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Sunday, 6 January 2013

बदले काली सोच, पंख जो रही कतरती-



सर्द अहसास !

पी.सी.गोदियाल "परचेत" 
जीना बन देता चढ़ा, दस मंजिल मजबूत |
है जीना किस हेतु तब, प्रश्न पूछता पूत |

प्रश्न पूछता पूत, पिता जी मकसद भूला |
भूल गया वह सीख, आज हूँ लंगडा लूला |

बढ़ी विश्व रफ़्तार, जाय दुत्कार सही ना |
अंधड़ गया उजाड़, कठिन है ऐसे जीना ||
जीना= सीढ़ी



राम के भक्त कहाँ, बन्दा-ए- रहमान कहाँ


DR. ANWER JAMAL 
 Mushayera

शब्द शब्द अंगार है, धारदार हथियार |
नहीं दुश्मनी से भला, मित्र बांटिये प्यार |
मित्र बांटिये प्यार, भूख इक सी ही होवे |
बच्चों को अधिकार, कभी नहिं दुःख से रोवे  |
अपना अपना धर्म, नियम से अगर निभाओ |
हर बन्दे में ईश, सामने दर्शन पाओ || 

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-27

रही कतरती कल्पनी, शुभ्र-कल्पना-पंख |
मानहुँ अब कल्पांत का, कल्कि बजाये शंख |
कल्कि बजाये शंख, दंश गहरे अति गहरे |
दुष्ट कुतर्की लंठ, कल्कि के सम्मुख ठहरे |
रविकर कर संकल्प, बचाए पावन धरती |
बदले काली सोच, पंख जो रही कतरती ||
कल्पनी=कैंची
बैसवारी baiswari 

 मिनी इण्डिया जागता, सोया भारत देश |
फैली मृग मारीचिका, भला करे आवेश |


भला करे आवेश, रेस नहिं लगा नाम हित |
लगी मर्म पर ठेस, जगाये रखिये यह नित |


करिए औरत मर्द, सुरक्षित दिवस यामिनी |
रक्षित नैतिक मूल्य, बचाए सदा दामिनी ||


 अंधों की भरमार है, मार बिना चालाक |
सीधी राहों पर चलें, थामे अपनी नाक |
 
थामे अपनी नाक, नदी में रहे डूबते |
फिर भी है विश्वास, ठगी से नहीं ऊबते |
 
ढकोसलों की जीत, जीत है इन धंधों की |
भटके प्रभु को भूल, दुर्दशा है अंधों की ||

दामिनी के दोस्त का बयान और शर्मशार मानवता !!


 (पूरण खंडेलवाल) 

दुनिया भागमभाग में, घायल पड़ा शरीर |
सुने नहीं कोई वहां, करे बड़ी तकरीर |
करे बड़ी तकरीर, सोच क्या बदल चुकी है |
नहीं बूझते पीर, निगाहें आज झुकी हैं |
सामाजिक कर्तव्य, समझना होगा सबको |
अरे धूर्तता छोड़, दिखाना है मुँह रब को ||


रहा सुलगता प्यार, धुँआ परदे दर परदे -





































 परदे पर लगती हवा, हुआ कलेजा चाक ।
 लट्टू-कंचा खेलते, ताक-झाँक आवाक ।
ताक-झाँक आवाक, श्याम-पट चित्र उकेरा ।
चाक लिए रंगीन, लगाया करता फेरा ।
 हुई निगाहें चार, पीर कोई क्यों हर दे ।
रहा सुलगता प्यार, धुँआ परदे दर परदे ।।

8 comments:

  1. लड़कियों को बचपन से ही आत्मरक्षा की ट्रेनिंग अनिवार्य रूप से दी जाये। हर जगह पुलिस का पहरा नहीं लगाया जा सकता .

    badhiya soch.

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  2. दामिनी के दोस्त का बयान और शर्मशार मानवता !!

    (पूरण खंडेलवाल)
    शंखनाद -

    दुनिया भागमभाग में, घायल पड़ा शरीर |
    सुने नहीं कोई वहां, करे बड़ी तकरीर |
    करे बड़ी तकरीर, सोच क्या बदल चुकी है |
    नहीं बूझते पीर, निगाहें आज झुकी हैं |
    सामाजिक कर्तव्य, समझना होगा सबको |
    अरे धूर्तता छोड़, दिखाना है मुँह रब को ||

    सार्थक द्रुत सन्देश देती रचना .आभार .

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  3. dr.anwar ji se poorntaya sahmat .बहुत सार्थक भावनात्मक अभिव्यक्ति हार्दिक आभार @मोहन भागवत जी-अब और बंटवारा नहीं

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  4. अनुपम लिंक्‍स संयोजित किये हैं आपने ... आभार

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