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Thursday, 10 January 2013

नारी नहिं गलनीय, नहीं वह मीठ बताशा


जस्टिस वर्मा को मिले, भाँति-भाँति के मेल । 
रेपिस्टों की सजा पर, दी दादी भी ठेल ।  

दी दादी भी ठेल, कत्तई मत अजमाना ।
 सही सजा है किन्तु, जमाना मारे ताना ।


जो भी औरत मर्द, रेप सम करे अधर्मा ।  
 चेंज करा के सेक्स, सजा दो जस्टिस वर्मा ।।

मर्यादा का ले नाम मत अपना पल्ला झाड़ पुरुष !

डॉ शिखा कौशिक ''नूतन '' 

पुत्रों पर दिखला रहीं, माताएं जब लाड़ |
पुत्री पर प्रतिबन्ध से, करती क्यों खिलवाड़ |
करती क्यों खिलवाड़, हमें है सोच बदलनी |
भेदभाव यह छोड़, पुत्र सम पुत्री करनी |
होकर के गंभीर, ध्यान देना है मित्रों |
अपनी चाल सुधार, बाप बनना है पुत्रों |


 SADA 
सत्य सर्वथा तथ्य यह, रोज रोज की मौत |
जीवन को करती कठिन, बेमतलब में न्यौत |
बेमतलब में न्यौत , एक दिन तो आना है |
फिर इसका क्या खौफ, निर्भया मुस्काना है |
कर के जग चैतन्य, सिखा के जीवन-अर्था |
मरने से नहीं डरे, कहे वह सत्य सर्वथा ||

पुरुषों से दोस्ती करें अथवा ना करें ?

ZEAL 
 ZEAL

आशा मिलती राम में, नर नारी संजोग |
आये आसाराम से, जाने कितने लोग |
जाने कितने लोग, भोग की गलत व्याख्या |
नित आडम्बर ढोंग, बड़ी भारी है संख्या |
नारी नहिं गलनीय, नहीं वह मीठ बताशा |
सुता सृष्टि माँ बहन, सदा दुनिया की आशा ||

पैमाने में भरकर अलसाये दर्द को, इस तरह न छलकाया करो...


पी.सी.गोदियाल "परचेत"  


अंतर्मन में ऐक्य है, तनातनी तन माय |
प्यारी सी यह गजल दे, फिर से आग लगाय |
फिर से आग लगाय, बुलाना नहीं गवारा |
रहा खुद-ब-खुद धाय, छोड़ के धंधा सारा |
आँखों में इनकार, मगर सुरसुरी बदन में |
रविकर कर बर्दाश्त, आज जो अंतर्मन में ||


Virendra Kumar Sharma 
स्वाद अगर अवसाद दे, करिए उसको बाद |
छोड़ हटो मिष्ठान का, यह दारुण उन्माद |
यह दारुण उन्माद, खाद्य से इसे हटाओ |
भाँति-भाँति के रोग, देह से दूर भगाओ |
तली-भुनी नमकीन, घटाओ जरा मसाला |
रहो कार्य में लीन, देख कर गटक निवाला ||

भारतीय ख़ुफ़िया तंत्र क्यों बार बार विफल हो जाता है !!

  (पूरण खंडेलवाल) 
सीमा पर उत्पात हो, शत्रु देश का हाथ ।
फेल खूफिया तंत्र है, कटते सैनिक माथ ।
कटते सैनिक माथ, रहे पर सत्ता सोई ।
रचि राखा जो राम,  वही दुर्घटना होई ।
इत नक्सल आतंक, पुलिस का करती कीमा ।
पेट फाड़ बम प्लांट, पार करते अब सीमा ।। 

भावनाओं से भरी गगरी(घड़ा) - आकाश कुमार


आकाश सिंह


शब्दों से आक्रोश को, व्यक्त करे आकाश ।
देश रसातल में धंसे, देख लाल की लाश ।
देख लाल की लाश, अनर्गल बकती सत्ता ।
लेकिन पाकी फांस, घुसे हरदम अलबत्ता ।
इत नक्सल दुर्दांत, उधर आतंकी पोसे ।
करिए अब तो क्रान्ति, भावना से शब्दों से ।।

3 comments:

  1. आभार आपका
    सादर

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  2. एक बार पुन: आभार आपका रविकर जी ! एक टिपण्णी चर्चा मंच पर भी डाली थी शायद स्पैम खा गया !

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  3. हद है-

    जस्टीस वरमा को यह भी बतलाओ-
    बालक का सेक्स चेंज करा के उसे बाल सुधार गृह में रखवाओ-
    जाडू -पोछा करवाओ-
    लडको के लिए खाना बनवाओ-
    और अगर कोई चाची हो तो सेक्स चेंज कर उसे नारी सुधार गृह में रखवाओ-

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