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Saturday, 19 January 2013

म्याऊँ बारम्बार, जीत करके हुंकारे-


अब चिंतन दरबार, बिलौटे खातिर चिंतित -

मणि-मस्तक शंकर चढ़े, अयप्पा के द्वार ।
कुत्ते बिल्ली से लड़ें, बागडोर सरकार ।

बागडोर सरकार, मगर कुत्ते हैं हारे ।
 म्याऊँ बारम्बार, जीत करके हुंकारे ।

अब चिंतन दरबार, बिलौटे खातिर चिंतित ।
करे आर या पार, शक्ति म्याऊँ अभिसिंचित ।।
 


साँप जी साँप !

सुशील 

कहाँ गये थे आप जी,  हांफ हांफ कर साँप ।
देख देख के सांप को, लेते  रस्ता  नाप ।
लेते  रस्ता  नाप, सांप से बहुत डरे है ।
कहते हैं कुछ मित्र, यहाँ भी बड़े भरे हैं ।
लेकिन जहर विहीन, जान के इनके लाले ।
रहे नेवले देख, बनाते इन्हें निवाले ।।


मीडिया: क्या वाकई देश के हर तबके कि आवाज है !!

पूरण खण्डेलवाल 
 शंखनाद 
ना ना ना बिलकुल नहीं, कुल-संकुल का संग |
कहीं-कहीं पर तो दिखे, हरदम सत्ता संग |
हरदम सत्ता संग, मीडिया हित व्यापारिक |
भिन्न भिन्न हैं रंग, रोग सारे सांसारिक |
ढूंढे दाना-दान, कहीं डाले हैं दाना |
अपने मन की ठान, बढ़े मीडिया घराना |


*चिंजा - चिंजी वास्ते, चिंतन-तन अनुराग-

*चिंजा - चिंजी  वास्ते, चिंतन-तन अनुराग ।

नंबर दो तो रहा ही, दो हित कर खटराग ।


दो हित कर खटराग, आग अब अटल बिहारी ।

जब मुंडेर पर काग, कुँवारा मुंडा भारी ।


दो मत इतना बोझ, कहीं ना होवे गंजा ।

करो कर्म यह सोझ, ब्याह माँ अपना चिंजा ।।
*चिंजा - चिंजी=बेटा -बेटी



हमें वक्तव्य नहीं चार सिर चाहिए .


Virendra Kumar Sharma 

 अमर सिंह राठौर का, मिले शर्तिया शीश |
सुनो भतीजे रामसिंह, चाची को है रीस |
चाची को है रीस, बिना सिर की यह काया |
जाने पापी कौन, आज हमको बहकाया |
जो भी जिम्मेदार, काट उसका सिर लाओ |
नहीं मिले *मकु ठौर, नहीं राठौर कहाओ ||
*कदाचित

नरेन्द्र मोदी के लिए एक कविता अलबेला खत्री के दिल से ...............

AlbelaKhatri.com 
बेलाग बोध बेलौस बल, ब्यौरा शपथ सटीक |
मोठस मोटा-भाय का, मंसूबा मन नीक ||
घोंघा

देवेन्द्र पाण्डेय 

सीमांकन क्यूँ ना किया, समय बिताता प्रौढ़ |
यत्र-तत्र घुसपैठ कर, कवच-सुरक्षा ओढ़ |
कवच-सुरक्षा ओढ़, चढ़ा है रंग बसंती |
वय हो जाती गौण, रचूँ मैं एक तुरंती |
यह है सुख का मूल, चला चल धीमा धीमा |
घोंघा बने उसूल, चैन की फिर क्या सीमा  ??

चढ़ा गुलाबी रंग, देख जयपुर *सरमाया-

गज-गति लख *गज्जूह की, हाथी भरे सफ़ेद ।

 बजट परे चिंतन करें, बना गजट में छेद ।


बना गजट में छेद, एक ही फोटो छाया ।

चढ़ा गुलाबी रंग, देख जयपुर *सरमाया । 


रविकर तो शरमाय, पहिर साड़ी यह नौ गज ।

कोने रहे लुकाय, सदी के सारे दिग्गज ।। 


Bamulahija dot Com 



 हुल्लड़ होता है हटकु, *हालाहली हलोर ।

हुई सुमाता खुश बहुत, कब से रही अगोर ।

कब से रही अगोर, हुआ बबलू अब लायक ।

हर्षित दिग्गी-द्रोण, सौंप के सारे ^शायक ।


नीति नियम कुल सीख, करेगा अब ना फाउल ।

सब विधि लायक दीख, आह! दुनिया को राहुल ।।
*दारू ^तीर
 



6 comments:

  1. लिंक लिखाड़ में वैसे तो सभी लिंक अच्छे हैं लेकिन अलबेला खत्रीजी कि काव्य रचना कि बात ही कुछ और है !!

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  2. आदरणीय रविकर सर प्रणाम, एक से बढ़कर एक सुन्दर कुण्डलिया पढ़ते-पढ़ते सुधबुध खो गई हार्दिक बधाई स्वीकारें. सादर

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  3. वाह!
    आपकी यह पोस्ट कल दिनांक 21-01-2013 के चर्चामंच पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति है व्यंग्य भी तंज भी .


    हुल्लड़ होता है हटकु, *हालाहली हलोर ।

    हुई सुमाता खुश बहुत, कब से रही अगोर ।

    कब से रही अगोर, हुआ बबलू अब लायक ।

    हर्षित दिग्गी-द्रोण, सौंप के सारे ^शायक ।


    नीति नियम कुल सीख, करेगा अब ना फाउल ।

    सब विधि लायक दीख, आह! दुनिया को राहुल ।।
    *दारू ^तीर

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