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Friday, 1 February 2013

पत्नी चेक पा जाय, तुरत मैके जा बसती-




फिल्म इत्ती ही बची है




सबके अपने संगठन, हलवाई हज्जाम |
नौकर अफसर जातिगत, धर्म कर्मगत नाम |
धर्म कर्मगत नाम,  करें दंगा आन्दोलन |
दिखे फिल्म में बुरा, करें पिक्चर में गंजन |
डाकू नेता चोर, लुटेरे भी जागे हैं |
प्रोड्यूसर जा जाग, बुरे दिन ही आगे हैं |
 
फेसबुक में जहाँ एक तरफ़ स्वस्थ और तार्किक बहस चलती है,वहीँ दूसरी ओर कुछ लोग अपने-अपने धर्म और वाद की धूनी रमा लेते हैं.इन कट्टरपंथियों में हिन्दू और मुस्लिम भी हैं,नारीवादी व दलित-चिन्तक भी.
अगर अपने कभी इनके खेमे के खिलाफ कोई बात कही,तर्क दिया,तो आपकी खैर नहीं.टिप्पणी यदि अशालीन हो य सन्दर्भ से परे हो तो हटाई जा सकती है पर केवल किसी की मान्यताओं या अंध-भक्ति के विरुद्ध कुछ कहा जाय तो आप ब्लॉक किये जा सकते हैं.
बाजारू माहौल है, सड़ा-गला सब बेंच |
बेन्च-मार्क होवे अगर, फिर काहे का पेंच |

फिर काहे का पेंच, दुकाने ऊँची ऊँची |
काट खटाखट पेस्ट, मिले ना कहीं समूची |

बेचारा इन्सान, कहाँ पर करे तकाजा |
नाम हिन्दु इस्लाम, बजाये मारू बाजा ||

  शहीदों की याद में,


धीरेन्द्र सिंह भदौरिया 


 इधर पड़ा धड़ तर-बतरसिर उत ठोकर खाय ।
फौजी को क्या चाहिए, मरकर तो  तर जाए ।

मरकर तो तर जाए , करे तर माँ का मुखड़ा ।
बेहतर सत्ता तरक, तौलता धन से दुखड़ा ।

पत्नी चेक पा जाय, तुरत मैके जा बसती ।
इत बूढ़े माँ बाप, मौत इस ओर विहँसती ।

 

"सुहाना लगता है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) 

गुरुवर रचते रहे हैं, तरह तरह के गीत |
आज मूड कुछ अलग है, लगे सुहाना मीत |

My Image Kajal Kumar

बत्तीसी सचमुच गली, इडली डोसा खाय |
गली गली में आ-ग-ले, बेंचे बड़े बनाय |
बेंचे बड़े बनाय, नमक मिर्ची भी डालो |
हथ-गोले सी शक्ल, चलो आसमाँ उठा लो |
पकड़ो पूरी प्लेट, स्वाद लो रत्ती-रत्ती  |
मरे धूर्त कै-मरा, हुई गुल थियेटर बत्ती ||



देश छोड़कर भागता ,यह अदना इन्सान |
सीन हटाने के लिए , कैसे जाता मान |
कैसे जाता मान, सोच में यह परिवर्तन |
डाला जोर दबाव, करे या फिर से मंथन |
रविकर यह कापुरुष, करे समझौता भारी |
बदले अपनी सोच, ख़तम इसकी हुशियारी |



 उल्लूक टाईम्स 

 गाँधी -नेहरु मस्त कुल, लाल पाल धर बाल ।
भगत सिंह आजाद भी, रानी झाँसी लाल ।
 रानी झाँसी लाल, स्वर्गवासी हैं सारे ।
करें वहां पर मौज, यहाँ क्यूँ मित्र पधारें 
 तूफानों से लाय, यहाँ जो कश्ती बाँधी 
भटके बिन पतवार, डुबा दो रविकर गाँधी ।।

मैं जिन्दगी का साथ निभाता चला गया !


पी.सी.गोदियाल "परचेत"  


सारी गलियां बंद हैं, सब कातिक में खेत  |
काशी के भैरव विवश, गायब शिव-अनिकेत |
गायब शिव-अनिकेत, चलो बैठकी जमायें |
रविकर ना परचेत, दिखें हैं दायें-बाएं |
जय बाबा की बोल, ढारता पारी पारी |
करके बोतल ख़त्म, कहूँगा आइ'म सॉरी ||

11 comments:

  1. गायब शिव-अनिकेत, चलो बैठकी जमायें |
    रविकर ना परचेत, दिखें हैं दायें-बाएं |

    हा-हा-हा-हा दिल बहलाने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है :)

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  2. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति

    आभार

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  3. बेहतरीन तंज .


    पत्नी चेक पा जाय, तुरत मैके जा बसती-



    फिल्म इत्ती ही बची है

    Cartoon, Hindi Cartoon, Indian Cartoon, Cartoon on Indian Politcs: BAMULAHIJA



    सबके अपने संगठन, हलवाई हज्जाम |
    नौकर अफसर जातिगत, धर्म कर्मगत नाम |
    धर्म कर्मगत नाम, करें दंगा आन्दोलन |
    दिखे फिल्म में बुरा, करें पिक्चर में गंजन |
    डाकू नेता चोर, लुटेरे भी जागे हैं |
    प्रोड्यूसर जा जाग, बुरे दिन ही आगे हैं |

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  4. शानदार,बहुत अच्छी प्रस्तुति,,,रचना को साकार करती सुंदर टिप्पणियाँ,,,आभार रविकर जी,,,,

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  5. सार्थक प्रस्तुति रविकर जी ,हमेशा की तरह

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  6. बहुत सुंदर !
    आभार के साथ !

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  7. सुन्दर सुन्दर लिंक बधाई

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  8. अतिसुन्दर,सुन्दर लिक समायोजन के लिए सादर आभार।आज के कार्टून भी सार्थक हैं।

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