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Thursday, 4 October 2012

लेता जम के खाय, रात भर पड़ा डकारे -



पुत्र-पिता-पति-पुरुष, पडोसी प्रियतम पगला-


बदला युग आधुनिक अब, सास-बहू में प्यार ।
दस वर्षों का ट्रेंड नव, शेष बहस तकरार ।
शेष बहस तकरार, शक्तियां नारीवादी ।
दी विश्वास-उभार,  व्यस्त आधी आबादी ।
पुत्र-पिता-पति-पुरुष, पडोसी प्रियतम पगला ।
लेगी इन्हें नकार - जमाने भर का बदला ।। 

कुछ रिश्‍ते (4)

सदा  
SADA
सदा सर्वदा सत्य सब, शाश्वत संत सँदेश |
कबहूँ ममतामयी का, मत ठुकरा आदेश |



हम सयाने हो गए !

संतोष त्रिवेदी  
ताके रोशनदान पथ, हो खिड़की इक्स्टेण्ड |
दीदी को लेकर गया, जब उसका हसबैंड |
जब उसका हसबैंड, रंगोली चौरा देहरी |
नहीं रहा संतोष, हुआ जाता वह शहरी |
आज इसी को लोग, कहे हैं उन्नति आके |
कर दरवाजा ओट,  बूढ़ आँखें नित ताके |

हर उम्र में सबके लिए ज़रूरी है अच्छी नींद (पहली और दूसरी किस्त संयुक्त )

Virendra Kumar Sharma 

पुरसुकून हो नींद जो, रहे देह चैतन्य |
बारह घंटे बाल को, आठ सोइए अन्य |
आठ सोइए अन्य, सोय शिशु सोलह घंटे |
माता को आराम, जरा सा कमते टंटे |
रविकर का आलस्य, दिसंबर मई जून हो |
चौबीस घंटे नींद, रात-दिन पुरसुकून हो ||

"बात अन्धश्रद्धा की नहीं है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) 

श्रद्धा सह विश्वास की, सदा जरुरत घोर |
आस्था का यदि मामला, नहीं तर्क का जोर |
नहीं तर्क का जोर, पूर्वज याद कीजिये |
चलो सदा सन्मार्ग, नियम से श्राद्ध कीजिये |
पित्तर कोटि प्रणाम, मिले आशीष तुम्हारा |
पूर्ण होय हर काम, जगत में हो उजियारा ||



पकौडी़

  उल्लूक टाईम्स
रोज जलेबी खा रहा, कर शंका मधुमेह |
 सारे दिन दिखला रहा, मात्र पकौड़ी नेह |
मात्र पकौड़ी नेह, खूब चटकारे मारे |
लेता जम के खाय, रात
भर पड़ा डकारे |
सके न चूरन फांक, पेट हो जाता हैबी  |
बैठा जाके शाख, छोड़ के आज जलेबी ||

 क्वचिदन्यतोSपि... 

सादर श्रद्धांजलि दिया, किया काव्य का पाठ ।
बाबू जी के शुभ वचन, नेताओं के ठाठ ।
नेताओं के ठाठ , सदा से एक सरीखे ।
बारह या सन साठ , नहीं कुछ अंतर दीखे ।
जनता जी हलकान, सदा ही दीखी कादर ।
सुन्दर कविता भाव, नमन रविकर कर सादर ।।

Untitled

Rajesh Kumari 

कलयुग जाने से रहा, फिर भी रविकर साथ ।
सकल शुभेच्छा आपकी , पूर्ण करो हे नाथ ।
पूर्ण करो हे नाथ, हाथ अब पुन:  लगाओ ।
पांच तत्व के साथ, जरा बारूद सटाओ  ।
तन की गर्मी बढ़े, जले वह करके भुग-भुग ।
दुनिया को न खले, बदल जाए यह कलयुग ।।

रवि-शास्त्री को बना, इस ट्राफी का चीफ |
अर्थ-शास्त्री से मिले, बढ़िया बड़ी रिलीफ |
बढ़िया बड़ी रिलीफ, भतीजा वाद चलेगा |
सोनी धोनी मो'न, मस्त गठबंधन देगा |
यू ए इ ईरान, टीम इटली की आये |
प्यारे नाना जान, जीत तो तू ही पाए  ||


कोयले से आजकल हम दांतों को रगड़ते-

अपनी प्रिया को छोड़  के प्रीतम अगर गया |
नन्हा सा कैमरा कहीं चुपके से धर गया ||

आया हमारे मुल्क में   व्यापार के लिए  
सोने की चिड़िया लेके जाने किधर गया ||

रुपये की खनक गूंजती बाज़ार में अभी 
डालर के सामने मगर चेहरा उतर गया ||

दाही दायम दायरा, दुःख दाई दनु दित्य-रविकर

जहर-मोहरा पीस के, लूँ दारू संग घोट ।
 जहर बुझी बातें करें, जब प्राणान्तक चोट । 

जब प्राणान्तक चोट, पोट न तुमको पाया।
रविकर में सब खोट, आज भर पेट अघाया ।


प्रश्न-पत्र सा ध्यान, लगाना व्यर्थ हो रहा ।
अब सांसत में जान, पीसता जहर-मोहरा ।। 

 


पन्नों पर प्रकृति के रंग

चैतन्य शर्मा (Chaitanya Sharma) 

कई पेड़ की पत्तियां, तरह तरह के रंग ।
कुदरत तो चैतन्य है, पत्ती कटी पतंग ।
पत्ती कटी पतंग, संग में हुई एकत्रित ।
पेन पेपर हैं दंग, ढंग से कर दे चित्रित ।
ले सुन्दर आकार, मोहता मन रविकर का ।
करता नवल प्रयोग, यहाँ पर नन्हा लड़का ।।

6 comments:

  1. बेहतरीन प्रस्‍तुति।

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (06-10-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  3. रवि-शास्त्री को बना, इस ट्राफी का चीफ |

    अर्थ-शास्त्री से मिले, बढ़िया बड़ी रिलीफ |

    बढ़िया बड़ी रिलीफ, भतीजा वाद चलेगा |

    सोनी धोनी मो'न, मस्त गठबंधन देगा |


    यू ए इ ईरान, टीम इटली की आये |




    प्यारे नाना जान, जीत तो तू ही पाए ||
    सेविन्थ सिलिंडर कप बेहतरीन रचना है .

    रवि-शास्त्री को बना, इस ट्राफी का चीफ |

    अर्थ-शास्त्री से मिले, बढ़िया बड़ी रिलीफ |

    बढ़िया बड़ी रिलीफ, भतीजा वाद चलेगा |

    सोनी धोनी मो'न, मस्त गठबंधन देगा |


    यू ए इ ईरान, टीम इटली की आये |




    प्यारे नाना जान, जीत तो तू ही पाए ||

    ram ram bhai
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    शुक्रवार, 5 अक्तूबर 2012
    चील की गुजरात यात्रा

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  4. बहुत सुंदर प्रस्तुति!

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