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Wednesday, 20 February 2013

सह सकती कृति ठेस, किन्तु गुम सिट्टी-पिट्टी -


जल नभ पावक वायु, मचा ना पावें भगदड़-


"ओ बी ओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक-23

 मिट्टी सोखे  नियत जल, रौंधे रोज कुम्हार |
चढ़ा चाक पर नित्य ही, दे सुडौल आकार |
दे सुडौल आकार, धूप में उसे सुखा दे |
पावक गगन समीर, बड़ा मजबूत बना दे  |
सह सकती कृति ठेस, किन्तु गुम सिट्टी-पिट्टी  ||
टुकड़े टुकड़े अंश, पञ्च तत्व मिट्टी मिट्टी ||
 नई व्यवस्था दृढ़ दिखी, होय कलेजा चाक |
करे चाक-चौबंद जब, कैसे लेता ताक |
कैसे लेता ताक, ताक में लेकिन हरदम |
लख सालों की धाक, देह का घटता दमखम |
सब कुम्हार का दोष, शिथिल से अस्थि-आस्था |
मिटटी के प्रतिकूल, चाक की नई व्यवस्था ||
भगदड़ दुनिया में दिखे, समय चाक चल तेज |
कुम्भकार की हड़बड़ी, कृति अनगढ़ दे भेज |
कृति अनगढ़ दे भेज, बराबर नहीं अंगुलियाँ |
दिल दिमाग में भेद, मसलते नाजुक कलियाँ |
ठीक करा ले चाक, हटा मिटटी की गड़बड़ |
जल नभ पावक वायु, मचा ना पावें भगदड़ ||






आइन्दा से  रखूंगा, क्लीन शेव ही मित्र । 
जीवन में कुछ ना किया, केवल मूंछ विचित्र । 
केवल मूंछ विचित्र, मुलाजिम इक सरकारी । 
दो बंगले हैं पाश, पास में कार सफारी । 
रक्खे कई करोड़, आज हूँ मैं शर्मिन्दा । 
दाढ़ी मूंछ मुड़ाय, रखूं ना अब आइन्दा ॥ 

 

(दिगम्बर नासवा)

 स्वप्न मेरे...........
उधर सिधारी स्वर्ग तू, इधर बचपना टाँय |
टाँय टाँय फ़िस बचपना, हरता कौन बलाय | 


हरता कौन बलाय, भूल जाता हूँ रोना |
ना होता नाराज, नहीं बैठूं  उस कोना |


एक साथ दो मौत, बचपना सह महतारी |
करना था संकेत, जरा जब उधर सिधारी ||

सकल देह जलजाय, अजब प्रेमी वैरागी-

 1
रागी है यह मन मिरा, तिरा बिना पतवार |
इत-उत भटके सिरफिरा, देता बुद्धि नकार |
देता बुद्धि नकार, स्वार्थी सोलह आने |
करे झूठ स्वीकार, बनाए बड़े बहाने |
विरह-अग्नि दहकाय, लगन प्रियतम से लागी |
सकल देह जलजाय, अजब प्रेमी वैरागी ||

 2
  तेरी मुरली चैन से, रोते हैं इत नैन । 
विरह अग्नि रह रह हरे, *हहर हिया हत चैन । 
*हहर हिया हत चैन, निकसते बैन अटपटे । 
बीते ना यह रैन, जरा सी आहट खटके । 
दे मुरली तू भेज, सेज पर सोये मेरी । 
सकूँ तड़पते देख, याद में रविकर तेरी ॥ 
*थर्राहट

लीजिये पढ़िये मेरी पहली ब्लॉग बुलेटिन


तुषार राज रस्तोगी 

ट्रिन ट्रिन बुलेटिन कर रहा, जागे ब्लॉगर मित्र |
अब तुषार कणिका करे, तन मन तृप्त विचित्र ||
 

Ankur Jain 

 नहीं प्रतारक प्रेम सा, नहीं प्रताड़क अन्य |
पर्जन्या दे देह पर, नयनों में पर्जन्य |


नयनों में पर्जन्य, काटता रहा पतंगें |
बुरा सदा अंजाम, करे मानव-मन नंगे |


कुछ घड़ियों की मौज, प्रेम दारुण संहारक |
बिना शस्त्र मर जाय, मौत पर हँसे प्रतारक ||

प्रतारक=ठग
प्रताड़क=कष्ट देने वाला
पर्जन्या=दारुहल्दी
पर्जन्य=बादल 


सर्ग-2 
भाग-3
  भाग-3
कन्या का नामकरण
कौशल्या दशरथ कहें, रुको और महराज |
अंगराज रानी सहित, ज्यों चलते रथ साज ||

 
राज काज का हो रहा, मित्र बड़ा नुक्सान |
चलने की आज्ञा मिले,  राजन  हमें  विहान ||

 
सुबह सुबह दो पालकी, दशरथ की तैयार |
अंगराज रथ पर हुए, मय परिवार सवार ||

 
दशरथ विनती कर कहें, देते एक सुझाव |
सरयू में तैयार है,  बड़ी राजसी नाव ||

" हलवा है क्या ..........."


Amit Srivastava 





हलवाई रविकर बना, व्यंजन कई प्रकार |
चखे चखाए मित्र को, आजा तो इक बार |
आजा तो इक बार, बड़ी वासंतिक रुत है |
खा मीठा नमकीन, अगर हड़बड़ी बहुत है |
सूजी घी में भून, सुगर मेवा दूँ डलवा |
संग चाय नमकीन, पौष्टिक खा लो हलवा ||


काटे कागद कोर ने, कवि के कितने अंग । 
कविता कर कर कवि भरे, कोरे कागज़ रंग । 

कोरे कागज़ रंग, रोज ही लगे खरोंचे । 
दिल दिमाग बदहाल, याद बामांगी नोचे । 

रविकर दायाँ हाथ, एक दिन गम जब बांटे । 
जीवन रेखा छोट, कोर कागज़ की काटे ।। 
"न्याय-कैमुतिक" उक्ति का, सीधा सरल सँदेश |
बड़ा कार्य जब सिद्ध हो, छोटे पर क्या क्लेश |
छोटे पर क्या क्लेश, सुनो उपदेश सरल सा |
करे वंचिका ऐश, देहा को हुलसा हरसा |
प्रेम युद्ध जा जीत, जीत कर आप वैयक्तिक |
खुलने दे कुल पोल, अभी तो न्याय-कैमुतिक ||


अब नहीं लिखे जाते हैं गीत

बुद्धि विकल काया सचल, आस ढूँढ़ता  पास |
मृत्यु क्षुधा-मैथुन सरिस, गुमते होश हवास |


गुमते होश हवास, नाश कर जाय विकलता |
किन्तु नहीं एहसास, हाथ मन मानव मलता |


महंगा है बाजार, मिले हर्जाना मरकर |
धन्य धन्य सरकार, मरे मेले में रविकर ||

25 मार्च की दोपहर से 26 मार्च की दोपहर तक जयपुर राजस्थान में हूँ- 
 सूत्र : 08521396185 
ब्लॉगर मित्रों से मिलना चाहता हूँ-रविकर

8 comments:

  1. बहुत ही अच्‍छे लिंक्‍स संयोजित किये हैं आपने ... आभार

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  2. कुम्हार के कर कोरे मटके चाक बनाए ।
    राखे ते जल बहोरे पटके ते बिसराए ॥


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  3. बहुत सुन्दर पठनीय लिंक !!

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    इससे ब्लॉगरों को टिप्पणियाँ मिलने में मदद मिलेगी!

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  5. आइन्दा से रखूंगा, क्लीन शेव ही मित्र ।
    जीवन में कुछ ना किया, केवल मूंछ विचित्र ।
    केवल मूंछ विचित्र, मुलाजिम इक सरकारी ।
    दो बंगले हैं पाश, पास में कार सफारी ।
    रक्खे कई करोड़, आज हूँ मैं शर्मिन्दा ।
    दाढ़ी मूंछ मुड़ाय, रखूं ना अब आइन्दा ॥ बहुत बढ़िया,,,रविकर जी ,,,बधाई

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  6. भगदड़ दुनिया में दिखे, समय चाक चल तेज |
    कुम्भकार की हड़बड़ी, कृति अनगढ़ दे भेज |
    कृति अनगढ़ दे भेज, बराबर नहीं अंगुलियाँ |
    दिल दिमाग में भेद, मसलते नाजुक कलियाँ |
    ठीक करा ले चाक, हटा मिटटी की गड़बड़ |
    जल नभ पावक वायु, मचा ना पावें भगदड़ ||


    बहुत बढ़िया रचना पढ़ वाई है आपने .बहुत खूब .शुक्रिया आपकी टिपण्णी का .

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  7. आदरणीय गुरुदेव श्री बेहतरीन प्रस्तुति एक से बढ़कर एक कुण्डलिया, ऐसी ही सुन्दर रचनाएँ पढ़वाते रहें हार्दिक बधाई इस शानदार लाजवाब प्रस्तुति हेतु.

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  8. स्वप्न मेरे...........
    उधर सिधारी स्वर्ग तू, इधर बचपना टाँय |
    टाँय टाँय फ़िस बचपना, हरता कौन बलाय |

    हरता कौन बलाय, भूल जाता हूँ रोना |
    ना होता नाराज, नहीं बैठूं उस कोना |

    एक साथ दो मौत, बचपना सह महतारी |
    करना था संकेत, जरा जब उधर सिधारी ||

    मन की अनुकृति जस की तस उतार दी है नास -वा साहब के .

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