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Wednesday, 13 February 2013

हर दिन तो अंग्रेजियत, मूक फिल्म अविराम-



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बरगद का बूढ़ा पेड़

KAVYA SUDHA (काव्य सुधा)
गदगद बरगद गुदगुदा, हरसाए संसार |
कई शुभेच्छा का वहन, करता निश्छल भार |

करता निश्छल भार, बांटता प्राणवायु नित |
झुकते कंधे जाँय, जिए पर सदा लोक हित |

कैसा मानव स्वार्थ, पार कर जाता हर हद |
इक लोटा जल-ढार, होय बरगद भी गदगद


वेला वेलंटाइनी,  नौ सौ पापड़ बेल ।
वेळी ढूँढी इक बला, बल्ले ठेलम-ठेल । 
Valentine's Day: Bajrang Dal apeals youths not to indulge in indecent acts in public places
बल्ले ठेलम-ठेल, बगीचे दो तन बैठे ।
बजरंगी के नाम, पहरुवे तन-तन ऐंठे।

ढर्रा छींटा-मार, हुवे न कभी दुकेला ।
भंडे खाए खार,  भाड़ते प्यारी वेला ।।





 रोज रोज के चोचले, रोज दिया उस रोज |
रोमांचित विनिमय बदन, लेकिन बाकी डोज |

लेकिन बाकी डोज, छुई उंगलियां परस्पर |
चाकलेट का स्वाद, तृप्त कर जाता अन्तर |

वायदा कारोबार, किन्तु तब हद हो जाती |
ज्यों आलिंगन बद्ध,  टीम बजरंग सताती ||

Photo: मंगलवार, 12 फरवरी 2013

"दोहे-बदल रहे परिवेश" 

सबसे अच्छा विश्व में, अपना भारत देश।
किन्तु यहाँ भी मनचले, बदल रहे परिवेश।१।

कामुकता-अश्लीलता, बढ़ती जग में आज।
इसके ही कारण हुआ, दूषित देश समाज।२।

ढोंग-दिखावा दिवस हैं, पश्चिम के सब वार।
रोज बदलते है जहाँ, सबके ही दिलदार।३।

एक दिवस की प्रतिज्ञा, एक दिवस का प्यार।
एक दिवस का चूमना, पश्चिम के किरदार।४।

प्रतिदिन करते क्यों नहीं, प्रेम-प्रीत-व्यवहार।
एक दिवस के लिए क्यों, चुम्बन का व्यापार।५।

http://uchcharan.blogspot.in/2013/02/blog-post_12.html
बहा बहाने ले गए, आना जाना तेज |
अश्रु-बहाने लग गए, रविकर रखे सहेज |

रविकर रखे सहेज, निशाने चूक रहे हैं |
धुँध-लाया परिदृश्य, शब्द भी मूक रहे हैं |

बेलेन्टाइन आज, मनाने के क्या माने |
बदले हैं अंदाज, गए वे बहा बहाने ||


 

नवगीत,

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया  
 दिग-दिगंत बौराया | मादक  बसंत आया ||
तोते सदा पुकारे |  मैना मन दुत्कारे ||
काली कोयल कूके | लोग होलिका फूंके ||
सरसों पीली फूली | शीत बची मामूली  ||
भौरां मद्धिम गाये  | तितली मन बहलाए ||
भाग्य हमारे जागे | गर्म वस्त्र सब त्यागे || 




 लाली मेरे लाल की, यह इटली सरकार ।
नहीं पचा पाई कुटिल, मामा को धिक्कार । 
मामा को धिक्कार, दुष्ट-त्यागी को खोजो ।
चापर चॉपर करे, पकड़ लो शामिल जो जो ।
करूँ नहीं विश्वास, तेज इसकी बिकवाली ।
हैं चुनाव अब पास, मांगते लोग दलाली ।। 


मकरी अकड़ी माँगती, बन्दर का दिल मीठ |
घात कर रहा दोस्त से, मगरमच्छ वह ढीठ | 

मगरमच्छ वह ढीठ, पीठ पर है बैठाता |
कपि खतरा पहचान, उसे फिर से बहकाता |

किन्तु विदेशी नस्ल, अक्ल मकरी बंटवाये |
मगर-मिनिस्टर नित्य, कलेजा लेकर आये ||

ऋतुराज बसंत


 Rajesh kumari
फूली फूली घूमती, एक माह से शीत |
फूली सरसों तभी से, फैले जग में प्रीत |
फैले जग में प्रीत, मधुर रस पीले पीले |
छाई नई उमंग, जिंदगी जी ले जीले |
पीले पीले फूल, तितलियाँ रस्ता भूली |
भौरें मस्त अनंग, तितलियाँ रति सी फूली ||

वेलेण्टाइन डे: संस्कृति रक्षा का पुनीत प्रतीक्षित 

अवसर
 

हर दिन तो अंग्रेजियत, मूक फिल्म अविराम |
देह-यष्टि मकु उपकरण, काम काम से काम |


काम काम से काम, मदन दन दना घूमता |
करता काम तमाम, मूर्त मद चित्र चूमता |


थैंक्स गॉड वन वीक, मौज मारे दिल छिन-छिन |
चाकलेट से रोज, प्रतिज्ञा हग दे हर दिन ||  

6 comments:

  1. बहुत उम्दा तारीके से प्रतिक्रया दी है आपने इन लिंकों पर !

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  2. वाह रविकर भाई जी क्या दिल की गहराइयों से प्रतिक्रिया स्वरूप कुंडली प्रस्तुत की है हार्दिक बधाई आपको

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  3. व्यापक फलक की सुन्दर प्रस्तुति .

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  4. बहुत बढ़िया चुने हुए लिनक्स

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