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Friday, 15 February 2013

पर ज्यादा उन्माद, सुबह कर कृष्णा-वन्दन-



सेहतनामा

Virendra Kumar Sharma 
 गठिया लो यह बात सब, हितकारी संगीत |
संधि-योग सा कम करे, दर्द उग्रता मीत |
 
दर्द उग्रता मीत , पहाड़ो पर बस जाओ |
बदन छरहरा आप, वहाँ सचमुच में पाओ |
 
पौष्टिक भोजन खाय, गर्भ को स्वयं संभालो |
गठिया में व्यायाम, बात यह भी गठिया लो ||

जिनकी चाकरी नहीं पक्की -

ठीका पर बहाल करते हैं।
गाँधी को निहाल करते हैं ।।
मनरेगा-हाथ में ठेंगा 
 करते ठीक-ठाक आमदनी -
 मिहनत बेमिसाल करते हैं ।।

 25 वर्षों का सफ़र एक स्वप्न-सा
vandana gupta 
चलते ही रहना सखी, चखते हर्ष-विषाद ।
जीवन में अवसाद है, पर ज्यादा उन्माद ।

पर ज्यादा उन्माद, सुबह कर कृष्णा-वन्दन ।
भली बुरी कर याद, जख्म फूलों का क्रंदन ।

यही छाँव शुभ धूप, रहे हैं सकल निकलते ।
शुभकामना अनूप, चलो मिल रहो मचलते ।।

शौक से दुनिया दलाली खा रही-

पाप का भर के घडा ले हाथ पर,
पार्टी निश्चय टिकट दे हाथ पर।।

शौक से दुनिया दलाली खा रही- 
हाथ धर कर बैठ मत यूं हाथ पर । ।

जब धरा पे है बची बंजर जमीं--
बीज सरसों का उगा ले हाथ पर ।।

हाथ पत्थर के तले जो दब गया, 
हाथ जोड़ो पैर हाथों हाथ पर 
गमन अनुगमन मन सुमन, मनसाता मनसेधु |
सुम-सुमनामुख सुमिरते, मिले पुन्य मकु मेधु ||

ताऊ और ताई का वेलेंटाईन डे....  

सेना भी पीछे हटे, डटे डेट पर जान |
ताऊ ताई जान इक, ताई बड़ी महान |


ताई बड़ी महान, पकड़ती हैं चिमटे से |
करती छटपट जान, देह दो भाग बटे से |


लेकिन ताऊ ठान, रहे दे उनको ठेना |
ठना-ठनी घनघोर, पिटे सीधे सक्सेना ||
 SADA
 आती बास लिबास से, अथवा खुश्बू तेज ।
रखती नहीं लगाव यह, क्यूँकर रखे सहेज ।

क्यूँकर रखे सहेज, भेजिए लानत तन पर ।
काम क्रोध मद मोह, रहा ढो कब से रविकर ।

समझे रूह दुरूह, दिया-बाती  बुझ जाती ।
दिया लिया सब शून्य, बदल के कपड़े आती ।।

महामहिम का भी नाम हेलीकाप्टर घोटाले में आया


रणधीर सिंह सुमन 


निगरानी कोई नहीं,  सोई सी सरकार ।
कर्म छिनाला हो रहा, इक दलाल दरकार ।
इक दलाल दरकार, करोड़ों हैं गरीब पर ।
कर करोड़पति डील, रोज ही करें कलम सर ।
 रही हाथ में खेल, खिला जिंदल अम्बानी ।
लेते माल बटोर, घूर की हो निगरानी ।।


मेवा खा के पाक का, वाणी-कृष्णा-लाल |
ठोके कील शकील नित, वक्ता करे हलाल  |

वक्ता करे हलाल, कमाई की कमाल की |
मनमोहन ले पाल, ढाल यह शत्रु-चाल की |

लेकिन पाकिस्तान, हिन्दु का करे कलेवा |
खावो कम्बल ओढ़, मियाँ सेवा का मेवा ||

बेलेन्टाइन पर हुआ, बेलन बेला छूछ |
डाक्टर साहब ऐंठते, अपनी छूछी मूँछ |
अपनी छूछी मूँछ, आज मैडम ना ऐंठी |
रोज रोज की बात, प्रतीक्षा करती बैठी |
लेकिन मित्र दराल,  कृष्ण नहिं अस्त्र उठाये |
ऊँच नीच गर होय, वहीँ चिमटा ले धाये ||


  Flower

Rajendra Kumar  


मिटटी डालो भूल पर, मेहनत हुई वसूल ।

हाथों पर सरसों जमे, खिलें धूल के फूल ।


खिलें धूल के फूल, मूल में प्यार निहित है ।

  रविकर सत्य उसूल, जगत को सर्वविदित है ।
नजर नहीं लग जाय, करो स्वारथ की छुट्टी ।
सुआरथ हो ही जाय, बदन की अपनी मिटटी ।।

कविता

दिलबाग विर्क 
 म्हारा हरियाणा
तड़पाती तकलीफ तो, तड़-पड़ पाती चैन |
दिल बाग़ बाग़ है पर इधर,  तड़प तड़प कुल रैन |
तड़प तड़प कुल रैन, मान लो मिल ही जाती |
लड़ा लड़ा दो नैन, रैन यह देह थकाती  |
हट जाता फिर ख्याल, याद भी आ ना पाती |
इसीलिए खुशहाल, रहूँ जब तू तडपाती ||

नारी खड़ी बाज़ार में -बेच रही है देह !


शालिनी कौशिक 


नेह देह प्रोडक्ट को, कांस्टेंट इक मान ।
नेह घटे घटती रहे, बड़े देह धन-मान ।
बड़े देह धन-मान, कहाँ कल्पना हमारी ।
पूनम का वह चाँद, ग्रहण से होती हारी ।
लेकिन अघ-व्यापार, जरूरत विज्ञापन की ।
गिरते नैतिक मूल्य, मांग बढ जाए तन की ।

9 comments:

  1. बढ़िया लिंक्स रविकर जी | पढ़कर आनंद आ रहा है |

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  2. बढ़िया लिंक्स रविकर जी |

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  3. .सुन्दर लिनक्स संजोये हैं आपने.मेरी पोस्ट को ये सम्मान देने के लिए आभार नारी खड़ी बाज़ार में -बेच रही है देह ! संवैधानिक मर्यादा का पालन करें कैग

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  4. रविकर के निराले अंदाज का आनंद ही कुछ और है !

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  5. बहुत खूब सूरत ,मुख्तलिफ अंदाज़ .शुक्रिया आपकी टिप्पणियों का .

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  6. बढ़िया कुंडलियाँ और लाजवाब लिंक्स | आभार | आको बसंत पंचमी की हार्दिक बधाई |

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  7. वाह ...रविकर जी ..मेरे ब्लॉग पर आने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया ..और मेरे रचना को स्थान देने के लिए तहे दिल से आभार ....

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