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Saturday, 19 January 2013

अमर सिंह राठौर का, मिले शर्तिया शीश-




हमें वक्तव्य नहीं चार सिर चाहिए .

Virendra Kumar Sharma 
 अमर सिंह राठौर का, मिले शर्तिया शीश |
सुनो भतीजे रामसिंह, चाची को है रीस |

चाची को है रीस, बिना सिर की यह काया |
जाने पापी कौन, आज हमको बहकाया |

जो भी जिम्मेदार, काट उसका सिर लाओ |
नहीं मिले *मकु ठौर, नहीं राठौर कहाओ ||

*कदाचित


नरेन्द्र मोदी के लिए एक कविता अलबेला खत्री के दिल से ...............

AlbelaKhatri.com 

बेलाग बोध बेलौस बल, ब्यौरा शपथ सटीक |
मोठस मोटा-भाय का, मंसूबा मन नीक ||


घोंघा

देवेन्द्र पाण्डेय 

सीमांकन क्यूँ ना किया, समय बिताता प्रौढ़ |
यत्र-तत्र घुसपैठ कर, कवच-सुरक्षा ओढ़ |
कवच-सुरक्षा ओढ़, चढ़ा है रंग बसंती |
वय हो जाती गौण, रचूँ मैं एक तुरंती |
यह है सुख का मूल, चला चल धीमा धीमा |
घोंघा बने उसूल, चैन की फिर क्या सीमा  ??

चढ़ा गुलाबी रंग, देख जयपुर *सरमाया-

गज-गति लख *गज्जूह की, हाथी भरे सफ़ेद ।
 बजट परे चिंतन करें, बना गजट में छेद ।
बना गजट में छेद, एक ही फोटो छाया ।
चढ़ा गुलाबी रंग, देख जयपुर *सरमाया । 
रविकर तो शरमाय, पहिर साड़ी यह नौ गज ।
कोने रहे लुकाय, सदी के सारे दिग्गज ।। 


Bamulahija dot Com 



 हुल्लड़ होता है हटकु, *हालाहली हलोर ।
हुई सुमाता खुश बहुत, कब से रही अगोर ।

कब से रही अगोर, हुआ बबलू अब लायक ।
हर्षित दिग्गी-द्रोण, सौंप के सारे ^शायक ।
नीति नियम कुल सीख, करेगा अब ना फाउल ।
सब विधि लायक दीख, आह! दुनिया को राहुल ।।
*दारू ^तीर
 

दोहा +
मूर्धन्य-दुर्लभ सुलभ, सजती विषद लकीर ।
कर्ण-प्रिये अनुनासिका, वर्णित वर्ण-*शरीर ।
आकर्षित नित करे कसावट ।
जन गण मन अनुभूति तरावट ।।

धागा प्रेम का


Rajendra Kumar 

डाले क्यूँ जीवंत चित्र, विचलित हो मन मोर |
कौन रुलाया है इसे, कहाँ गया चित-चोर |
कहाँ गया चित-चोर, आज हो उसकी पेशी |
होने को है भोर, देर कर देता वेशी |
रविकर कारण ढूँढ़, तनिक चुप हो जा बाले |
मत कर आँखें लाल, नजर इक प्यारी डाले ||
 SADA
हलधर मोहन से बड़े, लेकिन हैं चुपचाप |
अर्जुन का चुप *चाप है, दु:शासन संताप |


दु:शासन संताप, कर्ण पर जूँ नहिं रेंगे |
रेगा होते कर्म, दिखाए सत्ता ठेंगे |


सदा सदा गंभीर, विषय ले आये रविकर |
हल *हलका हलकान, मस्त हाकिम है हल धर ||


माँ का क़र्ज़ कैसे उतार सकता है कोई ? Qarz

  • DR. ANWER JAMAL
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    माता ऐसे पूत को, कर देना तू माफ़ |
    तेरा पोत करेगा, जल्दी ही इन्साफ |


    जल्दी ही इन्साफ, करो स्पांसर पोता |
    कर हिसाब कुल साफ़, पूत को छोडो रोता |


    रक्त दूध सुख नींद, सुरक्षा शिक्षा पाता |
    संस्कार को भूल, सताता फिर ना माता ||

    भाषा इन गूंगो की -सतीश सक्सेना


    सतीश सक्सेना 


    कथा मार्मिक मातु की, करे मार्मिक प्रश्न |
    लेकिन हमको क्या पड़ी, जगत मनाये जश्न |
    जगत मनाये जश्न, सोच उनकी आकाशी |
    करते बंटाधार, चाल है सत्यानाशी |
    मारक होती माय, किन्तु बस में नहिं उसके |
    थी भोजन में व्यस्त, कुचल के पशुता खिसके |


    5 comments:

    1. बहुत ही अच्‍छे लिंक्‍स ...
      आभार आपका चयन एवं प्रस्‍तुति के लिये

      सादर

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    2. बहुत बढ़िया लिंक्स लेकर सुन्दर प्रस्तुति ....

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    3. बहुत खुबसूरत लिक संयोजन,सटीक टिप्पणियों के बधाई,,,

      recent post : बस्तर-बाला,,,

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    4. बेहतरीन लींको के सुन्दर एव सार्थक प्रस्तुती। पोस्ट चयन के लिए आभार।

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