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Saturday, 23 February 2013

फटे बम लोग मर जाएँ, भुनायें चीख सारे दल-



"कैसी है ये आवाजाही" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)




बालू शाही है अगर, तो निकलेगा तेल |
आम रेत में क्या धरा, चढ़ टिब्बे पर खेल |
चढ़ टिब्बे पर खेल, खिलाती नौकर-शाही |
मँहगाई की आँच, बड़ी ही दारुण दाही |
लूट रहे हैं धन धान्य, होय हर जगह उगाही |
आम चाटते नमक, ख़ास की बालूशाही  ||


लगा ले मीडिया अटकल, बढ़े टी आर पी चैनल ।
 जरा आतंक फैलाओ, दिखाओ तो तनिक छल बल ।।

फटे बम लोग मर जाएँ, भुनायें चीख सारे दल ।
धमाके की खबर तो थी, कहे दिल्ली बताया कल ॥

 हुआ है खून सादा जब, नहीं कोई दिखे खटमल ।
घुटाले रोज हो जाते, मिले कोई नहीं जिंदल ।।

कहीं दोषी बचें ना छल, अगर सत्ता करे बल-बल ।
नहीं आश्वस्त हो जाना, नहीं होनी कहीं हलचल ॥ 

जवानी धर्म से भटके, हुआ वह शर्तिया "भटकल" ।
मरे जब लोग मेले में, उड़ाओ रेल मत नक्सल||

न इर्द-गिर्द तांकिये, अपने गिरेवाँ में झाँकिये !

पी.सी.गोदियाल "परचेत" 
मासूमों के खून से, लिखते नई किताब |
पड़े लोथड़े माँस के, खाते पका कबाब |
खाते पका कबाब, पाक की कारस्तानी |
जब तक हाफिज साब, कहेंगे हिन्दुस्तानी |
तब तक सहना जुल्म, मरेंगे यूं ही भोले |
सत्ता तो है मस्त, घुटाले कर कर डोले |||

ख्वाब


सुमन कपूर 'मीत' 

वाह वाह क्या बात है, कुछ सपने रंगीन । 
देखेंगे ये नयन भी, होकर के लवलीन । 
होकर के लवलीन, सखी पर बात बताना । 
इतना बढ़िया कथ्य, शिल्प सुन्दर कह जाना । 
आया कैसे भाव, अभी तो सु-प्रभात है । 
इन्तजार आनंद, बड़ी ही मधुर बात है  । । 


पिलपिलाया गूदा है । 
छी बड़ा बेहूदा  है । । 

मर रही पब्लिक तो क्या -
आँख दोनों मूँदा है ॥ 

जा कफ़न ले आ पुरकस 
इक फिदाइन कूदा है । |

कल गुरू को मूँदा था 
आज चेलों ने रूँदा है ॥

पाक में करता अनशन-
मुल्क भेजा फालूदा है ॥


कुण्डलिया छंद



 अरुण जी की कुंडली 
 अनगढ़ मिट्टी पा रही , शनै: - शनै: आकार
दायीं  -  बायीं  तर्जनी  ,  देती  उसे  निखार
देती  उसे  निखार , मध्यमा संग कनिष्का
अनामिका  अंगुष्ठ , नाम छोड़ूँ मैं किसका

मिलकर  रहे सँवार , रहे ना कोई घट - बढ़
शनै: - शनै: आकार , पा रही मिट्टी अनगढ़ ||
रविकर की टिप्पणी 
भगदड़ दुनिया में दिखे, समय चाक चल तेज |
कुम्भकार की हड़बड़ी, कृति अनगढ़ दे भेज |

कृति अनगढ़ दे भेज, बराबर नहीं अंगुलियाँ |
दिल दिमाग में भेद, मसलते नाजुक कलियाँ |

ठीक करा ले चाक, हटा मिटटी की गड़बड़ |
जल नभ पावक वायु, मचा ना पावें भगदड़ || 

"ओ बी ओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक-23

सुंदरी सवैया 
बलुई कलकी ललकी पिलकी जल-ओढ़ सजी लटरा मुलतानी ।
मकु शुष्क मिले कुछ गील सने तल कीचड़ पर्वत धुर पठरानी ।
कुल जीव बने सिर धूल चढ़े, शुभ *पीठ तजे, मनुवा मनमानी ।
मटियावत नीति मिटावत मीत, हुआ *मटिया नहिं पावत पानी ||
*देवस्थान / आसन                       *लाश
Virendra Kumar Sharma 
 लोग मरते तो हैं । 
जख्म भरते तो हैं ॥ 

बम फटे हैं बेशक -
एलर्ट करते तो हों । 

पब्लिक परेशां लगती 
कष्ट हरते तो हैं ॥ 

 देते गीदड़ भभकी 
दुश्मन डरते तो हैं ।

मैं आप की पोस्ट नही पढ़ पाया ???


Ashok Saluja  
शल्य-क्रिया हो आँख पर, चश्मा काला मोर । 
पढ़ने से करता  मना, किन्तु जोश पुरजोर । 
किन्तु जोश पुरजोर, दिवस दस और लगेंगे । 
रहूँ ब्लाग से दूर, नैन कुछ और ठगेंगे । 
रविकर भी बेचैन, ठीक यह देंह जिया हो । 
करिए कुछ आराम, सफल यह शल्य क्रिया हो ॥ 



5 comments:

  1. सुन्दर प्रस्तुति!
    आभार!
    --
    बालूशाही खा रहे, कारा में गद्दार।
    शायद इनसे हैं मिले, कुछ कौमी मक्कार।।

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  2. वाह! ये भटकल वाली रचना मुझे बहुत अच्छी लगी. माँ बाप ने नाम ही जिसका भटकल रखा हो , उसे तो भटकना ही, धर्म से, देश से और सबसे बढ़कर मानवता से . बधाई आपको.
    सादर
    नीरज 'नीर'

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  3. बेहतरीन प्रस्तुति.

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  4. आतंकवाद से बहुत से लोगों के आर्थिक और राजनैतिक उददेश्य पूरे होते हैं और हो रहे हैं। आतंकी आतंक न भी करें तो भी उनके नाम से ये दल करते रहेंगे।
    आतंकवादी घटनाओं के बाद किसी विशेष राजनीतिक पार्टी के लिए वोटों का ध्रुवीकरण भी होता है। आतंकवादी घटनाएं कांग्रेस को विफल साबित करती हैं और केन्द्र में दूसरे दल के आने के लिए रास्ता हमवार करती हैं। दूसरे दल के केन्द्र में आने के लिए रास्ता धर्म विशेष के लोग क्यों हमवार करेंगे ?

    ♥ अपना रास्ता हमवार करने के लिए यहां कोई कुछ भी कर सकता है क्योंकि प्यार और जंग में सब कुछ किया ही जाता है।

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  5. आभार रविकर जी , व्यस्तता की वजह से मूवमेंट सीमित थी इसलिए इधर आना कम ही हुआ।

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