .अब ये ही सुमन हैं ये पुष्प हैं .
    गोत्रज विवाह-
    गुण-सूत्रों की विविधता, बहुत जरूरी चीज |

    गोत्रज में कैसे मिलें, रखिये सतत तमीज ||

    गोत्रज दुल्हन जनमती, एकल-सूत्री रोग |

    दैहिक सुख की लालसा, बेबस संतति भोग ||

    मिटते दारुण दोष पर, ईश्वर अगर सहाय |

    सबसे उत्तम ब्याह हित, दूरी रखो बनाय ||

    गोत्र-प्रांत की भिन्नता, नए नए गुण देत |

    संयम विद्या बुद्धि बल, साहस रूप समेत ||

    बहुत सही कहा है रविकर जी .जीनी विविधता (जीवन खंडों की विविधता )तथा

    संततियों के बौद्धिक विकास के लिए जीन विविधता ज़रूरी है जीन विविधता बोले तो

    अंतर -जातीय ,अंतर -प्रांतीय ,अंतर -कोस्मिक विवाह .नोट करें खापी ./खापिये /खापड़े .

    बेहतरीन भावांतरण मूल आलेख का .शुक्रिया .
    वीरुभाई .

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  9. सुप्रिय रविकर जी ,

    टिप्पणियों को आप सर्व -भक्षी खान्ग्रेसी हो चुके स्पैम से बचा नहीं पा रहे हैं .

    इसीलिए यहाँ भी -

    नहीं रूकेंगे बलात्कार
    रणधीर सिंह सुमन
    लो क सं घ र्ष !


    मारा पहले कोख में, बिना दोष के दोस्त |
    ज़िंदा बच जाए अगर, सोंधा सोंधा गोश्त |
    सोंधा सोंधा गोश्त, नोच कर कच्चा खाओ |
    खाप गई है खेप, इसे श्मशान भिजाओ |
    मूल विषय को भूल, कुतर्की यह हत्यारा |
    ठीक करे अनुपात, करे ना मारी मारा ||
    बहुत सटीक धारदार काव्य .बधाई .

    बहुत मार्मिक प्रस्तुति .

    जाएं तो हम इनके इहाँ भी टिपियाने लेकिन ई ससुर (सुसर )केकड़ा वृत्ति से ग्रस्त हैं कोई आगे बढ़ता है ,ईर्ष्या से उसकी ये टांग पीछे की ओर खींच लेते हैं .अब ये ही सुमन हैं ये पुष्प हैं .
    गोत्रज विवाह-
    गुण-सूत्रों की विविधता, बहुत जरूरी चीज |

    गोत्रज में कैसे मिलें, रखिये सतत तमीज ||

    गोत्रज दुल्हन जनमती, एकल-सूत्री रोग |

    दैहिक सुख की लालसा, बेबस संतति भोग ||

    मिटते दारुण दोष पर, ईश्वर अगर सहाय |

    सबसे उत्तम ब्याह हित, दूरी रखो बनाय ||

    गोत्र-प्रांत की भिन्नता, नए नए गुण देत |

    संयम विद्या बुद्धि बल, साहस रूप समेत ||

    बहुत सही कहा है रविकर जी .जीनी विविधता (जीवन खंडों की विविधता )तथा

    संततियों के बौद्धिक विकास के लिए जीन विविधता ज़रूरी है जीन विविधता बोले तो

    अंतर -जातीय ,अंतर -प्रांतीय ,अंतर -कोस्मिक विवाह .नोट करें खापी ./खापिये /खापड़े .

    बेहतरीन भावांतरण मूल आलेख का .शुक्रिया .
    वीरुभाई .

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  10. सुप्रिय रविकर जी ,

    टिप्पणियों को आप सर्व -भक्षी खान्ग्रेसी हो चुके स्पैम से बचा नहीं पा रहे हैं .

    इसीलिए यहाँ भी -

    नहीं रूकेंगे बलात्कार
    रणधीर सिंह सुमन
    लो क सं घ र्ष !


    मारा पहले कोख में, बिना दोष के दोस्त |
    ज़िंदा बच जाए अगर, सोंधा सोंधा गोश्त |
    सोंधा सोंधा गोश्त, नोच कर कच्चा खाओ |
    खाप गई है खेप, इसे श्मशान भिजाओ |
    मूल विषय को भूल, कुतर्की यह हत्यारा |
    ठीक करे अनुपात, करे ना मारी मारा ||
    बहुत सटीक धारदार काव्य .बधाई .

    बहुत मार्मिक प्रस्तुति .

    जाएं तो हम इनके इहाँ भी टिपियाने लेकिन ई ससुर (सुसर )केकड़ा वृत्ति से ग्रस्त हैं कोई आगे बढ़ता है ,ईर्ष्या से उसकी ये टांग पीछे की ओर खींच लेते हैं .अब ये ही सुमन हैं ये पुष्प हैं .
    गोत्रज विवाह-
    गुण-सूत्रों की विविधता, बहुत जरूरी चीज |

    गोत्रज में कैसे मिलें, रखिये सतत तमीज ||

    गोत्रज दुल्हन जनमती, एकल-सूत्री रोग |

    दैहिक सुख की लालसा, बेबस संतति भोग ||

    मिटते दारुण दोष पर, ईश्वर अगर सहाय |

    सबसे उत्तम ब्याह हित, दूरी रखो बनाय ||

    गोत्र-प्रांत की भिन्नता, नए नए गुण देत |

    संयम विद्या बुद्धि बल, साहस रूप समेत ||

    बहुत सही कहा है रविकर जी .जीनी विविधता (जीवन खंडों की विविधता )तथा

    संततियों के बौद्धिक विकास के लिए जीन विविधता ज़रूरी है जीन विविधता बोले तो

    अंतर -जातीय ,अंतर -प्रांतीय ,अंतर -कोस्मिक विवाह .नोट करें खापी ./खापिये /खापड़े .

    बेहतरीन भावांतरण मूल आलेख का .शुक्रिया .
    वीरुभाई .

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  11. बहुत बढ़िया!
    करवाचौथ की अग्रिम शुभकामनाएँ!

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  12. समसामयिक सामाजिक दोषों पर कटाक्ष पूर्ण शशक्त प्रहार.....

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  13. मेरी रचना को यहाँ स्थान देने का बहुत - बहुत शुक्रिया रविकर जी |

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