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Monday, 28 January 2013

उस दुश्मन पर नाज, सजा देनी है जिस को-




अफ़सोस !

पी.सी.गोदियाल "परचेत" 
रहे रिपु-दमन हैं विछा, पलक-पाँवड़े आज |
माँगे नोबुल शान्ति का, अपना सेक्युलर राज |
अपना सेक्युलर राज, लाज ना आती इस को |
उस दुश्मन पर नाज, सजा देनी है जिस को |
दिग्गी-शिंदे साब, वहाँ इज्जत फरमाते |
राज-पाट उपभोग, अभय उनसे पा जाते ||



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विडम्बना ! 
रास आ रही रास यह, कहते जिसे लगाम |
सरेआम देते लगा, जब थी भीड़ तमाम |
जब थी भीड़ तमाम, जुबाँ पे  लगे भला हो |
लेकिन होता दर्द, फंसा जब कहीं गला हो |
रविकर ये बंदिशें, आज तक हमें खा रहीं |
हिदायतें कुछ और, नहीं अब रास आ रहीं ||

पदम् सम्मान : जूते घिसने से नहीं बेचने से मिलता है !


महेन्द्र श्रीवास्तव 


पद्म-मीनिया भी गजब, लगते देखी रेस ।

कहीं हर्ष तो दुःख कहीं, कहीं गजब की ठेस ।

कहीं गजब की ठेस, कहीं जूतियाँ घिसाती ।

बेचारा यह देश, नहीं वह हस्ती पाती ।

आया पहला दौर, लगा जो शतक कीनिया ।

पद्म विभूषण पाय, मिटाते पद्म  मीनिया।।


हमारे युवा आधुनिक बनना चाहते हैं या फिर दिखना चाहते हैं !!

पूरण खण्डेलवाल 

विज्ञापन मीडिया भी, औद्योगिक घरबार |
फिल्म कथानक खेल के, आयोजक सहकार |
आयोजक सहकार, अजब सा जोश भरे हैं |
अपने वश में नहीं, नशें में ही विचरे हैं |
युवा-वर्ग बेताब, उसे सब कुछ है पाना |
बहा रहा सैलाब, उखाड़े पैर जमाना || 


मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता -3

सर्ग-1
भाग-3
कौशल्या-दशरथ  
कुंडली  
 दुःख की घड़ियाँ सब गिनें, घडी घडी सरकाय ।
धीरज हिम्मत बुद्धि बल, भागे तनु विसराय ।
भागे तनु विसराय, अश्रु दिन-रात डुबोते ।
रविकर मन बहलाय, स्वयं को यूँ ना खोते ।
समय-चक्र गतिमान, घूम लाये दिन बढ़िया ।
मान ईश का खेल, गिनों कुछ दुःख की घड़ियाँ ।।

शक्ल चवन्नी छाप है, अक्ल खुली टकसाल-




माया के वक्तव्य से, रही रियाया रोय ।
भाई का आनन्द भी, जाता तुरत विलोय ।
जाता तुरत विलोय, अरब-पति उसे बनाया ।
लेकिन ये क्या बात, नहीं उसपर अब साया ।
मैडम का इनकार, मुसीबत उसकी भारी ।
छापे को तैयार, कई धाकड़ अधिकारी ।।




शक्ल चवन्नी छाप है, अक्ल खुली टकसाल ।
बा-शिंदे गंदे बड़े, घाल-मेल के पाल ।
घाल मेल के पाल, ताल दिग्विजयी ठोंके ।
नन्दी मालामाल, चाल चल चल के रो के ।
बड़े खरे ये लोग, नशेडी सूंघे पन्नी ।
दिखता सत्ता-योग, बनायी शक्ल चवन्नी ।।


4 comments:

  1. पद्म-मीनिया भी गजब, लगते देखी रेस ।

    कहीं हर्ष तो दुःख कहीं, कहीं गजब की ठेस ।

    कहीं गजब की ठेस, कहीं जूतियाँ घिसाती ।

    बेचारा यह देश, नहीं वह हस्ती पाती ।

    आया पहला दौर, लगा जो शतक कीनिया ।

    पद्म विभूषण पाय, मिटाते पद्म मीनिया।।
    बहुत खूब !

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  2. शक्ल चवन्नी छाप है, अक्ल खुली टकसाल ।
    बा-शिंदे गंदे बड़े, घाल-मेल के पाल ।
    घाल मेल के पाल, ताल दिग्विजयी ठोंके ।
    नन्दी मालामाल, चाल चल चल के रो के ।
    बड़े खरे ये लोग, नशेडी सूंघे पन्नी ।
    दिखता सत्ता-योग, बनायी शक्ल चवन्नी ।।

    चवन्नी भाई साहब प्रचलन से बाहर है :

    शक्ल अरंडी (आक का ज़हरीला पौधा )छाप है ,

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  3. शक्ल शिखंडी छाप है ,अक्ल बेच के खाय ,

    .आग बलाए (लगाए )रात दिन .............................सेकुलर है ..............कहलाय .

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