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Friday, 5 October 2012

पुत्र-पिता-पति-भ्रातृ, पडोसी प्रियतम पगला-



The मध्यवर्ग

  (सतीश पंचम) 
  कहे दोगला नामवर, पूरा मध्यम वर्ग ।
संस्कार की ओढ़नी, उच्च वर्ग का स्वर्ग ।
उच्च वर्ग का स्वर्ग, चतुर चम्गीदढ़ चालू ।
यहाँ हिलाए पंख, पेड़ ढूंढे यह *मालू ।
दांत दिखाता जाय, जहाँ पर वर्ग खोखला ।
ऊंचे स्वप्न दिखाय, झूठ गढ़ चले दोगला ।।
* पेड़ पर चढ़ने वाली एक लता 


प्रिंट मीडिया ने खोजा “ पेड न्यूज ” का तोड़ !

बनिया डंडी मार के, ग्वाला पानी बेंच ।
चतुर सयाने लें कमा, पैदा करके पेंच ।
पैदा करके पेंच, नाप पेट्रोल कमाता ।
बेचारा अखबार, चला के क्या कुछ  पाता ।
पेड न्यूज दे छाप, काँप लेकिन अब जाता ।
पीछे दिया लगाय, हाय क्यूँ जांच विधाता ।। 


Untitled

Rajesh Kumari 

कलयुग जाने से रहा, फिर भी रविकर साथ ।
सकल शुभेच्छा आपकी , पूर्ण करो हे नाथ ।
पूर्ण करो हे नाथ, हाथ अब पुन:  लगाओ ।
पांच तत्व के साथ, जरा बारूद सटाओ  ।
तन की गर्मी बढ़े, जले वह करके भुग-भुग ।
दुनिया को न खले, बदल जाए यह कलयुग ।।

"बात अन्धश्रद्धा की नहीं है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) 

श्रद्धा सह विश्वास की, सदा जरुरत घोर |
आस्था का यदि मामला, नहीं तर्क का जोर |
नहीं तर्क का जोर, पूर्वज याद कीजिये |
चलो सदा सन्मार्ग, नियम से श्राद्ध कीजिये |
पित्तर कोटि प्रणाम, मिले आशीष तुम्हारा |
पूर्ण होय हर काम, जगत में हो उजियारा ||


पन्नों पर प्रकृति के रंग

चैतन्य शर्मा (Chaitanya Sharma) 

कई पेड़ की पत्तियां, तरह तरह के रंग ।
कुदरत तो चैतन्य है, पत्ती कटी पतंग ।

पत्ती कटी पतंग, संग में हुई एकत्रित ।

पेन पेपर हैं दंग, ढंग से कर दे चित्रित ।

ले सुन्दर आकार, मोहता मन रविकर का ।

करता नवल प्रयोग, यहाँ पर नन्हा लड़का ।।

हर उम्र में सबके लिए ज़रूरी है अच्छी नींद (पहली और दूसरी किस्त संयुक्त )

Virendra Kumar Sharma 
पुरसुकून हो नींद जो, रहे देह चैतन्य |
बारह घंटे बाल को, आठ सोइए अन्य |
आठ सोइए अन्य, सोय शिशु सोलह घंटे |
माता को आराम, जरा सा कमते टंटे |
रविकर का आलस्य, दिसंबर मई जून हो |
चौबीस घंटे नींद, रात-दिन पुरसुकून हो ||


रवि-शास्त्री को बना, इस ट्राफी का चीफ |
अर्थ-शास्त्री से मिले, बढ़िया बड़ी रिलीफ |
बढ़िया बड़ी रिलीफ, भतीजा वाद चलेगा |
सोनी धोनी मो'न, मस्त गठबंधन देगा |
यू ए इ ईरान, टीम इटली की आये |
प्यारे नाना जान, जीत तो तू ही पाए  ||

पुत्र-पिता-पति-भ्रातृ, पडोसी प्रियतम पगला-

बदला युग आधुनिक अब, बढ़ा सास-वधु प्यार ।
दस वर्षों का ट्रेंड नव, शेष बहस तकरार ।
शेष बहस तकरार, शक्तियां नारीवादी ।
दी विश्वास-उभार,  मस्त आधी आबादी ।
पुत्र-पिता-पति-भ्रातृ, पडोसी प्रियतम पगला ।
लेगी इन्हें नकार - जमाने भर का बदला ।। 

6 comments:

  1. बढिया लिंक्स
    मुझे स्थान देने के लिए शुक्रिया

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (06-10-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  3. सभी बीस हैं
    उन्नीस नहीं !

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  4. अच्छे लिंक्स
    मुझे भी शामिल करने के लिए
    बहुत बहुत आभार

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  5. श्राद्ध के बहाने पूर्वज याद आ जाते हैं
    साल के कुछ दिन उन्हे हम बुलाते हैं
    श्रद्धा से पुकारा गया हो अगर
    किसी ना किसी रूप में जरूर आते हैं !

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